देश की चुनावी संस्था, निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने एक बड़ा फैसला लिया है। मुख्य न्यायाधीश ने खुद को और अपनी बेंच को उन जनहित याचिकाओं (PILs) की सुनवाई से अलग कर लिया है, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति से संबंधित नए कानून को चुनौती दी गई है।
जस्टिस जोयमालया बागची और जस्टिस विपुल एम. पांचोली के साथ सुनवाई करते हुए, CJI ने शुरुआत में ही स्पष्ट किया कि इस मामले की अध्यक्षता करना उनके लिए उचित नहीं होगा। इसका कारण यह है कि कानूनी चुनौती सीधे तौर पर चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश को बाहर किए जाने से जुड़ी है।
CJI ने कार्यवाही के दौरान कहा, “मुझ पर हितों के टकराव (conflict of interest) का आरोप लगाया जाएगा। यहां हितों का टकराव मौजूद है।”
विवाद की मुख्य जड़
इन याचिकाओं में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के कुछ प्रावधानों की वैधता को चुनौती दी गई है। दिसंबर 2023 में संसद द्वारा पारित इस कानून के तहत एक चयन समिति का गठन किया गया है, जिसमें शामिल हैं:
- प्रधानमंत्री
- प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री
- लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता)
कांग्रेस नेता जया ठाकुर और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) सहित अन्य याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस पैनल से CJI को बाहर करना और उनके स्थान पर एक कैबिनेट मंत्री को शामिल करना, नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता और चुनाव आयोग की स्वायत्तता को प्रभावित करता है।
ऐसी बेंच जिसमें भविष्य के CJI शामिल न हों
मुख्य न्यायाधीश ने सुझाव दिया कि इस मामले की सुनवाई ऐसी बेंच द्वारा की जानी चाहिए जिसमें कोई भी जज भविष्य में मुख्य न्यायाधीश बनने की कतार में न हो। इससे पक्षपात की किसी भी आशंका को पूरी तरह समाप्त किया जा सकेगा।
एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए एडवोकेट प्रशांत भूषण ने इस विचार का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “व्यक्तिगत रूप से मुझे कोई समस्या नहीं है, लेकिन किसी भी प्रकार के पक्षपात के पूर्वाभास (perception of bias) से बचने के लिए इसे ऐसी बेंच के सामने रखा जा सकता है जिसमें कोई संभावित CJI शामिल न हो।”
इस सुझाव को स्वीकार करते हुए, CJI ने निर्देश दिया कि मामले को 7 अप्रैल को एक अन्य बेंच के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए। उन्होंने संकेत दिया कि नई बेंच में वे जज होंगे जो CJI के पद के उत्तराधिकार की कतार में नहीं हैं।
कानूनी पृष्ठभूमि और सरकार का पक्ष
यह 2023 का कानून सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान बेंच के मार्च 2023 के एक ऐतिहासिक फैसले के बाद आया था। उस फैसले में हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि जब तक संसद कानून नहीं बना लेती, तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI की समिति की सलाह पर की जाएगी।
केंद्रीय कानून मंत्रालय ने एक हलफनामे में नए कानून का बचाव करते हुए कहा है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता केवल चयन समिति में किसी न्यायिक सदस्य की उपस्थिति पर निर्भर नहीं करती है। केंद्र ने उन दावों को भी खारिज कर दिया कि 14 मार्च 2024 को दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति आनन-फानन में की गई थी ताकि हाईकोर्ट के संभावित आदेशों को रोका जा सके।
इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के कानून के तहत की गई नई नियुक्तियों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। अब 7 अप्रैल को नई गठित बेंच के सामने होने वाली सुनवाई इस चयन प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता तय करने की दिशा में एक निर्णायक कदम होगी।

