दिल्ली हाईकोर्ट ने पुनर्मूल्यांकन के खिलाफ याचिका खारिज की; कहा- एनआरई खातों के लिए आरबीआई की अनुमति और एनआरआई दर्जे की जांच करे एओ

दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्धारण वर्ष (AY) 2018-19 के लिए आयकर पुनर्मूल्यांकन (reassessment) कार्यवाही शुरू करने को चुनौती देने वाली एक व्यक्ति की रिट याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस विनोद कुमार की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि कर छूट के दावों, एनआरआई स्थिति और नॉन-रेजिडेंट एक्सटर्नल (एनआरई) खातों के रखरखाव के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की अनिवार्य अनुमति के अस्तित्व को सत्यापित करने के लिए निर्धारण अधिकारी (एओ) ही उचित प्राधिकारी है।

कानूनी मुद्दा

अदालत के समक्ष मुख्य मुद्दा आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 148A(d) के तहत पारित आदेश और धारा 148 के तहत जारी नोटिस की वैधता था, जिसके माध्यम से याचिकाकर्ता अभिनव जैन के खिलाफ पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही शुरू की गई थी। याचिकाकर्ता ने समय-सीमा (limitation), क्षेत्राधिकार और विवादित राशि पर टैक्स न लगने के आधार पर कार्यवाही को चुनौती दी थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, अभिनव जैन, एक अनिवासी भारतीय (एनआरआई) हैं, जो वित्तीय वर्ष 2017-18 के दौरान 60 दिनों से कम समय के लिए भारत में रहे थे। निर्धारण वर्ष 2018-19 के लिए, आयकर विभाग के इनसाइट पोर्टल पर जानकारी मिली कि जैन ने विदेशी प्रेषण (remittance), ब्याज आय और बैंक जमा से संबंधित लगभग ₹9,28,66,191 के बड़े लेनदेन किए हैं।

मुख्य लेनदेन में शामिल थे:

  • ₹3,75,000 और ₹4,90,000: याचिकाकर्ता के अपने ही खातों के बीच कथित अंतर-बैंक हस्तांतरण।
  • ₹9,11,07,929: इस राशि में ₹8.5 करोड़ की जमा राशि (जिसे याचिकाकर्ता ने अपने पिता बृजेश जैन से उपहार बताया), ₹4.25 लाख की एफडी और लगभग ₹56.82 लाख का अर्जित ब्याज शामिल था।

इन लेनदेन के बावजूद, याचिकाकर्ता ने आयकर रिटर्न (आईटीआर) दाखिल नहीं किया, क्योंकि उनका मानना था कि उनकी कुल आय ₹2,50,000 की कर योग्य सीमा से कम थी। धारा 148A(b) के तहत कारण बताओ नोटिस के बाद, राजस्व विभाग ने 7 अप्रैल, 2022 को धारा 148A(d) के तहत आदेश पारित किया, जिसमें यह निष्कर्ष निकाला गया कि आय कर निर्धारण से बच गई है।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से: वकील रोहित जैन ने तर्क दिया कि पुनर्मूल्यांकन की यह कार्यवाही केवल एक “फिशिंग और रोविंग इंक्वायरी” (तथ्यों की अनिश्चित खोज) है। उन्होंने कहा कि:

  1. समय-सीमा (Limitation): धारा 148 के तहत नोटिस 7 अप्रैल, 2022 को जारी किया गया था, जो कि 31 मार्च, 2022 को समाप्त होने वाली तीन साल की सीमा के बाहर था। उन्होंने तर्क दिया कि जवाब देने का समय बढ़ाने के लिए विभाग द्वारा जारी शुद्धिपत्र (corrigendum) केवल क्षेत्राधिकार हथियाने की कोशिश थी।
  2. छूट: एनआरई खातों पर मिलने वाला ब्याज धारा 10(4)(ii) के तहत टैक्स मुक्त है।
  3. उपहार का दावा: ₹8.5 करोड़ की राशि पिता की ओर से उपहार थी। उनके माता-पिता के खिलाफ भी ऐसी ही कार्यवाही शुरू की गई थी, जिसे उनके संबंधित एओ द्वारा बंद कर दिया गया था।
  4. क्षेत्राधिकार: नोटिस क्षेत्राधिकार निर्धारण अधिकारी (JAO) के बजाय फेयलेस असेसिंग ऑफिसर (FAO) द्वारा जारी किया जाना चाहिए था।

प्रतिवादी (राजस्व विभाग) की ओर से: वरिष्ठ स्थायी वकील विपुल अग्रवाल ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता जांच के दौरान पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य देने में विफल रहा। उन्होंने मुख्य रूप से कहा कि:

  1. प्रमाण की कमी: जैन ने एनआरई खाता बनाए रखने के लिए आरबीआई की अनुमति पेश नहीं की, जो धारा 10(4)(ii) के तहत कर छूट के लिए एक अनिवार्य शर्त है।
  2. विसंगतियां: बैंक स्टेटमेंट में ब्याज से जुड़ी कुछ प्रविष्टियां स्पष्ट नहीं थीं, और याचिकाकर्ता के पासपोर्ट से पता चला कि उन्होंने भारत की यात्रा की थी, जिसके लिए फेमा (FEMA) के तहत उनके आवासीय दर्जे की गहरी जांच आवश्यक है।
  3. समय-सीमा का बचाव: धारा 149(1) के तीसरे परंतुक (proviso) के अनुसार, करदाता को जवाब देने के लिए दिए गए समय को समय-सीमा से बाहर रखा जाता है। चूंकि एक शुद्धिपत्र के जरिए समय 2 अप्रैल, 2022 तक बढ़ा दिया गया था, इसलिए 7 अप्रैल को जारी नोटिस समय-सीमा के भीतर माना जाएगा।
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कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने सबसे पहले समय-सीमा के मुद्दे पर विचार किया। हाईकोर्ट ने कहा कि एओ के पास शुद्धिपत्र जारी करके “न्यूनतम सात दिन” के नोटिस की शुरुआती गणितीय गलती को सुधारने की शक्ति है। जवाब की तारीख को 2 अप्रैल, 2022 तक बढ़ाकर, धारा 149(1) के तहत उस समय को गणना से बाहर रखा गया, जिससे 7 अप्रैल का नोटिस वैध हो गया।

क्षेत्राधिकार के संबंध में, कोर्ट ने TKS Builders Pvt. Ltd. v. ITO मामले में अपने पिछले फैसले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि JAO और FAO दोनों ही नोटिस जारी करने के लिए सक्षम हैं।

आय की गुणवत्ता पर कोर्ट ने कहा कि हालांकि याचिकाकर्ता ने ₹8.5 करोड़ को एनआरई खाते में जमा एक टैक्स-मुक्त उपहार बताया था, लेकिन उन्होंने अदालत के समक्ष अनिवार्य आरबीआई अनुमति पेश नहीं की। खंडपीठ ने टिप्पणी की:

“क्या याचिकाकर्ता को बीओआई में एनआरई खाता खोलने के लिए आरबीआई से आवश्यक अनुमति प्राप्त हुई थी, यह पुनर्मूल्यांकन का मुख्य पहलू होगा… याचिकाकर्ता ने हमारे सामने आरबीआई द्वारा दी गई ऐसी कोई अनुमति पेश नहीं की है। ऐसी अनुमति प्रासंगिक हो जाती है क्योंकि यदि आरबीआई की अनुमति के बिना राशि जमा की गई है, तो उसके परिणाम भुगतने होंगे।”

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वह एओ की भूमिका निभाते हुए तथ्यों का ऑडिट नहीं करेगा। AGR Investment Limited v. ACIT मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

“यह करदाता के लिए खुला है कि वह पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही में भाग ले और निर्धारण अधिकारी को संतुष्ट करने के लिए अपना पक्ष और सबूत विस्तार से रखे कि कोई कर योग्य आय निर्धारण से नहीं बची है।”

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अदालत का निर्णय

हाईकोर्ट ने पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। अदालत ने फैसला सुनाया कि 7 अप्रैल, 2022 के आदेश और नोटिस के खिलाफ चुनौती विफल रही क्योंकि वे समय-सीमा के भीतर थे। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को छूट दी कि वह पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया के दौरान निर्धारण अधिकारी (एओ) के समक्ष अपने एनआरई दर्जे, उपहार के दावों और आरबीआई की अनुमति सहित सभी दस्तावेज और तर्क प्रस्तुत कर सकते हैं।

मामले का विवरण:

केस का शीर्षक: अभिनव जैन बनाम इनकम टैक्स ऑफिसर और अन्य

केस संख्या: W.P.(C) 2638/2023

पीठ: जस्टिस वी. कामेश्वर राव और जस्टिस विनोद कुमार

दिनांक: 13 अप्रैल, 2026

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