कलकत्ता हाईकोर्ट ने देश में बच्चे को गोद लेने की अधिकतम उम्र सीमा के करीब पहुंच चुके एक दंपत्ति को बड़ी राहत दी है। अदालत ने केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) को निर्देश दिया है कि वह इस दंपत्ति को बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया में पहली प्राथमिकता दे। दरअसल, बच्चे की मेडिकल रिपोर्ट को लेकर उपजे असमंजस के कारण यह दंपत्ति निर्धारित 48 घंटे के भीतर अपनी सहमति दर्ज नहीं करा पाया था, जिसके बाद अथॉरिटी ने उनका मामला बंद कर दिया था।
जस्टिस कृष्णा राव ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि 12 जनवरी 2026 को इस दंपत्ति की संयुक्त उम्र 108 वर्ष थी, जो गोद लेने के नियमों के तहत तय की गई अधिकतम 110 वर्ष की सीमा से कम है। अदालत ने माना कि दंपत्ति की ओर से हुई देरी का कारण बच्चे को गोद लेने से इनकार करना नहीं था, बल्कि चिकित्सा रिपोर्ट को लेकर उपजा भ्रम था। इसलिए, उनकी होम स्टडी रिपोर्ट (HSR) वैध मानी जाएगी और उनकी वरिष्ठता भी सुरक्षित रहेगी।
वरिष्ठता और पात्रता बहाल रखने का निर्देश
हाईकोर्ट ने 13 जुलाई के अपने फैसले में दंपत्ति को अपनी होम स्टडी रिपोर्ट (HSR) को तुरंत रीवैलिडेट (पुनः सत्यापित) कराने की छूट दी है। कोर्ट ने अधिकारियों को आदेश दिया कि रीवैलिडेशन के तुरंत बाद, विशिष्ट दत्तक ग्रहण एजेंसी (SAA) के पास उपलब्ध अगले बच्चे के लिए इस दंपत्ति को वरिष्ठता सूची में पहले स्थान (सीरियल नंबर 1) पर रखकर प्राथमिकता दी जाए। यदि दंपत्ति को रेफर किया गया बच्चा गोद लेने के योग्य है, तो उन्हें रेफरल मिलने के 48 घंटों के भीतर अपनी सहमति देनी होगी, जिसके बाद गोद लेने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
बच्ची की मेडिकल रिपोर्ट और समय-सीमा का असमंजस
यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब जनवरी 2020 में इस दंपत्ति ने कारा (CARA) के आधिकारिक पोर्टल पर पंजीकरण कराया था। लगभग छह साल बाद, 22 दिसंबर 2025 को उन्हें एक पांच वर्षीय बच्ची का तीसरा रेफरल मिला। इसके साथ दंपत्ति को बच्ची की मेडिकल जांच रिपोर्ट भी दी गई, जिसमें लिखा था कि वह अपनी देखरेख करने वाले से बातचीत या आवाज नहीं निकाल पा रही थी।
कोलकाता मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के ईएनटी (ENT) विभाग की 29 अगस्त 2025 की पर्ची के अनुसार, बच्ची जन्म से ही बोलने में असमर्थ थी और उसे स्पीच थेरेपी की सलाह दी गई थी। ऑडियो वेस्टिबुलर क्लिनिक की रिपोर्ट में भी पुष्टि हुई कि बच्ची को बोलने में गंभीर समस्या थी और वह अपनी बात कहने के लिए केवल इशारों का सहारा लेती थी।
दंपत्ति के वकील अधिवक्ता दीपन कुमार सरकार ने अदालत को बताया कि गंभीर रूप से बोलने में असमर्थ होने के कारण बच्ची विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (स्पेशल नीड्स) की श्रेणी में आती थी। इसके स्पष्टीकरण के लिए दंपत्ति ने कारा (CARA) और राज्य दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (SARA) से संपर्क कर दत्तक ग्रहण विनियम, 2022 के तहत मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) की रिपोर्ट मांगी थी।
वकील ने बताया कि बच्ची को रिजर्व रखने की 48 घंटे की अवधि 25 दिसंबर 2025 को समाप्त हो रही थी। इसके मद्देनजर दंपत्ति ने 23 दिसंबर को दोबारा ईमेल भेजा, लेकिन अथॉरिटीज से कोई जवाब नहीं मिला। इस वजह से वे तय समय सीमा में सहमति नहीं दे पाए और अथॉरिटी ने उनकी शिकायत का निपटारा किए बिना फाइल बंद कर दी। उन्होंने दलील दी कि यदि यह निर्णय लागू रहता, तो दंपत्ति को नए सिरे से आवेदन करना पड़ता और वे उम्र सीमा पार कर जाने के कारण हमेशा के लिए इस अधिकार से वंचित हो जाते।
अधिकारियों का पक्ष और हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
दूसरी ओर, अथॉरिटी का पक्ष रखते हुए अधिवक्ता सिद्धार्थ लाहिड़ी ने तर्क दिया कि दंपत्ति निर्धारित 48 घंटे में सहमति देने में विफल रहा, इसलिए नियमानुसार वह बच्चा अगले पात्र माता-पिता को सौंप दिया गया। उन्होंने अदालत को बताया कि संबंधित बच्ची को अब किसी अन्य दंपत्ति द्वारा गोद लिया जा चुका है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि याचिकाकर्ता अभी भी बच्चा गोद लेना चाहते हैं, तो वे एक नया आवेदन दाखिल कर सकते हैं।
हालांकि, कलकत्ता हाईकोर्ट ने दंपत्ति के तर्कों को स्वीकार करते हुए कारा (CARA) के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें उनकी फाइल को बंद कर दिया गया था। कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि दंपत्ति की वरिष्ठता और गृह अध्ययन रिपोर्ट को बहाल रखा जाए ताकि उम्र सीमा के इस आखिरी पड़ाव पर उन्हें माता-पिता बनने का एक अंतिम अवसर मिल सके।

