दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: एनडीपीएस मामले में सह-आरोपी के खुलासे और बिना पुष्टि वाले कॉल रिकॉर्ड के आधार पर जमानत मंजूर

दिल्ली हाईकोर्ट ने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (NDPS) अधिनियम, 1985 के तहत आरोपी एक महिला को नियमित जमानत दे दी है। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष का मामला केवल सह-आरोपी के प्रकटीकरण (डिस्क्लोज़र) बयान और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) के आधार पर नहीं टिक सकता, खासकर तब जब फोन पर हुई बातचीत का संदर्भ स्पष्ट न हो और उसकी कोई पुष्टि न की गई हो।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 483 सहपठित धारा 528 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला जस्टिस सौरभ बनर्जी की अदालत द्वारा सुनाया गया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कार्यवाही एनडीपीएस अधिनियम की धारा 21/25 के तहत पुलिस स्टेशन जहांगीर पुरी, दिल्ली में दर्ज एफआईआर संख्या 05/2025 से उत्पन्न हुई है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, एक गुप्त सूचना मिली थी कि साजिद उर्फ रफीकुल अपने घर से हेरोइन/स्मैक की बिक्री और आपूर्ति में शामिल है। इसी आधार पर 6 जनवरी, 2025 को उसके घर पर छापेमारी की गई।

छापेमारी के दौरान, पुलिस ने लगभग 197.17 ग्राम हेरोइन/स्मैक और 1,24,510 रुपये नकद बरामद किए। पकड़े जाने के बाद साजिद ने खुलासा किया कि उसने यह मादक पदार्थ याचिकाकर्ता नजमा और एक अन्य सह-आरोपी साहिल से खरीदा था।

इसके बाद 7 जनवरी, 2025 को साहिल को गिरफ्तार किया गया और उसने नजमा के घर की पहचान की। जांच के दौरान, कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) के विश्लेषण से पता चला कि 1 नवंबर, 2024 और 5 जनवरी, 2025 के बीच साहिल और नजमा के बीच 78 बार फोन पर संपर्क हुआ था। 14 फरवरी, 2025 को नजमा के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए गए, जिसके बाद उसे भगोड़ा (proclaimed offender) घोषित कर दिया गया। अंततः 11 जून, 2025 को नजमा को गिरफ्तार कर लिया गया।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की दलीलें: याचिकाकर्ता नजमा के वकील ने तर्क दिया कि उसकी गिरफ्तारी पूरी तरह से सह-आरोपी के पुलिस हिरासत में दिए गए बयान पर आधारित है, जिसका इस स्तर पर कोई ठोस साक्ष्य मूल्य नहीं है। बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि सीडीआर केवल याचिकाकर्ता और सह-आरोपी के बीच टेलीफोन पर हुए संपर्क को दर्शाता है, बिना किसी बातचीत की सामग्री, उद्देश्य या किसी ऐसे आपराधिक कृत्य का खुलासा किए जो अवैध व्यापार में उसकी संलिप्तता को साबित कर सके।

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि उसे जांच में शामिल होने के लिए कभी कोई नोटिस नहीं मिला क्योंकि वे उसके ससुराल के पते पर भेजे गए थे, जहां वह अपने पति की मृत्यु के बाद से नहीं रह रही है। इसके अतिरिक्त, अदालत को बताया गया कि नजमा एक ‘सिंगल मदर’ है और अपने नाबालिग बच्चों की एकमात्र देखभालकर्ता है, जिनमें से एक बच्चा ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित है।

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राज्य की दलीलें: राज्य के अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। राज्य ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता एक आदतन अपराधी है और एक अन्य एनडीपीएस मामले (एफआईआर संख्या 178/2021, पीएस भलस्वा डेयरी) में भी शामिल है। यह आशंका भी जताई गई कि यदि उसे जमानत दी गई, तो वह इसी तरह के अपराध फिर से कर सकती है।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी

जस्टिस सौरभ बनर्जी ने गौर किया कि एफआईआर में याचिकाकर्ता का नाम नहीं था, उसे कोई विशिष्ट भूमिका नहीं सौंपी गई थी, उसे मौके से गिरफ्तार नहीं किया गया था और उसके पास से किसी भी मादक पदार्थ की बरामदगी नहीं हुई।

अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ अभियोजन पक्ष का पूरा मामला पूरी तरह से एक सह-आरोपी के खुलासे पर आधारित है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले तूफान सिंह बनाम तमिलनाडु राज्य [(2021) 4 SCC 1] का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा बयान “अपने आप में बिना किसी पुष्टि के स्वीकार्य नहीं है” (per se is not admissible without there being any corroboration)।

इसके अलावा, कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स पर निर्भरता को संबोधित करते हुए, कोर्ट ने कहा कि “जब सीडीआर में मौजूद संचार का उद्देश्य या संदर्भ रहस्य के घेरे में हो, तो यह याचिकाकर्ता को जमानत देने का एक आधार है।” अदालत ने माना कि इन कॉल्स के संदर्भ की व्याख्या करना एक ऐसा पहलू है जिसकी जांच ट्रायल (मुकदमे) के चरण में की जानी चाहिए।

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फैसला

हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार कर लिया और याचिकाकर्ता नजमा को 50,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के एक जमानतदार (श्योरिटी) की शर्त पर नियमित जमानत दे दी।

अदालत ने कई सख्त शर्तें लगाईं, जिनमें शामिल हैं:

  • याचिकाकर्ता अदालत की पूर्व अनुमति के बिना एनसीटी दिल्ली (NCT of Delhi) से बाहर नहीं जाएगी।
  • वह अपना पासपोर्ट जांच अधिकारी (IO) को सौंपेगी; यदि उसके पास पासपोर्ट नहीं है तो उसे इस आशय का हलफनामा दाखिल करना होगा।
  • वह सुनवाई की हर तारीख पर निचली अदालत (Trial Court) के समक्ष उपस्थित होगी।
  • वह अपने सभी चालू मोबाइल नंबर जांच अधिकारी को प्रदान करेगी और मोबाइल की लोकेशन हमेशा ‘ऑन’ रखेगी।
  • वह हर महीने के पहले सप्ताह में पीएस जहांगीर पुरी में जांच अधिकारी के समक्ष रिपोर्ट करेगी।
  • वह किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होगी, सबूतों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगी और अभियोजन पक्ष के गवाहों से संपर्क नहीं करेगी।
  • केस का शीर्षक: नजमा बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली)
  • केस नंबर: बेल एप्लीकेशन (BAIL APPLN.) 4335/2025

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