दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) को छात्र संघ (डूसू) के पूर्व अध्यक्ष रौनक खत्री की कानून की डिग्री और सभी मार्कशीट तुरंत जारी करने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई स्पष्ट कानूनी या वैधानिक नियम न हो, तब तक संस्थान किसी छात्र की डिग्री या अंकपत्र को ऐसे बकाये की वसूली के लिए नहीं रोक सकते, जिसका संबंध उसके अकादमिक पाठ्यक्रम से न हो।
जस्टिस जसमीत सिंह की पीठ ने 30 सितंबर को दिए अपने फैसले—जिसे 12 अक्टूबर को सार्वजनिक किया गया—में खत्री की याचिका को स्वीकार कर लिया। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि विश्वविद्यालय प्रशासन के पास ऐसा कोई कानूनी अधिकार नहीं है जिसके तहत गैर-शैक्षणिक बकाये के चलते किसी छात्र के शैक्षणिक प्रमाणपत्र रोके जाएं। हालांकि, हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय को यह छूट भी दी है कि वह अपने कथित और वैध बकाये की वसूली के लिए अलग से कानूनी वाद दायर कर सकता है।
बार काउंसिल में पंजीकरण न होने से अटका था करियर
दस्तावेज न मिलने की वजह से रौनक खत्री दिल्ली बार काउंसिल में बतौर अधिवक्ता अपना पंजीकरण नहीं करा पा रहे थे, जिससे उनकी वकालत की प्रैक्टिस शुरू होने में बाधा आ रही थी।
खत्री ने जनवरी 2023 में दिल्ली विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ लॉ स्थित कैंपस लॉ सेंटर में तीन वर्षीय एलएलबी पाठ्यक्रम में दाखिला लिया था। अगस्त 2025 में उन्होंने अपनी अंतिम परीक्षाएं उत्तीर्ण कर लीं। विश्वविद्यालय ने उनके सभी शैक्षणिक बकाये को मंजूरी देते हुए अनापत्ति भी दे दी थी। इसके बावजूद, नवंबर 2025 में विश्वविद्यालय ने यह कहते हुए डिग्री रोक दी कि खत्री पर 8 लाख रुपये से अधिक का गैर-शैक्षणिक बकाया बाकी है।
गेस्ट हाउस और खान-पान के बकाये पर हुआ था विवाद
विश्वविद्यालय प्रशासन का आरोप था कि 2024-25 के दौरान डूसू अध्यक्ष पद पर रहते हुए खत्री ने दिसंबर 2024 से अगस्त 2025 के बीच डीयू के इंटरनेशनल गेस्ट हाउस में कमरे बुक कराए और खान-पान की सेवाएं लीं, जिसका 8 लाख रुपये से ज्यादा का बिल लंबित है।
इसके जवाब में खत्री की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन, सिद्धार्थ यादव और रत्नेश शर्मा ने अदालत में दलील पेश की। वकीलों ने बताया कि इंटरनेशनल गेस्ट हाउस का इस्तेमाल किसी निजी कार्य के लिए नहीं, बल्कि डूसू अध्यक्ष की आधिकारिक हैसियत से किया गया था। यह सारी बुकिंग डूसू सलाहकार और प्रॉक्टर कमेटी की मंजूरी और अनुमति के बाद ही कराई गई थी।
याचिकाकर्ता की दलील थी कि आधिकारिक अतिथियों और छात्र कल्याण गतिविधियों से जुड़े ऐसे खर्च डूसू के फंड से वहन किए जाते हैं, न कि किसी पदाधिकारी से व्यक्तिगत तौर पर वसूले जाते हैं।
दस्तावेज रोकने के लिए कोई वैधानिक प्रावधान नहीं: अदालत
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सिंह ने पाया कि दिल्ली विश्वविद्यालय ऐसा कोई कानूनी प्रावधान या नियम पेश नहीं कर सका, जो खान-पान और कमरों की बुकिंग के भुगतान न होने पर डिग्री और मार्कशीट रोकने की अनुमति देता हो। किसी भी कानूनी आधार के अभाव को देखते हुए हाईकोर्ट ने खत्री के पक्ष में फैसला सुनाते हुए विश्वविद्यालय को उनकी डिग्री और अंकपत्र जारी करने का निर्देश दिया।

