केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में ‘संवैधानिक नैतिकता’ के सिद्धांत को दी चुनौती; एडल्ट्री और समलैंगिकता पर आए फैसलों को बताया ‘गलत कानून’

एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम में, केंद्र सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि एडल्ट्री (व्यभिचार) और समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने वाले ऐतिहासिक फैसले “संवैधानिक नैतिकता” (Constitutional Morality) के व्यक्तिपरक अनुप्रयोग पर आधारित थे और इन्हें “सही कानून नहीं” घोषित किया जाना चाहिए।

यह दलील मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-जजों की संविधान पीठ के सामने पेश की गई। यह पीठ वर्तमान में सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। अदालत इस समय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत न्यायिक समीक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाएं तय कर रही है।

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि ‘संवैधानिक नैतिकता’ केवल एक भावना है, न कि कोई ऐसा ठोस सिद्धांत जिसके आधार पर किसी कानून की वैधता का परीक्षण किया जा सके। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों वाली शासन व्यवस्था में कानून बनाने में हमेशा “बहुमत के दृष्टिकोण” की प्रधानता होती है, और इस पृष्ठभूमि में नैतिकता को परिभाषित करना जटिल है।

मेहता ने कहा, “नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ के मामले में की गई टिप्पणियों ने ‘संवैधानिक नैतिकता’ की अवधारणा को कानून की न्यायिक समीक्षा के लिए एक मानक के रूप में स्थापित कर दिया है। हमारा मानना है कि यह शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) और ‘चेक एंड बैलेंस’ के सिद्धांत के विपरीत है।”

सॉलिसिटर जनरल ने आगे दावा किया कि इस अवधारणा को न्यायिक समीक्षा के लिए एक स्टैंडअलोन टेस्ट के रूप में मानना अनुच्छेद 13 के जनादेश के खिलाफ जाता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करें।

READ ALSO  डीपफेक वीडियो पर तीन साल जेल और जुर्माना भ— केंद्र ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को याद दिलाया

केंद्र का मुख्य ध्यान 2018 के दो प्रमुख फैसलों पर था:

  1. जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ: जिसमें आईपीसी की धारा 497 (एडल्ट्री) को असंवैधानिक करार दिया गया था।
  2. नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ: जिसमें आईपीसी की धारा 377 के तहत समलैंगिकता को आंशिक रूप से अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया था।

मेहता ने तर्क दिया कि जोसेफ शाइन मामले का फैसला एक ऐसे आधार पर आगे बढ़ा जो न केवल सामाजिक नैतिकता के खिलाफ था, बल्कि संवैधानिक नैतिकता के भी विपरीत था। हालांकि केंद्र ने स्पष्ट किया कि वह एडल्ट्री कानून को फिर से लागू करने की मांग नहीं कर रहा है, लेकिन उसने अदालत से आग्रह किया कि उस मामले में दिए गए तर्क और कानून को अमान्य घोषित किया जाए।

सॉलिसिटर जनरल ने पिछले फैसलों में विदेशी लॉ जर्नल, पॉडकास्ट और शैक्षणिक लेखों पर सुप्रीम कोर्ट की निर्भरता की कड़ी आलोचना की। उन्होंने विशेष रूप से जोसेफ शाइन के फैसले में अमेरिकी कानूनी विद्वानों और भारतीय शिक्षाविदों के उद्धरणों का उल्लेख किया।

मेहता ने तर्क दिया, “अदालतों को चुनिंदा अकादमिक लेखों या विदेशी राय से लिए गए ‘व्यक्तिगत और व्यक्तिपरक विचारों’ पर आधारित कानून नहीं बनाना चाहिए।” उन्होंने कहा कि ऐसे उद्धरणों को संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत बाध्यकारी कानून का दर्जा नहीं मिलना चाहिए।

READ ALSO  बड़ी खबर: SC कॉलेजियम ने जस्टिस यशवंत वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित करने कि सिफारिश की

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी एडल्ट्री के फैसले में उद्धृत कुछ विद्वानों पर सवाल उठाए और पूछा, “यह सेगल (Segal) कौन हैं? उनका यहां ऐसे उल्लेख किया गया है जैसे कि वह दूसरे अंबेडकर हों?”

नौ-जजों की यह पीठ वर्तमान में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सात विशिष्ट प्रश्नों पर विचार कर रही है। ये प्रश्न 2019 के सबरीमाला संदर्भ आदेश के बाद सामने आए थे, जिसमें जांच के दायरे को बढ़ाते हुए दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना और पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिरों में प्रवेश जैसी प्रथाओं को भी शामिल किया गया था।

READ ALSO  केरल हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावे में 5 वर्षीय नाबालिग की काल्पनिक आय को स्पष्ट किया 

इस पीठ में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना, न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्न बी. वराले, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles