इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब किसी आपराधिक अदालत के समक्ष किशोरावस्था (juvenility) का दावा उठाया जाता है, तो उस अदालत पर यह अनिवार्य और गैर-हस्तांतरणीय दायित्व है कि वह स्वयं जांच कर अभियुक्त की आयु पर ठोस निष्कर्ष दर्ज करे। बिना इस प्रक्रिया का पालन किए मामले को सीधे किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) को भेजना प्रथम दृष्टया अधिकार क्षेत्र से परे है।
न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत दाखिल आवेदन को स्वीकार करते हुए उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सत्र न्यायालय ने किशोरावस्था के प्रश्न पर स्वयं निर्णय देने के बजाय मामला किशोर न्याय बोर्ड को भेज दिया था।
मामला क्या था
आवेदक मक्सुदन गोंड उर्फ कहसुदन गोंड, थाना खम्पर, जनपद देवरिया से जुड़े एक सत्र वाद में अभियुक्त है। उसके विरुद्ध आईपीसी की धारा 498A, 304B तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मामला दर्ज है।
सत्र परीक्षण के दौरान अभियुक्त ने स्वयं को घटना की तारीख पर नाबालिग बताते हुए किशोरावस्था का दावा किया। इस पर अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एफटीसी-I), देवरिया ने 3 मार्च 2020 को कोई जांच या निष्कर्ष दर्ज किए बिना मामला किशोर न्याय बोर्ड को संदर्भित कर दिया। इसके बाद बोर्ड ने 30 मई 2022 को एक परिणामी आदेश पारित किया।
इन दोनों आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
आवेदक की दलील
आवेदक की ओर से अधिवक्ता अविजित सक्सेना ने दलील दी कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 9(2) स्पष्ट रूप से यह कहती है कि यदि किशोरावस्था का दावा बोर्ड के अलावा किसी अन्य अदालत के समक्ष किया जाता है, तो वही अदालत साक्ष्य लेकर जांच करेगी और अभियुक्त की आयु पर निष्कर्ष दर्ज करेगी।
उन्होंने तर्क दिया कि यह जिम्मेदारी न तो औपचारिक है और न ही किसी अन्य संस्था को सौंपी जा सकती है। इस संदर्भ में इलाहाबाद हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच के फैसले पवन कुमार बनाम राज्य तथा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ऋषिपाल सिंह सोलंकी बनाम राज्य पर भरोसा रखा गया।
राज्य का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से पेश अपर सरकारी अधिवक्ता ने आवेदन का विरोध करते हुए कहा कि सत्र न्यायालय का आदेश वैध है और उसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति तिवारी ने धारा 9(2) का विश्लेषण करते हुए कहा कि कानून अदालत को केवल “संदर्भित करने” की अनुमति नहीं देता, बल्कि स्पष्ट रूप से जांच करने और निर्णय दर्ज करने का दायित्व सौंपता है।
अदालत ने कहा कि जब तक किशोरावस्था का प्रश्न तय नहीं किया जाता, तब तक मामले को किशोर न्याय बोर्ड को भेजना अधिकार क्षेत्र के बिना किया गया कदम माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने पूर्व में दिए गए उन निर्णयों का भी उल्लेख किया, जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं सत्र न्यायालयों को किशोरावस्था के दावों की जांच करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।
आदेश और अहम निर्देश
हाईकोर्ट ने 3 मार्च 2020 को पारित सत्र न्यायालय के आदेश तथा 30 मई 2022 को पारित किशोर न्याय बोर्ड के आदेश—दोनों को निरस्त कर दिया।
मामले को पुनः अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एफटीसी-I), देवरिया को यह निर्देश देते हुए वापस भेजा गया कि वह पक्षकारों को सुनकर, साक्ष्य लेकर, कानून के अनुसार किशोरावस्था के प्रश्न पर नया निर्णय दे।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी गंभीर टिप्पणी की कि प्रदेश भर में धारा 9(2) के प्रावधानों का पालन नहीं हो रहा है। इसे देखते हुए रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया गया कि आवश्यक स्वीकृति लेकर उत्तर प्रदेश के सभी जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को इस संबंध में एक परिपत्र (सर्कुलर) जारी किया जाए, ताकि भविष्य में अदालतें कानून के अनुसार ही कार्य करें।
वाद विवरण
- मामले का नाम: मक्सुदन गोंड @ कहसुदन गोंड बनाम राज्य उत्तर प्रदेश
- मामला संख्या: आवेदन U/S 528 BNSS संख्या 49660/2025
- पीठ: न्यायमूर्ति तेज प्रताप तिवारी
- आवेदक के अधिवक्ता: अविजित सक्सेना
- राज्य की ओर से: सरकारी अधिवक्ता

