अब अंतिम सेमेस्टर के छात्र भी दे सकेंगे AIBE, बार काउंसिल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया- साल में दो बार होगी परीक्षा

देश भर के हजारों कानून (Law) के छात्रों के लिए सुप्रीम कोर्ट से बड़ी खुशखबरी आई है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने मंगलवार को शीर्ष अदालत को सूचित किया कि उसने नए नियम तैयार कर लिए हैं, जिसके तहत अब अंतिम सेमेस्टर के कानून छात्र भी ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) में शामिल हो सकेंगे। इसके साथ ही, बार काउंसिल ने कोर्ट को यह भी भरोसा दिलाया है कि अब से यह क्वालीफाइंग परीक्षा साल में एक बार नहीं, बल्कि दो बार आयोजित की जाएगी।

नए नियम और परीक्षा की आवृत्ति बढ़ी

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ एआईबीई (AIBE) के लिए पात्रता मानदंडों को लेकर दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान बीसीआई के वकील ने कोर्ट को बताया कि छात्रों की चिंताओं को दूर करने के लिए नियामक संस्था ने आवश्यक नियम बना लिए हैं।

बीसीआई के वकील ने कोर्ट में कहा, “यह वह मामला है जहां यह मांग की गई थी कि अंतिम सेमेस्टर के छात्रों को एआईबीई में बैठने की अनुमति दी जानी चाहिए। हमने नियम तैयार कर लिए हैं और प्रार्थनाओं का ध्यान रखा गया है। एआईबीई अब साल में कम से कम दो बार आयोजित की जाएगी और अंतिम सेमेस्टर के छात्रों को इसमें बैठने की अनुमति दी जाएगी, बशर्ते वे अपनी अंतिम (सेमेस्टर) परीक्षा पास कर लें।”

कोर्ट ने इस दलील को रिकॉर्ड पर लिया और अपने आदेश में नोट किया कि रिट याचिका का उद्देश्य पूरा हो गया है क्योंकि “बीसीआई ने एआईबीई नियम 2026 पहले ही तैयार कर लिए हैं।” इसके साथ ही पीठ ने याचिका का निपटारा कर दिया।

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योग्यता के लिए महत्वपूर्ण शर्त

हालांकि नए नियमों ने अंतिम सेमेस्टर के छात्रों के लिए परीक्षा देने का रास्ता साफ कर दिया है, लेकिन बीसीआई ने स्पष्ट किया कि उनकी योग्यता सशर्त होगी। एआईबीई में बैठने की अनुमति इस शर्त के अधीन होगी कि छात्र अपनी लॉ की अंतिम सेमेस्टर की परीक्षा सफलतापूर्वक पास करें। इस कदम से कानून स्नातकों का कीमती समय बचने की उम्मीद है, जिससे वे ग्रेजुएशन के तुरंत बाद बतौर वकील अपना नामांकन करा सकेंगे और अभ्यास शुरू कर सकेंगे, बजाय इसके कि उन्हें अगले परीक्षा चक्र का इंतजार करना पड़े।

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विवाद की पृष्ठभूमि

यह मामला दिल्ली विश्वविद्यालय के नौ अंतिम वर्ष के कानून छात्रों द्वारा दायर याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। एडवोकेट ए. वेलन द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए याचिकाकर्ताओं ने बीसीआई की उस अधिसूचना को चुनौती दी थी, जिसमें छात्रों को ग्रेजुएशन पूरा होने से पहले एआईबीई लिखने से रोका गया था।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि यह प्रतिबंध छात्रों के बीच उनके विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक कार्यक्रम के आधार पर एक “मनमाना वर्गीकरण” पैदा करता है। उनका कहना था कि जिन विश्वविद्यालयों के परिणाम देर से आते हैं, वहां के छात्र उन संस्थानों के छात्रों की तुलना में अनुचित रूप से पिछड़ जाते हैं जहां परिणाम पहले घोषित हो जाते हैं।

याचिका में इस बात पर भी जोर दिया गया था कि बीसीआई का पिछला निर्णय संविधान पीठ की उन टिप्पणियों के विपरीत था, जिसमें कहा गया था कि योग्य अंतिम सेमेस्टर के छात्रों को बार परीक्षा देने की अनुमति दी जा सकती है। गौरतलब है कि संविधान पीठ को यह सुझाव तत्कालीन एमिकस क्यूरी के.वी. विश्वनाथन ने दिया था, जो अब सुप्रीम कोर्ट के जज हैं।

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याचिकाकर्ताओं ने अक्टूबर 2023 के तेलंगाना हाईकोर्ट के उस फैसले का भी हवाला दिया था, जिसमें बीसीआई को संविधान पीठ की टिप्पणियों के आलोक में इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए कहा गया था।

पिछला घटनाक्रम

सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे की सक्रिय रूप से निगरानी कर रहा था। सितंबर 2024 में हुई सुनवाई में, बीसीआई ने संकेत दिया था कि नियम बनाने की प्रक्रिया चल रही है। उसी महीने, कोर्ट ने बीसीआई को निर्देश दिया था कि वह अंतिम वर्ष के छात्रों को एआईबीई XIX के लिए पंजीकरण करने की अनुमति दे, जो उस वर्ष नवंबर में निर्धारित थी।

नियमों के औपचारिक निर्माण और साल में दो बार परीक्षा आयोजित करने की प्रतिबद्धता के साथ, स्नातक छात्रों के लिए परीक्षा के समय को लेकर कानूनी बाधाएं अब प्रभावी रूप से हल हो गई हैं।

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