दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को आम आदमी पार्टी (आप) के नेता अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह के साथ-साथ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह को अवमानना नोटिस जारी किया है। यह कार्रवाई एक जनहित याचिका (PIL) पर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि इन नेताओं ने अदालत की कार्यवाही के वीडियो क्लिप अनधिकृत रूप से सोशल मीडिया पर साझा किए। याचिका के अनुसार, यह कृत्य हाईकोर्ट के उन नियमों का उल्लंघन है जो न्यायिक कार्यवाही की गोपनीयता और गरिमा बनाए रखने के लिए बनाए गए हैं।
यह पूरा मामला 13 अप्रैल को हुई एक सुनवाई से जुड़ा है। उस दिन शराब नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की उस याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिसमें उन्होंने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को मामले से अलग (recusal) होने का अनुरोध किया था। हाईकोर्ट के नियमों के तहत अदालत की कार्यवाही की अनधिकृत रिकॉर्डिंग, उसे अपलोड करना या प्रकाशित करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
याचिकाकर्ता और वकील वैभव सिंह ने 15 अप्रैल को हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को इस संबंध में शिकायत दी थी। याचिका में दावा किया गया कि इन वीडियो क्लिप्स को “राजनीतिक एजेंडे” के तहत एडिट किया गया ताकि जनता की नजरों में अदालत की छवि को धूमिल किया जा सके।
याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि कोर्ट की रिकॉर्डिंग को इस तरह सार्वजनिक करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता के खिलाफ है। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि ‘आप’ के सदस्यों और अन्य विपक्षी नेताओं ने जानबूझकर पक्षपातपूर्ण नैरेटिव बनाने के उद्देश्य से एक “साजिश” के तहत इन कार्यवाहियों को रिकॉर्ड किया।
सुनवाई के दौरान मेटा प्लेटफॉर्म्स (फेसबुक और इंस्टाग्राम की मूल कंपनी) और गूगल के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि वे केवल एक मध्यस्थ (intermediary) के रूप में कार्य करते हैं और “सुपर सेंसर” की भूमिका में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उनके पास ऐसी किसी सामग्री की स्वतः निगरानी करने की तकनीक नहीं है, लेकिन शिकायत मिलते ही वे तत्काल कार्रवाई करते हैं। मेटा के वकील ने बताया कि हाईकोर्ट प्रशासन से पत्र मिलने के बाद विवादित लिंक पहले ही हटा दिए गए हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने यह भी कहा कि वे उन सब्सक्राइबरों की जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं जिन्होंने सबसे पहले इन वीडियो को अपलोड किया था, जिससे मुख्य स्रोत की पहचान हो सके।
जस्टिस वी कामेश्वर राव और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की पीठ ने इस तरह के उल्लंघन पर गहरी चिंता जताई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की, “हम संस्था के व्यापक हित को लेकर चिंतित हैं। यदि हम इसे अभी नियंत्रित नहीं करते हैं, तो यह सिलसिला थमेगा नहीं।”
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया की सुरक्षा के लिए अदालती कार्यवाही की रिकॉर्डिंग पर प्रतिबंध एक अनिवार्य नियम है। कोर्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से यह भी पूछा कि क्या वे भविष्य में ऐसी सामग्री को अपलोड होने के बाद तुरंत हटाने की कोई पुख्ता व्यवस्था कर सकते हैं।
हाईकोर्ट ने अरविंद केजरीवाल सहित अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है, जिनमें ‘आप’ नेता संजीव झा, मुकेश अहलावत, जरनैल सिंह और पत्रकार रवीश कुमार के नाम भी शामिल हैं। कोर्ट ने सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, विशेषकर ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) को निर्देश दिया है कि वे 13 अप्रैल की सुनवाई से संबंधित सभी लिंक तत्काल हटा दें।
इस मामले में केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी नोटिस जारी कर पेश होने को कहा गया है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी है कि यदि उन्हें कोई अन्य वीडियो क्लिप मिलती है, तो वे सीधे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के वकीलों से संपर्क कर सकते हैं, जिसे तुरंत हटा दिया जाएगा। प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर अपना हलफनामा दाखिल करने को कहा गया है।
मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई को होगी।

