‘पाप में जन्मे आदेश’ से आरोपी की स्वतंत्रता सुरक्षित नहीं हो सकती: कलकत्ता हाईकोर्ट ने बिल्डर की जमानत रद्द की

कलकत्ता हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के एक मामले में बिल्डर को निचली अदालत द्वारा दी गई जमानत को रद्द करते हुए कहा है कि किसी आरोपी की स्वतंत्रता ऐसे आदेश के आधार पर सुरक्षित नहीं रह सकती जो प्रक्रिया की बुनियादी आवश्यकताओं का पालन ही नहीं करता। अदालत ने पाया कि मजिस्ट्रेट का जमानत आदेश गंभीर प्रक्रियात्मक और कानूनी त्रुटियों से ग्रस्त था।

न्यायमूर्ति उदय कुमार ने 6 मार्च को दिए गए अपने निर्णय में सियालदह अदालत के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसके तहत बिल्डर सुवेंदु साहा को 7 मई 2018 को जमानत दी गई थी। हाईकोर्ट ने जमानत से जुड़े बाद के सभी आदेशों को भी रद्द कर दिया।

अदालत ने कहा कि जमानत आदेश में कई गंभीर कमियां थीं। आदेश पर या तो हस्ताक्षर नहीं थे या वह केवल आंशिक रूप से प्रारंभाक्षरित था। साथ ही, पीड़िता द्वारा उठाए गए विशेष आपत्तियों पर कोई ठोस कारण भी दर्ज नहीं किया गया था और गवाहों को डराने-धमकाने के आरोपों के इतिहास को भी नजरअंदाज कर दिया गया था। अदालत के अनुसार, ऐसे आदेश को बरकरार रखना न्यायिक अनुशासन के विपरीत होगा।

अदालत ने कहा, “यह मामला एक चिंताजनक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ एक ऐसे आदेश के आधार पर आरोपी की स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी गई जो प्रक्रियात्मक प्रमाणिकता की बुनियादी कसौटियों पर खरा नहीं उतरता।”

न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि जमानत आदेश दोहरी खामियों से ग्रस्त है—एक प्रक्रियात्मक और दूसरी विषयगत। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी की स्वतंत्रता निस्संदेह महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे ऐसे आदेश के आधार पर सुरक्षित नहीं रखा जा सकता जो उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित प्रशासनिक और न्यायिक अनुशासन की अवहेलना करते हुए पारित किया गया हो।

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निर्णय में कहा गया, “इस न्यायालय का यह कानूनी निष्कर्ष है कि आरोपी की स्वतंत्रता, चाहे वह कितनी ही मूल्यवान क्यों न हो, ऐसे आदेश से संरक्षित नहीं की जा सकती जो ‘पाप में जन्मा’ हो।”

मामले की पृष्ठभूमि में उत्तर कोलकाता स्थित एक मकान की वृद्ध विधवा किरायेदार द्वारा किया गया समझौता है। याचिकाकर्ता के अनुसार, नवंबर 2014 में उसने बिल्डर की निर्माण कंपनी के साथ एक त्रिपक्षीय समझौता किया था। इसके तहत डेवलपर को उसे अस्थायी आवास उपलब्ध कराना, मासिक किराया देना और 24 महीने के भीतर पुनर्निर्मित इमारत में एक स्वायत्त फ्लैट उपलब्ध कराना था।

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याचिकाकर्ता का आरोप है कि बिल्डर ने संपत्ति का कब्जा लेने के बाद विस्थापन भत्ता देना बंद कर दिया और तय समय के भीतर फ्लैट भी उपलब्ध नहीं कराया। इसके बाद उसने उत्तर कोलकाता के काशीपुर पुलिस स्टेशन में धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात का मामला दर्ज कराया।

हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि आरोपी की गिरफ्तारी 3 मई 2018 को अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही संभव हो सकी थी। हालांकि, गिरफ्तारी के चार दिन बाद ही सियालदह अदालत ने उसे जमानत दे दी थी।

न्यायालय ने मजिस्ट्रेट की कार्यवाही की आलोचना करते हुए कहा कि जमानत देने का विवेकाधिकार मनमाने ढंग से और स्थापित न्यायिक नज़ीरों की अवहेलना करते हुए इस्तेमाल किया गया।

अदालत ने यह भी कहा कि किसी न्यायिक आदेश की विश्वसनीयता केवल उसकी सामग्री से नहीं, बल्कि उसके औपचारिक स्वरूप और प्रक्रियात्मक अनुशासन से भी तय होती है।

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न्यायमूर्ति कुमार ने कहा, “जब कोई अधीनस्थ अदालत न्यायिक अभिलेखों की प्रमाणिकता सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित अनिवार्य प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की अनदेखी करती है, तो ऐसा आदेश केवल अनियमित नहीं बल्कि विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण हो जाता है।”

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने कोलकाता पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता और उसके परिवार को पर्याप्त और निरंतर सुरक्षा प्रदान की जाए।

इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल राज्य न्यायिक अकादमी के निदेशक को निर्देश दिया कि न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में “न्यायिक आदेशों की रिकॉर्डिंग और अभिलेखों के प्रमाणीकरण” पर एक विशेष मॉड्यूल शामिल किया जाए, ताकि आपराधिक नियमों और आदेशों के अनुपालन में लापरवाही के गंभीर कानूनी परिणामों के बारे में अधिकारियों को जागरूक किया जा सके।

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