दिल्ली हाईकोर्ट ने लगाई फटकार: MCD को RTI अधिनियम की धारा 4 के तहत जानकारी सार्वजनिक करने से नहीं मिल सकती छूट

दिल्ली हाईकोर्ट ने नगर निगम दिल्ली (MCD) को सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 4 के तहत आवश्यक जानकारी स्वप्रेरणा से वेबसाइट पर सार्वजनिक न करने पर कड़ी फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने कहा कि कोई भी सार्वजनिक प्राधिकरण इस कानूनी दायित्व से छूट नहीं पा सकता, MCD भी नहीं।

यह टिप्पणी एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसे NGO ‘Centre for Youth, Culture, Law and Environment’ ने दायर किया था। याचिका में मांग की गई थी कि MCD की विधायी कार्यवाहियां, सदन की कार्यवृत्तियाँ, स्थायी समितियों के प्रस्ताव और अन्य जन-संवेदनशील दस्तावेज़ उसकी वेबसाइट पर समयबद्ध ढंग से प्रकाशित किए जाएं।

कोर्ट ने MCD के रवैये पर नाराज़गी जताते हुए तल्ख़ टिप्पणी की:

“आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने यह कार्य 20 साल बाद करना शुरू किया। हम अत्यंत आभारी हैं।”

जजों ने यह भी पूछा कि,

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“क्या प्रक्रिया? यह जानकारी 120 दिनों के भीतर अपलोड करना आपका कानूनी दायित्व है और फिर नियमित अंतराल पर। आपने अब तक क्या किया? यह अधिनियम 2005 में आया था, अब 20 साल हो चुके हैं।”

अदालत ने साफ़ किया कि RTI अधिनियम की धारा 4 का उद्देश्य ही यह है कि नागरिकों को suo motu यानी स्वप्रेरणा से जानकारी मिल सके और उन्हें RTI आवेदन की प्रक्रिया में कम से कम जाना पड़े। अदालत ने दो टूक कहा,

“इस संबंध में किसी भी प्राधिकरण को कोई छूट नहीं दी जा सकती, MCD को भी नहीं।”

MCD की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि वेबसाइट पर जानकारी अपलोड करने की प्रक्रिया चल रही है और यह सक्षम प्राधिकारी के विचाराधीन है। लेकिन अदालत ने इस जवाब से असंतोष जताया और आदेश दिया कि MCD यह बताए कि RTI की धारा 4 के पालन के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं—इसके लिए हलफनामा दायर किया जाए।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि RTI के एक जवाब में MCD ने माना है कि अब तक कोई भी विधायी रिकॉर्ड वेबसाइट पर अपलोड नहीं किया गया है क्योंकि तीनों पूर्ववर्ती निगमों के विलय के बाद वेबसाइट को अपडेट करने का कार्य अभी चल रहा है।

MCD ने यह भी तर्क दिया कि उसके प्रस्तावों को वेबसाइट पर प्रकाशित करने के लिए कोई नियम या दिशानिर्देश नहीं हैं क्योंकि यह दिल्ली नगर निगम अधिनियम की धारा 86 के अधीन संचालित होता है। कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा:

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“धारा 86 का जानकारी के प्रसार से कोई लेना-देना नहीं है।”

अदालत ने कहा कि स्पष्ट रूप से यह सिद्ध होता है कि RTI अधिनियम की धारा 4 के तहत MCD पर जो कानूनी दायित्व था, उसका पालन 20 वर्षों बाद भी नहीं हुआ है।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह मामला दिल्ली के करोड़ों नागरिकों से जुड़ा है। उन्होंने यह भी पूछा कि जब आगामी वर्ष का बजट तैयार है तो उसे वेबसाइट पर अपलोड क्यों नहीं किया जा सकता।

इस पर कोर्ट ने कहा कि बजट तब ही वेबसाइट पर डाला जा सकता है जब वह सदन द्वारा पारित हो। कोर्ट ने यह भी जोड़ा:

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“हमें वही हासिल करना चाहिए जो कानूनन संभव और वैध हो।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिलहाल वह इस मुद्दे पर prima facie राय बना रही है और मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में निर्धारित की है। साथ ही यह दोहराया कि RTI कानून के पारदर्शिता सिद्धांतों का तत्काल पालन आवश्यक है।

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