हाई कोर्ट ने कहा कि गलत जानकारी से मिली जमानत पर समानता का अधिकार नही है

नई दिल्ली–इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का अभियुक्त और अभियोजन के अधिकारों में संतुलन बनाये रखना, निसंदेह अभियुक्त के अधिकार महत्वपूर्ण है।

लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि अपराधी जेल में हो। ताकि समाज मे सही संदेश जाए कोर्ट ने कहा की अभियुक्त के प्रति सहानुभूति आपराधिक न्याय तंत्र को कमजोर बना सकती है। ऐसा होने से कानून के शासन के प्रति जनविश्वास में कमी आ सकती है।

कोर्ट ने कहा मादक पदार्थों की तस्करी करने वाले सामान्य मानव नहीं रह जाते, इसलिए न्यायिक विवेक का प्रयोग न्यायिक तरीके से किया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा कि सह अभियुक्त को जमानत मिलने की पैरिटी (समानता) उस दशा में दूसरे अभियुक्त को नहीं दी जा सकती, जब गलत बयानी कर जमानत हासिल की गई हो। कोर्ट ने दो वाहनों से 157.570 किग्रा गांजा के साथ पकड़े गए याची को जमानत पर रिहा करने से स्प्ष्ट इनकार कर दिया है।

उक्त आदेश जस्टिस संजय कुमार सिंह ने प्रयागराज, झूंसी के गांजा तस्करी के आरोपी धीरज कुमार शुक्ल की जमानत अर्जी को खारिज करते हुए दिया है।

आपको बताते चलें कि एसटीएफ की पुलिस टीम ने दो कारों से अवैध रूप से भारी मात्रा में गांजा तस्करी के आरोप में चार लोगों को पकड़ा था, और प्राथमिकी दर्ज कराई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि ऐसे ही आरोप पर सह अभियुक्त को जमानत दी गई है, उसे भी जमानत पर रिहा किया जाए।

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कोर्ट ने कहा एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 की शर्तों की कसौटी पर खरा उतरने पर ही जमानत दी जा सकती है ,और मादक पदार्थ की कब्जे से बरामदगी पर उपधारणा यही होगी कि तस्करी का माल है।

आरोपी के कब्जे से बरामदगी नहीं हुई, साबित करने का भार आरोपी पर होता है। पुलिस द्वारा दुर्भावना से फंसाने के आरोप को भी आरोपी को साबित करना होगा कि पुलिस ने किसी रंजिश के कारण उसे झूठे मामले में फंसाया है।

अपराध का गवाह इसलिए मिलना कठिन होता है, क्योंकि अपराधियों के साथ राजनैतिक, वित्तीय संरक्षण व मसल पावर रहती है। गवाह डर के कारण सामने नहीं आते। कोर्ट ने कहा कि जमानत मिलने के बाद यह नहीं कह सकते कि वह अपराध की पुनरावृत्ति नहीं करेगा। ऐसे में जमानत मंजूर नहीं की जा सकती।

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