सीनियर जॉइंट कमिश्नर धारा 86 के तहत पारित आदेश का ‘सुओ मोटो’ रिविजन नहीं कर सकते: कलकत्ता हाईकोर्ट

क्या विभाग का एक वरिष्ठ अधिकारी अपने ही स्तर के किसी अन्य अधिकारी, जिसे समान शक्तियां प्राप्त हों, के फैसले को केवल इसलिए पलट सकता है क्योंकि वह प्रशासनिक रूप से वरिष्ठ है? कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में इस सवाल का जवाब ‘नहीं’ में दिया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पश्चिम बंगाल वैल्यू एडेड टैक्स एक्ट (WB VAT Act), 2003 के तहत, यदि एक जॉइंट कमिश्नर धारा 86 के तहत अपनी रिविजनल शक्तियों (Revisional Powers) का प्रयोग कर कोई आदेश पारित करता है, तो एक सीनियर जॉइंट कमिश्नर धारा 85 के तहत उस आदेश का स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर रिविजन नहीं कर सकता।

जस्टिस कौशिक चंदा की पीठ ने राजस्व विभाग (Revenue) द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जब कोई जॉइंट कमिश्नर धारा 86 के तहत कार्य करता है, तो वह सीधे तौर पर ‘कमिश्नर’ के प्रतिनिधि (Delegate) के रूप में कार्य कर रहा होता है। इसलिए, कानूनन वह आदेश स्वयं कमिश्नर का आदेश माना जाता है, जिसे किसी अन्य प्रतिनिधि द्वारा दोबारा संशोधित नहीं किया जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

यह कानूनी लड़ाई 2010-11 के असेसमेंट ईयर से जुड़ी है। याचिकाकर्ता, संजय सुर और एक अन्य, जो कॉटन के निर्यात (Export) के व्यवसाय में हैं, ने सेल्स टैक्स ऑफिसर के समक्ष फॉर्म “H” के लिए आवेदन किया था। मार्च 2013 में अधिकारी ने उनके इस अनुरोध को खारिज कर दिया।

हताश होकर व्यापारियों ने धारा 86 के तहत जॉइंट कमिश्नर का दरवाजा खटखटाया। जॉइंट कमिश्नर ने मामले की सुनवाई की और मार्च 2014 में व्यापारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए 73 फॉर्म “H” जारी करने का निर्देश दिया।

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मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। राजस्व विभाग ने इस आदेश को चुनौती देते हुए सीनियर जॉइंट कमिश्नर के समक्ष धारा 85 के तहत आवेदन किया। सीनियर जॉइंट कमिश्नर ने जनवरी 2015 में एक नया आदेश पारित किया और फॉर्म “H” की संख्या 73 से घटाकर केवल 6 कर दी। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां 2023 में एक सिंगल बेंच ने सीनियर जॉइंट कमिश्नर के आदेश को रद्द कर दिया। राजस्व विभाग ने इसी आदेश के खिलाफ वर्तमान रिव्यू याचिका दायर की थी।

कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?

राजस्व विभाग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मो. टी. एम. सिद्दीकी ने तर्क दिया कि सीनियर जॉइंट कमिश्नर प्रशासनिक पदानुक्रम (Hierarchy) में जॉइंट कमिश्नर से ऊपर होते हैं, इसलिए उनके पास धारा 85 के तहत आदेश को संशोधित करने का अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर पुराने फैसले को बरकरार रखा गया, तो राज्य के राजस्व को लगभग 40 करोड़ रुपये का नुकसान होगा।

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दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकील प्रभात कुमार सिंह ने इसका पुरजोर विरोध किया। उनका कहना था कि एक्ट के तहत जॉइंट कमिश्नर और सीनियर जॉइंट कमिश्नर दोनों ही ‘कमिश्नर’ के प्रतिनिधि (Delegate) हैं। जब जॉइंट कमिश्नर ने धारा 86 के तहत फैसला सुना दिया, तो वह फैसला ‘कमिश्नर’ का फैसला बन गया। एक ही स्तर की शक्ति का प्रयोग करते हुए उसी आदेश का दोबारा रिविजन करना कानूनन गलत है।

हाईकोर्ट का फैसला और विश्लेषण

जस्टिस चंदा ने मामले की गहराई से पड़ताल की और पाया कि कानून की मंशा अंतहीन मुकदमों को बढ़ावा देना नहीं है। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक रूप से सीनियर जॉइंट कमिश्नर भले ही वरिष्ठ हों, लेकिन जब वे एक्ट के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हैं, तो उनकी कानूनी स्थिति एक समान होती है—वे दोनों कमिश्नर की शक्तियों का उपयोग कर रहे होते हैं।

कोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

“जब धारा 86 के तहत जॉइंट कमिश्नर द्वारा कोई आदेश पारित किया जाता है, तो वह कमिश्नर का आदेश माना जाता है। ऐसे आदेश को धारा 6(1) के तहत किसी अधीनस्थ अधिकारी का आदेश नहीं माना जा सकता। इसलिए, एक प्रतिनिधि (Delegate) द्वारा पारित आदेश का दूसरे प्रतिनिधि द्वारा पुनरीक्षण (Revision) नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के अश्विन इंडस्ट्रीज मामले का भी हवाला दिया और कहा कि एक बार जब रिविजनल अधिकार का प्रयोग कर लिया जाता है, तो उसे उसी विषय पर दोबारा इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसे “सक्सेसिव रिविजन का अस्वीकार्य चक्र” (Impermissible cycle of successive revisions) करार दिया।

अंततः, हाईकोर्ट ने माना कि सीनियर जॉइंट कमिश्नर का 2015 का आदेश कानूनन सही नहीं था क्योंकि धारा 85 उन्हें ऐसे आदेश को संशोधित करने की शक्ति नहीं देती जो पहले से ही कमिश्नर (प्रतिनिधि के माध्यम से) द्वारा पारित माना गया हो।

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केस विवरण

  • केस का नाम: सेल्स टैक्स ऑफिसर, बारासात चार्ज और अन्य बनाम संजय सुर और अन्य
  • केस संख्या: R.V.W.O No.5 of 2024 (I.A. No. G.A. 2 of 2024 के साथ)
  • कोरम: जस्टिस कौशिक चंदा
  • याचिकाकर्ता के वकील: मो. टी. एम. सिद्दीकी (सीनियर एडवोकेट), तन्मय चक्रवर्ती, सप्तक सान्याल
  • प्रतिवादी के वकील: प्रभात कुमार सिंह, प्रशांत कुमार सिंह

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