CrPC की धारा 2(स) | ‘पोस्ट’ भी पुलिस स्टेशन मानी जाएगी; किसी विशेष स्थान की अधिसूचना अनिवार्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) द्वारा दर्ज कई एफआईआर को अधिकार क्षेत्र के अभाव में रद्द कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को “अत्यधिक तकनीकी” करार देते हुए कहा कि आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के तहत ACB कार्यालयों को पुलिस स्टेशन घोषित करने संबंधी पूर्ववर्ती अधिसूचनाएं नए राज्य आंध्र प्रदेश में भी प्रभावी बनी रहीं।

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरैश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने संयुक्त निदेशक (रायलसीमा), एंटी-करप्शन ब्यूरो, आंध्र प्रदेश द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए विभिन्न प्रतिवादियों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही बहाल कर दी।

मामला क्या था

यह विवाद आंध्र प्रदेश राज्य के विभाजन के बाद विजयवाड़ा स्थित ACB कार्यालय द्वारा दर्ज एफआईआर की वैधता से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने इन एफआईआर को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि विजयवाड़ा स्थित ACB कार्यालय को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 2(स) के तहत विशेष रूप से “पुलिस स्टेशन” घोषित नहीं किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इस निष्कर्ष को पलटते हुए स्पष्ट किया कि धारा 2(स) के तहत किसी विशिष्ट स्थान को अधिसूचित किया जाना आवश्यक नहीं है, क्योंकि किसी पुलिस अधिकारी द्वारा संचालित “पोस्ट” भी पुलिस स्टेशन के दायरे में आती है।

पृष्ठभूमि

यह मामला वर्ष 2016 से 2020 के बीच विजयवाड़ा स्थित एंटी-करप्शन ब्यूरो, सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन यूनिट में दर्ज उन एफआईआर से संबंधित था, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दर्ज की गई थीं।

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आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के तहत अविभाजित आंध्र प्रदेश राज्य को तेलंगाना और शेष आंध्र प्रदेश में विभाजित किया गया था। इसके बाद ACB का प्रशासनिक ढांचा हैदराबाद से नए राजधानी क्षेत्र विजयवाड़ा स्थानांतरित किया गया।

आरोपियों ने इन एफआईआर को हाईकोर्ट में यह कहते हुए चुनौती दी कि विजयवाड़ा ACB कार्यालय को CrPC की धारा 2(स) के तहत पुलिस स्टेशन घोषित करने वाली कोई विशिष्ट अधिसूचना राजपत्र में प्रकाशित नहीं हुई थी, इसलिए वहां एफआईआर दर्ज करने का अधिकार नहीं था। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए एफआईआर रद्द कर दी थीं।

पक्षकारों के तर्क

अपीलकर्ता (ACB) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 की धाराओं 100, 101 और 102 की अनदेखी की। उन्होंने कहा कि अविभाजित आंध्र प्रदेश द्वारा जारी 12 सितंबर 2003 की जी.ओ.एम.एस. संख्या 268 के माध्यम से ACB कार्यालयों को पूरे राज्य के लिए पुलिस स्टेशन घोषित किया गया था, और यह व्यवस्था विभाजन के बाद भी जारी रही।

प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि CrPC की धारा 2(स) के तहत अधिसूचना अनिवार्य है और राज्य सरकार ने स्वयं इस कमी को 2022 में जारी सरकारी आदेश से स्वीकार किया। इसलिए, विजयवाड़ा इकाई द्वारा दर्ज एफआईआर अधिकार क्षेत्र के बिना थीं।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

अदालत ने CrPC की धारा 2(स) और आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के प्रावधानों की विस्तार से व्याख्या की।

धारा 2(स) CrPC की व्याख्या पर, पीठ ने कहा कि यह परिभाषा दो अलग-अलग श्रेणियों—‘पोस्ट’ और ‘स्थान’—से संबंधित है। यह परिभाषा “समावेशी और परिपूर्ण दोनों” है।
अदालत ने कहा:

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“यह स्पष्ट है कि परिभाषा के अनुसार किसी विशेष स्थान को पुलिस स्टेशन घोषित करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि किसी पुलिस अधिकारी द्वारा संचालित एक ‘पोस्ट’ भी पुलिस स्टेशन मानी जाएगी।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि CrPC की धारा 2(ओ) एक समावेशी परिभाषा है, जो स्टेशन हाउस में तैनात उस पुलिस अधिकारी को संदर्भित करती है, जो प्रभारी अधिकारी के बाद अगले पद पर हो और कांस्टेबल से ऊपर रैंक का हो, जब तक राज्य सरकार अन्यथा निर्देश न दे।

पुनर्गठन अधिनियम और कानूनों की निरंतरता पर, अदालत ने 2014 अधिनियम की धाराओं 100, 101 और 102 पर भरोसा किया।
अदालत ने कहा कि धारा 2(फ) के तहत “कानून” की परिभाषा में अधिसूचनाएं भी शामिल हैं, इसलिए 2003 की सरकारी अधिसूचना विभाजन के बाद भी प्रभावी रही।

न्यायमूर्ति सुंदरैश ने कहा:

“आंध्र प्रदेश राज्य वही राज्य बना हुआ है; केवल उसके कुछ क्षेत्रों को अलग कर एक नया राज्य बनाया गया है… धारा 102 किसी अन्य व्याख्या की गुंजाइश नहीं छोड़ती… जब अदालतों को मौजूदा कानून का पालन करना है, तो यह स्वयंसिद्ध है कि यही बाध्यता कार्यपालिका और अन्य सभी प्राधिकरणों पर भी लागू होती है।”

हाईकोर्ट के दृष्टिकोण पर, सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा:

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“हमारे विचार में हाईकोर्ट का दृष्टिकोण न्याय का उपहास है। यदि केवल अत्यधिक तकनीकी आधार पर एफआईआर रद्द की जाती हैं, तो हाईकोर्ट का कर्तव्य था कि वह उस अधिकार क्षेत्र के संबंध में कानून स्पष्ट करे जो अन्यथा विद्यमान है।”

2022 के स्पष्टीकरण आदेश पर, अदालत ने हाईकोर्ट की इस राय को खारिज कर दिया कि यह आदेश पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आदेश मात्र एक स्पष्टीकरण है, जिसमें 2014 अधिनियम के प्रावधानों का उल्लेख कर स्थिति को स्पष्ट किया गया है।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के विवादित फैसले को रद्द कर दिया और निम्न निर्देश दिए:

  • ACB को जांच आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता होगी।
  • अंतिम रिपोर्ट छह माह के भीतर दाखिल की जाएगी।
  • अपीलकर्ता जांच के दौरान आरोपियों की गिरफ्तारी जैसे दमनात्मक कदम नहीं उठाएंगे।
  • प्रतिवादी जांच में सहयोग करेंगे।
  • हाईकोर्ट एफआईआर या लंबित जांच को लेकर कोई नई चुनौती स्वीकार नहीं करेगा।
  • जांच पूरी होने के बाद प्रतिवादियों को अन्य कानूनी मुद्दे उठाने की स्वतंत्रता होगी।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: द जॉइंट डायरेक्टर (रायलसीमा), एंटी-करप्शन ब्यूरो, आंध्र प्रदेश एवं अन्य बनाम दयम पेडा रंगा राव एवं अन्य
केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्याएं, 2026 [@ SLP (क्रिमिनल) संख्या 14321-14333/2025]
पीठ: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरैश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा

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