डायरेक्टर के व्यक्तिगत खाते से जारी चेक सम्मन चरण में धारा 138 NI एक्ट के तहत कंपनी की जिम्मेदारी को खारिज नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल इस आधार पर कि चेक किसी डायरेक्टर के व्यक्तिगत खाते से जारी किया गया था, सम्मन जारी करने के चरण में कंपनी को ‘नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881’ (NI एक्ट) की धारा 138 के तहत दायित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता। जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने अवलोकन किया कि यदि ऐसा चेक कंपनी के दायित्वों के लिए दी गई व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ा है, तो प्रारंभिक स्तर पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इसे कंपनी के कर्ज को चुकाने के लिए जारी नहीं किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

एसआरके देवबिल्ड प्राइवेट लिमिटेड (लिक्विडेटर के माध्यम से) ने पटियाला हाउस कोर्ट के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा 23 अगस्त 2018 को जारी सम्मन आदेश को चुनौती दी थी। यह मामला 5 जून 2018 के 2 करोड़ रुपये के चेक के बाउंस होने से संबंधित था। इसके अलावा, कंपनी ने मजिस्ट्रेट द्वारा 7 जून 2023 को दिए गए उस आदेश को भी चुनौती दी, जिसमें कार्यवाही पर रोक लगाने की लिक्विडेटर की अर्जी खारिज कर दी गई थी।

उल्लेखनीय है कि चेक बाउंस होने के लगभग दो साल बाद, जनवरी 2020 में कंपनी के खिलाफ इन्सॉल्वेंसी (CIRP) शुरू हुई थी और फरवरी 2021 में इसके लिक्विडेशन का आदेश दिया गया था।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से: याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि चेक डायरेक्टर (आरोपी नंबर 2) के व्यक्तिगत खाते से जारी किया गया था न कि कंपनी के खाते से, इसलिए कंपनी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने ‘इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड’ (IBC) की धारा 33(5) का हवाला देते हुए कहा कि लिक्विडेशन की स्थिति में कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही वर्जित है। याचिकाकर्ता ने Pepsi Foods Ltd. vs. Special Judicial Magistrate मामले का हवाला देते हुए कहा कि सम्मन जारी करना एक गंभीर मामला है और मजिस्ट्रेट को इसे यांत्रिक रूप से नहीं करना चाहिए।

प्रतिवादी नंबर 2 की ओर से: शिकायतकर्ता के वकील ने याचिका दायर करने में हुई अत्यधिक देरी पर सवाल उठाए। उन्होंने दलील दी कि यह चेक 31 मार्च 2017 की ‘पर्सनल गारंटी डीड’ के तहत कंपनी की संयुक्त देनदारी चुकाने के लिए जारी किया गया था। उन्होंने यह भी बताया कि आरोपी डायरेक्टर बार-बार कोर्ट में पेश होने में विफल रहे हैं, जिसके कारण उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट भी जारी करने पड़े।

READ ALSO  केरल HC ने अभिनेता दिलीप के ख़िलाफ़ 2017 के अभिनेत्री यौन उत्पीड़न मामले में जांच रद्द करने से इनकार किया

हाईकोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

हाईकोर्ट ने डायरेक्टर के व्यक्तिगत खाते और कंपनी की देनदारी के बीच के कानूनी संबंध का गहराई से विश्लेषण किया।

1. व्यक्तिगत खाता बनाम कॉर्पोरेट देनदारी कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि व्यक्तिगत खाते से चेक जारी होने से कंपनी बच सकती है। जस्टिस भंभानी ने कहा:

“उक्त चेक, हालांकि डायरेक्टर-मिस्टर सुभाष चंद अग्रवाल के व्यक्तिगत खाते से जारी किया गया था, लेकिन यह 31.03.2017 की पर्सनल गारंटी डीड के अनुसार जारी किया गया था, जिसके तहत उक्त डायरेक्टर ने कंपनी के दायित्वों को पूरा करने की गारंटी दी थी। इसलिए, इस स्तर पर यह अनुमान लगाना संभव नहीं है कि चेक कंपनी द्वारा देय ऋण के भुगतान के लिए जारी नहीं किया गया था।”

2. IBC और लिक्विडेशन का प्रभाव कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 138 का अपराध CIRP या लिक्विडेशन प्रक्रिया शुरू होने से काफी पहले ही घटित हो चुका था। कोर्ट ने कहा कि बाद में होने वाली इन्सॉल्वेंसी कार्यवाही इस आपराधिक दायित्व को खत्म कर देगी या नहीं, यह ट्रायल का विषय है।

READ ALSO  Delhi High Court Stays Arvind Kejriwal's Release Following ED's Urgent Appeal

3. सम्मन आदेश के लिए न्यायिक मानक Mehmood Ul Rehman vs. Khazir Mohammad Tunda और Sunil Todi vs. State of Gujarat जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सम्मन जारी करते समय मजिस्ट्रेट को अपना दिमाग लगाना चाहिए, लेकिन इसके लिए विस्तृत कारण बताना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट के अनुसार:

“हालांकि मजिस्ट्रेट को शिकायत में दिए गए बयानों और साक्ष्यों पर विचार करना आवश्यक है, लेकिन NI एक्ट की धारा 138 की कार्यवाही में सम्मन जारी करने के चरण में विस्तृत कारण बताना अनिवार्य नहीं है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने पाया कि हालांकि 23 अगस्त 2018 का सम्मन आदेश संक्षिप्त था और उसमें अपराध के तत्वों का विस्तार से वर्णन नहीं था, लेकिन रिकॉर्ड में मौजूद चेक, रिटर्न मेमो और वैधानिक नोटिस एक ‘प्रथम दृष्टया’ मामला बनाने के लिए पर्याप्त थे।

कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि चूंकि सम्मन आदेश 2018 का है और रिकॉर्ड से अपराध का आधार स्पष्ट है, इसलिए इसमें हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही निचली अदालत की कार्यवाही पर लगी रोक भी हटा दी गई।

READ ALSO  दिल्ली हाई कोर्ट ने MCD की स्थायी समिति के चुनावों के दौरान फोन के इस्तेमाल पर याचिका वापस लेने की अनुमति दी

केस विवरण

केस का नाम: एसआरके देवबिल्ड प्राइवेट लिमिटेड बनाम दिल्ली सरकार व अन्य

केस नंबर: CRL.M.C. 5337/2024

पीठ: जस्टिस अनूप जयराम भंभानी

निर्णय की तिथि: 26 फरवरी 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles