कलकत्ता हाईकोर्ट ने मंगलवार को उस जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें चुनाव आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल के शीर्ष प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के तबादले को चुनौती दी गई थी।
इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या चुनाव आयोग (EC) ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के तुरंत बाद मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) सहित राज्य के अधिकारियों के बड़े पैमाने पर तबादले का आदेश देकर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। मुख्य न्यायाधीश सुजय पॉल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए चुनाव अवधि के दौरान आयोग के प्रशासनिक विवेकाधिकार को उचित माना।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब चुनाव आयोग ने 294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के कार्यक्रम की घोषणा की। इसके तुरंत बाद, आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी (DGP) सहित कई महत्वपूर्ण अधिकारियों के स्थानांतरण का आदेश दिया।
याचिकाकर्ता ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में इन तबादलों को रद्द करने की मांग करते हुए तर्क दिया गया कि इतने बड़े स्तर पर अधिकारियों को हटाना राज्य के दैनिक प्रशासन और सुचारू शासन व्यवस्था के लिए हानिकारक है।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि भले ही आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद चुनाव आयोग के पास कुछ शक्तियां होती हैं, लेकिन राज्य के शीर्ष नौकरशाही और पुलिस नेतृत्व को अचानक हटाना “अत्यधिक” था। याचिका में कहा गया कि इन कदमों से राज्य के प्रशासन के संचालन पर बुरा असर पड़ेगा।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग का सामान्य पक्ष यह रहता है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ तैयार करना आवश्यक है। प्रशासनिक मशीनरी की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए ही ऐसे तबादले किए जाते हैं।
मामले की सुनवाई के बाद, मुख्य न्यायाधीश सुजय पॉल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने याचिका में कोई ठोस आधार नहीं पाया। याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने प्रभावी रूप से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के चुनाव आयोग के संवैधानिक जनादेश को मान्यता दी। कोर्ट ने माना कि किसी भी संभावित पक्षपात या प्रभाव को रोकने के लिए अधिकारियों को पुनर्नियुक्त करने का अधिकार आयोग के पास है।
कोर्ट ने इस संदर्भ में चुनाव आयोग के कार्यकारी निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाया।

