केरल हाईकोर्ट ने कोट्टायम जिले के ईराट्टूपेट्टा स्थित मुस्लिम गर्ल्स हायर सेकेंडरी स्कूल को को-एजुकेशनल (सह-शिक्षा) संस्थान में तब्दील करने की अनुमति देने वाले सिंगल जज के आदेश को रद्द कर दिया है। डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि इस पूरे मामले पर उसके कानूनी गुण-दोषों के आधार पर दोबारा सुनवाई की जरूरत है। हालांकि, कोर्ट ने स्कूल में दाखिला ले चुके 28 बालकों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए अंतरिम राहत दी है और यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है, जिससे याचिका पर अंतिम निर्णय आने तक उनकी पढ़ाई प्रभावित नहीं होगी।
जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्णा की डिवीजन बेंच ने 8 अक्टूबर को यह आदेश पास किया। अदालत आसपास के दो स्कूलों के प्रबंधकों की उन अपीलों पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें बालिका विद्यालय को को-एड स्कूल बनाए जाने का कड़ा विरोध किया गया था। कोर्ट ने कहा कि कक्षा 5 से 10 तक में दाखिला लेने वाले इन 28 लड़कों को दोनों पक्षों के बीच चल रहे कानूनी विवाद की जानकारी नहीं थी। ऐसे में उनके हितों की सुरक्षा के लिए मामले का निपटारा होने तक वर्तमान स्थिति को जारी रखना आवश्यक है।
पड़ोसी स्कूलों की दलील: बिना पक्ष सुने गर्मियों की छुट्टियों में दिया गया आदेश
यह कानूनी विवाद तब गहराया जब पूंजार के एक स्कूल प्रबंधक समेत दो नजदीकी शिक्षण संस्थानों के प्रबंधन ने सिंगल जज के निर्देश को चुनौती दी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ईराट्टूपेट्टा के बालिका विद्यालय में लड़कों को दाखिला दिए जाने से आसपास के मौजूदा स्कूलों में छात्र संख्या घटेगी और उनके प्रवेश पर सीधा असर पड़ेगा।
अपीलकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि बालिका विद्यालय के प्रबंधन ने गर्मियों की छुट्टियों के दौरान यह अनुकूल आदेश हासिल किया। इस प्रक्रिया में न तो पड़ोसी स्कूलों को पक्षकार बनाया गया और न ही उन्हें अपनी आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर मिला।
डिवीजन बेंच ने माना कि सिंगल जज ने मामले को शुरुआती स्तर पर ही निस्तारित कर दिया, जिससे प्रतिवादी अधिकारियों और प्रभावित पक्षों को अपने जवाबी हलफनामे प्रस्तुत करने का मौका नहीं मिल सका। इसके अलावा, सह-शिक्षा की इसी प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका पहले से ही हाईकोर्ट में लंबित थी। बेंच ने रेखांकित किया कि समान विषय से जुड़े होने के कारण दोनों मामलों की एक साथ सुनवाई की जानी चाहिए थी।
नगरपालिका की एनओसी और अनुमति को लेकर उपजा विवाद
विवाद की शुरुआत तब हुई जब ईराट्टूपेट्टा स्कूल के प्रबंध ट्रस्टियों, आम सभा और पैरेंट-टीचर एसोसिएशन (पीटीए) ने इस वर्ष 17 फरवरी को शैक्षणिक सत्र 2026-27 से स्कूल को को-एड बनाने का प्रस्ताव पारित किया।
केरल सरकार के 21 जून 2022 के परिपत्र के अनुसार, सह-शिक्षा शुरू करने के इच्छुक किसी भी स्कूल को सामान्य शिक्षा विभाग में आवेदन करने से पूर्व संबंधित स्थानीय निकाय से मंजूरी लेना अनिवार्य है। इसके तहत स्कूल प्रबंधक ने अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) के लिए 18 फरवरी को ईराट्टूपेट्टा नगरपालिका में आवेदन किया। स्कूल का आरोप था कि प्रतिद्वंद्वी स्कूल की आपत्तियों और विधानसभा चुनाव की आदर्श आचार संहिता का हवाला देकर नगरपालिका ने निर्धारित समयसीमा में फैसला नहीं लिया।
इसके बाद हाईकोर्ट के हस्तक्षेप पर निकाय को तीन सप्ताह में निर्णय लेने को कहा गया। तय समय पर कार्रवाई न होने पर स्कूल ने दोबारा याचिका लगाई। 28 अप्रैल को सिंगल जज ने नगरपालिका को तीन दिनों के भीतर अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया और कहा कि यदि निकाय विफल रहता है, तो स्कूल प्रबंधन बिना उसकी मंजूरी के भी सह-शिक्षा की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है।
शिक्षा नियमों की अनदेखी पर दोबारा होगी सुनवाई
सिंगल जज के आदेश के बाद ईराट्टूपेट्टा नगरपालिका ने 2 मई को एनओसी जारी कर दी और सामान्य शिक्षा निदेशक ने 14 मई को सह-शिक्षा की औपचारिक अनुमति प्रदान की। इसी आधार पर स्कूल ने 28 बालकों को प्रवेश दे दिया।
डिवीजन बेंच ने सिंगल जज का आदेश निरस्त करते हुए कहा कि केरल शिक्षा नियमों (केईआर) के प्रावधानों के तहत सामान्य शिक्षा निदेशक को सह-शिक्षा की मंजूरी देने से पहले कई अनिवार्य पहलुओं की पड़ताल करनी होती है। पीठ ने यह भी माना कि मामले में विचारणीय कानूनी बिंदु मौजूद हैं—जैसे कि क्या स्कूल प्रबंधन ने परस्पर विरोधी राहतों की मांग की थी और क्या यह दावा पूर्व की कार्यवाही में ही उठाया जाना चाहिए था, जिसके चलते अब इसे उठाने पर कानूनी रोक लग सकती है।

