दिल्ली हाईकोर्ट ने चांदनी चौक स्थित एक मिठाई की दुकान के मालिक को जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम के तहत दोषी ठहराए जाने के निर्णय को बरकरार रखा है। दुकान के मालिक पर आरोप था कि उसने बर्तन धोने और फर्श की सफाई से उत्पन्न अपशिष्ट जल को बिना किसी शोधन के सार्वजनिक नाली में छोड़ा।
न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा ने कहा कि छोटे-छोटे खाद्य प्रतिष्ठान, जैसे कि मिठाई की दुकानें, ढाबे और रेस्टोरेंट मिलकर जब अनट्रीटेड अपशिष्ट को नालियों में छोड़ते हैं, तो वे नदियों के प्रदूषण में भारी योगदान करते हैं। उन्होंने कहा, “जल स्रोतों के प्रदूषण के गंभीर और दीर्घकालिक दुष्परिणाम होते हैं। पर्यावरणीय मानदंडों का पालन सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।”
यह मामला जून 2000 का है, जब एम/एस कंवरजी राज कुमार नामक इकाई को बिना अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र के संचालित होते हुए पाया गया था। आरोप था कि दुकान में मिठाई और नमकीन बनाने के लिए उपयोग किए जाने वाले बर्तनों, सांचों और फर्श की सफाई के दौरान उत्पन्न गंदा पानी सीधे पब्लिक सीवर में छोड़ा जा रहा था, और वह भी बिना आवश्यक अनुमति के।
वर्ष 2017 में निचली अदालत ने मिठाई दुकान के मालिक को दोषी करार देते हुए दो साल की सजा और ₹2 लाख का जुर्माना लगाया था।
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा में नरमी बरती। अदालत ने ध्यान में लिया कि—
- यह घटना लगभग 24 साल पुरानी है,
- याचिकाकर्ता की उम्र लगभग 59 वर्ष है, और
- जल अधिनियम में 2019 में किए गए संशोधन के तहत अब इस अपराध के लिए कारावास का प्रावधान हटा दिया गया है।
इन तथ्यों को देखते हुए, न्यायालय ने दो साल की जेल की सजा को रद्द कर दिया, लेकिन आर्थिक दंड को बढ़ा दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता:
- दो महीने के भीतर दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) को ₹10 लाख का अतिरिक्त जुर्माना अदा करे (पूर्व में लगाए गए ₹2 लाख के अतिरिक्त), और
- नगर वन विभाग के साथ समन्वय कर चांदनी चौक क्षेत्र या विभाग द्वारा चिन्हित किसी अन्य स्थान पर 100 पेड़ लगाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यवसाय चाहे छोटे पैमाने पर हो या बड़े पर, पर्यावरणीय कानूनों का पालन करना सभी के लिए अनिवार्य है।

