कलकत्ता हाईकोर्ट का अहम फैसला: अनुबंध उल्लंघन पर हर्जाने का आकलन केवल ‘ब्रीच की तारीख’ पर हो, यह नियम पत्थर की लकीर नहीं; ‘उचित अवधि’ मानी गई जायज

क्या अनुबंध टूटने (Breach of Contract) पर हर्जाने का हिसाब ठीक उसी दिन के बाजार भाव पर होना चाहिए, या पीड़ित पक्ष को माल बेचने के लिए थोड़ा वक्त मिल सकता है? कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि नुकसान का आकलन करने के लिए केवल “उल्लंघन की तारीख” ही एकमात्र पैमाना नहीं है।

जस्टिस गौरांग कंठ की बेंच ने आर्बिट्रेशन अवार्ड को बरकरार रखते हुए कहा कि जब सरकारी एजेंसियां किसी अनुबंध में शामिल होती हैं, तो उन्हें स्टॉक का निपटारा करने में निजी कंपनियों से अधिक समय लग सकता है। ऐसे में, हर्जाने का आकलन करने के लिए कुछ महीनों की “उचित अवधि” (Reasonable Period) लेना कानूनी रूप से गलत नहीं है।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद अगरपाड़ा जूट मिल्स लिमिटेड (याचिकाकर्ता) और द जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (प्रतिवादी) के बीच का है। कहानी सितंबर 2006 में शुरू हुई, जब जूट मिल ने अपने एजेंट के माध्यम से जूट कॉरपोरेशन (JCI) के साथ कच्चा जूट खरीदने के लिए दो करार किए। मिल ने शुरुआत में 35 लाख रुपये जमा कराए, जिसके बदले उन्हें कुछ माल की आपूर्ति की गई।

हालांकि, बाद में जूट मिल ने “आर्थिक तंगी” का हवाला देते हुए बाकी बचा हुआ जूट उठाने से हाथ खड़े कर दिए। 22 नवंबर 2006 को मिल ने अनुबंध रद्द (Cancel) करने की सूचना दे दी। मुसीबत यह थी कि जूट कॉरपोरेशन ने मिल के ऑर्डर के मुताबिक पहले ही माल खरीदकर अपने गोदामों में भर लिया था। माल न उठने से कॉर्पोरेशन को उसे स्टोर करने और बाद में कम दाम पर बेचने का नुकसान उठाना पड़ा।

मामला आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता) में गया। 2010 में, सोल आर्बिट्रेटर ने फैसला सुनाया कि जूट मिल ने अनुबंध तोड़ा है और उसे जूट कॉरपोरेशन को 20,41,495 रुपये का हर्जाना (ब्याज सहित) देना होगा।

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जूट मिल की दलील: ‘ब्रीच की तारीख’ का नियम

जूट मिल ने इस अवार्ड को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनकी मुख्य दलील यह थी कि आर्बिट्रेटर ने हर्जाने का हिसाब गलत तरीके से लगाया है। मिल के वकीलों का कहना था कि कानून के मुताबिक, नुकसान का आकलन “उल्लंघन की तारीख” (Date of Breach) पर प्रचलित बाजार भाव के आधार पर होना चाहिए।

उनका तर्क था कि जिस दिन अनुबंध खत्म हुआ, उस दिन बाजार में जूट की कीमत अनुबंध की कीमत के बराबर ही थी, इसलिए कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ। आर्बिट्रेटर ने अनुबंध टूटने के 4 महीने बाद के बाजार भाव को आधार (Base price) बनाया, जब कीमतें गिर चुकी थीं। मिल ने इसे “पेटेंट अवैधता” (Patent illegality) बताया।

कोर्ट का विश्लेषण: सरकारी एजेंसी और ‘व्यावहारिक वास्तविकता’

हाईकोर्ट ने मामले की गहराई से पड़ताल की। कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या आर्बिट्रेटर का 4 महीने बाद के भाव को आधार बनाना सही था?

जस्टिस गौरांग कंठ ने जूट कॉरपोरेशन के पक्ष को सही ठहराया। कोर्ट ने माना कि:

  1. सरकारी प्रक्रिया: जूट कॉरपोरेशन एक सरकारी उपक्रम (PSU) है। किसी निजी व्यापारी की तरह वे रातों-रात अपना स्टॉक नहीं बेच सकते। उन्हें टेंडर और अन्य प्रक्रियाओं का पालन करना होता है।
  2. उचित समय: आर्बिट्रेटर ने माना था कि इतने बड़े स्टॉक को बेचने के लिए 4 महीने का समय लगना एक “उचित अवधि” है। कोर्ट ने इसे “व्यावसायिक रूप से यथार्थवादी” (Commercially realistic) दृष्टिकोण माना।
  3. नियम की लचीलापन: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुरलीधर चिरंजीलाल जैसे पुराने फैसलों का मतलब यह नहीं है कि ‘Date of Breach’ का नियम कोई पत्थर की लकीर है। अगर माल तुरंत बेचना संभव नहीं है, तो नुकसान कम करने (Mitigation) के लिए जो समय लगा, उस दौरान हुए नुकसान की भरपाई की जा सकती है।
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फैसला

कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेटर ने अनुबंध की शर्तों और सबूतों के आधार पर एक तार्किक फैसला लिया है। गोदाम का किराया (Storage charges) और गिरते बाजार भाव के कारण हुए नुकसान की भरपाई जूट मिल को करनी होगी। धारा 34 के तहत कोर्ट को केवल यह देखना होता है कि क्या अवार्ड कानून या सार्वजनिक नीति के खिलाफ है, न कि सबूतों का दोबारा मूल्यांकन करना।

चूंकि आर्बिट्रेटर का दृष्टिकोण संभव और तर्कसंगत था, इसलिए हाईकोर्ट ने उसमें हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और जूट मिल की याचिका को खारिज कर दिया।

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केस डीटेल्स:

  • केस : अगरपाड़ा जूट मिल्स लिमिटेड बनाम द जूट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड
  • केस नंबर: AP-COM 105 OF 2024
  • कोरम: जस्टिस गौरांग कंठ
  • याचिकाकर्ता के वकील: साक्य सेन (वरिष्ठ अधिवक्ता), शंकरसन सरकार, आदि।
  • प्रतिवादी के वकील: देवब्रत दास, तीर्थंकर नंदी।

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