‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर फ्रॉड मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत से किया इनकार, कहा—तकनीक के जरिये ठगी के मामले देशभर में बढ़ रहे

दिल्ली हाईकोर्ट ने तथाकथित “डिजिटल अरेस्ट” के जरिए साइबर ठगी से जुड़े मामले में एक आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल कर लोगों को धोखा देकर पैसे ऐंठने की घटनाएं देशभर में लगातार सामने आ रही हैं और मामले की पूरी साजिश तथा कार्यप्रणाली समझने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ आवश्यक है।

न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने 11 मार्च को पारित आदेश में कहा कि मामले में लगाए गए आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और यह साइबर ठगी का ऐसा मामला है जिसमें कथित तौर पर “डिजिटल अरेस्ट” का तरीका अपनाया गया।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि इस तरह के अपराधों में तकनीक और फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर पीड़ितों को भ्रमित किया जाता है और उनसे बड़ी रकम ठग ली जाती है।

अदालत ने कहा,
“वर्तमान मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए यह न्यायालय मानता है कि आवेदक के विरुद्ध आरोप ‘डिजिटल अरेस्ट’ की कार्यप्रणाली से जुड़े गंभीर साइबर धोखाधड़ी के मामले से संबंधित हैं।”

न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही ऐसे मामलों का स्वतः संज्ञान ले चुका है, जहां फर्जी न्यायिक आदेशों के आधार पर लोगों को “डिजिटल अरेस्ट” में दिखाकर ठगा जाता है। वर्तमान एफआईआर की पीड़िता को भी उस मामले में हस्तक्षेपकर्ता के रूप में शीर्ष अदालत की कार्यवाही में सहायता करने की अनुमति दी गई है।

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अदालत ने कहा कि इस चरण पर अग्रिम जमानत देना जांच को प्रभावित कर सकता है।

“यह न्यायालय इस मत का है कि इस स्तर पर अग्रिम जमानत प्रदान करना जांच में बाधा उत्पन्न कर सकता है, विशेष रूप से तब जब आवेदक से हिरासत में पूछताछ आवश्यक है ताकि पूरे modus operandi और व्यापक साजिश का पता लगाया जा सके।”

शिकायत के अनुसार, ग्रेटर कैलाश-I निवासी महिला को 15 मार्च 2025 को व्हाट्सएप कॉल आया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को “सर्विलांस अधिकारी” बताते हुए कहा कि उसके बैंक खाते निगरानी में हैं।

इसके बाद कॉल में एक व्यक्ति को सीबीआई अधिकारी के रूप में जोड़ा गया और महिला को बताया गया कि वह मनी लॉन्ड्रिंग मामले में संलिप्त होने के कारण “डिजिटल अरेस्ट” में है। ठगों ने सुप्रीम कोर्ट का कथित आदेश भी साझा किया।

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शिकायत में कहा गया कि एक समूह वीडियो कॉल के दौरान एक व्यक्ति ने खुद को “जज” बताते हुए कहा कि महिला के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हो चुका है और उसे किसी से बात करने या घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं है।

इन बातों से भयभीत होकर महिला से पैसे ट्रांसफर करवाए गए। 18 मार्च 2025 को उसने अपने एसबीआई खाते से 30 लाख रुपये एक बैंक खाते में ट्रांसफर किए और बाद में 80 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि भी दूसरे खाते में भेजी।

महिला ने 23 मार्च 2025 को साइबर हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई।

जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि 30 लाख रुपये जिस खाते में ट्रांसफर किए गए, वह एक फर्म का बैंक खाता था जो कथित रूप से वर्तमान आरोपी से जुड़ा हुआ है।

आरोपी ने अदालत में दावा किया कि उसे झूठा फंसाया गया है। उसका कहना था कि उसका ई-मेल अकाउंट हैक कर लिया गया था और उसने अपने खाते में संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी बैंक को भी दी थी।

हालांकि अदालत ने कहा कि जांच के दौरान जुटाए गए तथ्यों से फिलहाल आरोपी के इन दावों का समर्थन नहीं होता।

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अदालत ने पाया कि आरोपी के बैंक खाते में आए 30 लाख रुपये उसी दिन कई अन्य खातों में ट्रांसफर कर दिए गए, जिससे खाते में केवल ₹6,722 शेष रह गए।

इसके अलावा, अपराध वाले दिन खाते में कुल ₹98 लाख जमा हुए थे जिन्हें तुरंत अन्य खातों में स्थानांतरित कर दिया गया।

अदालत ने यह भी दर्ज किया कि आरोपी के नाम वाले इसी बैंक खाते से जुड़े चार अन्य साइबर धोखाधड़ी के मामले भी दर्ज हैं।

जांच में यह भी सामने आया कि जिस दिन लेनदेन हुआ, उस दिन आरोपी द्वारा कथित रूप से इस्तेमाल किया जा रहा एक अन्य मोबाइल नंबर उसी स्थान पर सक्रिय पाया गया जहां आरोपी के नाम से जुड़े बैंक खाते का मोबाइल नंबर सक्रिय था।

इन परिस्थितियों को देखते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

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