इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के तहत शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गैंग चार्ट के अनुमोदन (Approval) के दौरान नियमों के तहत अनिवार्य ‘मस्तिष्क का प्रयोग’ (Meeting of Mind) का अभाव था, जो कार्यवाही को दूषित करता है।
न्यायालय के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या गैंग चार्ट को मंजूरी देते समय अनिवार्य नियमों का उल्लंघन होने और ‘विवेक का प्रयोग’ न किए जाने की स्थिति में धारा 3(1) के तहत कार्यवाही जारी रखी जा सकती है। न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की पीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 के तहत दायर याचिका को स्वीकार करते हुए गैंगस्टर एक्ट के तहत चल रहे मुकदमे को रद्द कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने अन्य आपराधिक मामलों में चुनौती को खारिज करते हुए आवेदक को डिस्चार्ज (उन्मोचन) अर्जी दाखिल करने की छूट दी है।
मामले की पृष्ठभूमि
आवेदक, धर्मेंद्र उर्फ धर्मेंद्र सोनी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए अपने खिलाफ शुरू की गई नौ अलग-अलग आपराधिक कार्यवाहियों को चुनौती दी थी। इनमें शामिल थे:
- वर्ष 2020 में बहराइच जिले के हरदी पुलिस स्टेशन में दर्ज विभिन्न एफआईआर से उत्पन्न आठ मामले।
- उसी पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 203/2020 से उत्पन्न सत्र परीक्षण संख्या 40/2021, जो यूपी गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 3(1) के तहत था।
पक्षकारों की दलीलें
आवेदक के अधिवक्ता अभिषेक मिश्रा, समन्वय धर द्विवेदी और विक्रांत चौधरी ने तकनीकी आधार पर गैंगस्टर एक्ट की कार्यवाही को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि यूपी गैंगस्टर्स एक्ट के तहत बनाए गए नियमों का पालन नहीं किया गया है। विशेष रूप से, उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद गैंग चार्ट से यह स्पष्ट है कि अधिकारियों द्वारा ‘मस्तिष्क का प्रयोग’ (Meeting of Mind) नहीं किया गया था। यह भी तर्क दिया गया कि धारा 2(b) को लागू किए बिना केवल धारा 3(1) के तहत एफआईआर दर्ज करना अनुचित है।
अन्य आठ आपराधिक मामलों के संबंध में, अधिवक्ता ने तर्क दिया कि चार्जशीट में जिन बयानों पर भरोसा किया जा रहा है, उनमें भारी विसंगतियां हैं। बयानों और रिकवरी मेमो की तारीखों में अंतर है। इसके अलावा, आईपीसी की धारा 411 (बेईमानी से चोरी की संपत्ति प्राप्त करना) और 413 (आदतन चोरी की संपत्ति का व्यापार करना) के तहत आवेदक को फंसाने के लिए ऐसा कोई सबूत नहीं है जो यह दर्शा सके कि आवेदक ने जानबूझकर या आदतन ऐसा किया था।
राज्य की ओर से विद्वान ए.जी.ए. ने इन तर्कों का विरोध किया।
कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने हालिया कानूनी नजीरों के आलोक में गैंगस्टर एक्ट की कार्यवाही की जांच की। कोर्ट ने पाया कि वर्तमान मामले में नियमों के तहत अनिवार्य ‘मस्तिष्क का प्रयोग’ नहीं किया गया है।
कोर्ट ने अपने निर्णय में निम्नलिखित नजीरों का हवाला दिया:
- निशा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2025:AHC-LKO:14840)
- विनोद बिहारी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (माननीय सर्वोच्च न्यायालय) (2025 INSC 767)
इन निर्णयों के अनुपात को लागू करते हुए, कोर्ट ने कहा:
“उक्त निर्णयों का पालन करते हुए और प्रथम दृष्टया ‘मस्तिष्क के प्रयोग’ (Meeting of Mind) की कमी और अनिवार्य नियमों का पालन न किए जाने के कारण, एफआईआर संख्या 203/2020 से उत्पन्न सत्र परीक्षण संख्या 40/2021 (यूपी गैंगस्टर्स एक्ट की धारा 3(1) के तहत) की कार्यवाही को रद्द किया जाता है।”
हालांकि, कोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को स्वतंत्रता दी है कि यदि सलाह दी जाती है, तो वे कानून के अनुसार और अनिवार्य प्रावधानों का पालन करने के बाद नया निर्णय ले सकते हैं।
अन्य आठ मामलों (क्रम संख्या 1 से 8) के संबंध में, कोर्ट ने कहा कि अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं, इसलिए इस स्तर पर उन कार्यवाहियों को रद्द करना उचित नहीं होगा।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देशों के साथ आवेदन का निस्तारण किया:
- गैंगस्टर एक्ट केस: सत्र परीक्षण संख्या 40/2021 (एफआईआर संख्या 203/2020) की कार्यवाही रद्द की गई।
- अन्य मामले: आवेदक को ट्रायल कोर्ट के समक्ष डिस्चार्ज (उन्मोचन) आवेदन दाखिल करने की स्वतंत्रता दी गई। कोर्ट ने निर्देश दिया कि “यदि ऐसा आवेदन दायर किया जाता है, तो उस पर कानून के अनुसार उसके गुणों-दोषों (Merit) के आधार पर विचार और निर्णय लिया जाएगा।”
केस विवरण
- केस शीर्षक: धर्मेंद्र उर्फ धर्मेंद्र सोनी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: आवेदन यू/एस 482 संख्या 819, 2026
- न्यायाधीश: न्यायमूर्ति पंकज भाटिया

