छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 9 वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म और उसकी हत्या के दोषी की सजा को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि DNA प्रोफाइलिंग और मेडिकल रिपोर्ट जैसे वैज्ञानिक साक्ष्य विश्वसनीय हैं, तो ‘लास्ट सीन थ्योरी’ (अंतिम बार साथ देखे जाने) के पूरी तरह स्थापित न होने पर भी इनके आधार पर दोषसिद्धि की जा सकती है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ बबलू कलमुम द्वारा दायर आपराधिक अपील पर यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 302, 376(AB) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत निचली अदालत द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा की पुष्टि की है।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन के अनुसार, 13 जनवरी 2020 को एक नाबालिग बच्ची बाजार जाने के लिए घर से निकली थी। उसकी दादी (PW-08) ने उसे अकेले जाने से मना किया था, लेकिन आरोपी ने बच्ची को सुरक्षित वापस लाने का आश्वासन देकर उसे अपने साथ ले जाने की अनुमति ली। इसके बाद बच्ची लापता हो गई और बाद में उसका शव बरामद हुआ। परिजनों ने स्कूल यूनिफॉर्म और कपड़ों के आधार पर उसकी पहचान की। पुलिस जांच में एकत्र किए गए जैविक नमूनों और DNA टेस्ट के आधार पर निचली अदालत ने 22 दिसंबर 2022 को आरोपी को दोषी करार दिया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील श्री दिनेश तिवारी ने तर्क दिया कि पूरा मामला केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है और अभियोजन साक्ष्यों की कड़ी को जोड़ने में विफल रहा है। उन्होंने कहा कि केवल DNA रिपोर्ट को दोषसिद्धि का आधार मानना सुरक्षित नहीं है। साथ ही, उन्होंने दलील दी कि अपीलकर्ता आदिवासी और अनपढ़ है जिसे झूठा फंसाया गया है।
राज्य सरकार की ओर से पैनल लॉयर श्री शैलेंद्र शर्मा ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि दादी की गवाही से ‘लास्ट सीन थ्योरी’ स्पष्ट है और DNA रिपोर्ट ने निर्णायक रूप से साबित किया है कि पीड़िता के शरीर से मिले जैविक नमूने आरोपी के प्रोफाइल से मेल खाते हैं। मेडिकल रिपोर्ट ने भी यह पुष्ट किया कि बच्ची की मौत यौन हमले के बाद दम घुटने से हुई थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने अपने विश्लेषण में मुख्य रूप से पीड़िता की उम्र और आरोपी की संलिप्तता पर ध्यान केंद्रित किया।
पीड़िता की उम्र का निर्धारण
जरनैल सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2013) और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 94 का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने आंगनवाड़ी रिकॉर्ड (Ex.P/15C) की जांच की। रिकॉर्ड के अनुसार बच्ची का जन्म 6 मार्च 2010 को हुआ था, जिससे घटना के समय उसकी उम्र लगभग 9 वर्ष 10 महीने थी। हाईकोर्ट ने कहा:
“आधिकारिक कर्तव्यों के पालन के दौरान सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज की गई प्रविष्टियों को तब तक सही माना जाता है जब तक कि ठोस साक्ष्यों के माध्यम से उन्हें चुनौती न दी जाए।”
परिस्थितिजन्य और वैज्ञानिक साक्ष्य
हाईकोर्ट ने स्वीकार किया कि कई गवाहों के मुकर जाने (hostile) के कारण ‘लास्ट सीन थ्योरी’ कमजोर हुई, लेकिन अन्य साक्ष्य बेहद मजबूत थे:
- DNA प्रोफाइलिंग: बेंच ने DNA रिपोर्ट को “सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक साक्ष्य” माना। इसमें पीड़िता के स्वाब से मिले DNA का मिलान आरोपी से हुआ। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“DNA प्रोफाइलिंग वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित साक्ष्य का एक अत्यधिक विश्वसनीय रूप है, जो सही ढंग से एकत्र किए जाने पर किसी व्यक्ति की संलिप्तता का लगभग निर्णायक प्रमाण प्रदान करता है।” - मेडिकल साक्ष्य: पोस्टमार्टम रिपोर्ट (Ex.P/29) से स्पष्ट हुआ कि बच्ची की मौत गला घोंटने (strangulation) के कारण हुई थी और यह हत्या की श्रेणी में आता है।
- न्याय्येतर स्वीकारोक्ति (Extra-Judicial Confession): हाईकोर्ट ने ग्रामीण (PW-18) की उस गवाही को विश्वसनीय माना जिसमें उसने बताया था कि आरोपी ने ग्रामीणों के सामने अपना अपराध स्वीकार किया था।
परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मानक पर हाईकोर्ट ने शरद बिरधीचंद सारदा बनाम महाराष्ट्र राज्य (1984) के “पांच सुनहरे सिद्धांतों” (पंचशील) का हवाला देते हुए निष्कर्ष निकाला कि स्थापित तथ्य आरोपी की बेगुनाही की हर संभावना को खारिज करते हैं।
हाईकोर्ट का निर्णय
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ संदेह से परे मामला साबित करने में सफल रहा है। बेंच ने स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक साक्ष्यों ने वह “निर्णायक कड़ी” प्रदान की है जिसने ‘लास्ट सीन’ की कमजोरी को दूर कर दिया।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और प्राकृतिक मृत्यु तक आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: बबलू कलमुम बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
- केस नंबर: CRA No. 614 of 2023
- बेंच: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल
- तारीख: 9 अप्रैल, 2026

