बॉम्बे हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें एक रेल दुर्घटना में मृत व्यक्ति के परिवार को मुआवजा देने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चश्मदीद गवाहों या अतिक्रमण (trespassing) के पुख्ता सबूतों के बिना, ट्रेन से गिरने या ट्रेन की चपेट में आने से हुई मृत्यु को सामाजिक कल्याण कानून के तहत “अप्रिय घटना” (untoward incident) माना जाना चाहिए।
जस्टिस जितेंद्र जैन की पीठ ने मृतक वैलेंटाइन डिसूजा की पत्नी, बेटी और माता-पिता द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए वेस्टर्न रेलवे को मुआवजा देने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
मृतक वैलेंटाइन डिसूजा नायगांव के निवासी थे और दादर में रोलेक्स कंपनी के एक वॉच शोरूम में कार्यरत थे। 18 मार्च 2011 को वह अपने काम के लिए घर से निकले थे। यात्रा के दौरान नायगांव और भयंदर रेलवे स्टेशनों के बीच उनके साथ दुर्घटना हो गई। तलाशी के दौरान उनके पास से प्रथम श्रेणी का सीजन टिकट बरामद हुआ था।
रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने 28 फरवरी 2014 के अपने आदेश में मुआवजे के दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह मामला पटरियों पर ‘अतिक्रमण’ का है और मृतक किसी अज्ञात ट्रेन की चपेट में आया था। हालांकि ट्रिब्यूनल ने मृतक को “बोनाफाइड पैसेंजर” (वैध यात्री) माना था, लेकिन मौत के कारण को “अप्रिय घटना” की श्रेणी से बाहर रखा था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से वकील अवधूत बिदाये ने ट्रिब्यूनल के ‘अतिक्रमण’ वाले निष्कर्ष को चुनौती दी। उन्होंने मृतक की पत्नी की गवाही का हवाला दिया, जिसमें उनके काम पर जाने की दिनचर्या और घटना के दिन घर से निकलने की पुष्टि की गई थी।
वहीं, केंद्र सरकार (वेस्टर्न रेलवे) की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट राजेश जी. सिंह ने तर्क दिया कि मृतक का सिर धड़ से अलग पाया गया था, जो यह दर्शाता है कि यह ट्रेन से गिरने का नहीं बल्कि पटरी पार करते समय ट्रेन की चपेट में आने (अतिक्रमण) का मामला है। रेलवे ने अपनी दलीलों के लिए पुलिस रिपोर्ट और घटना के कई महीनों बाद तैयार की गई जांच रिपोर्ट पर भरोसा जताया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
मामले का मुख्य बिंदु यह था कि क्या यह मौत “अप्रिय घटना” थी या “अतिक्रमण”।
जस्टिस जैन ने गौर किया कि मृतक की पत्नी की गवाही को रेलवे झुठला नहीं सका। ट्रेन में चढ़ते हुए किसी चश्मदीद के न होने पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“मेरी राय में, ट्रेन में चढ़ने का कोई सबूत तब तक नहीं हो सकता जब तक कि मृतक के साथ कोई सह-यात्री न हो या सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध न हो। इस मामले में दोनों ही मौजूद नहीं हैं। इसलिए, आवेदकों से यह साबित करने के लिए कहना कि मृतक ट्रेन में चढ़ रहा था, उन पर एक असंभव और भारी बोझ डालने जैसा होगा।”
पटरी पार करने (अतिक्रमण) के आरोप पर कोर्ट ने कहा कि रेलवे के पास इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। कोर्ट ने कहा कि जब कोई चश्मदीद नहीं है, तो यह मान लेना कि मृतक पटरी पार कर रहा था, गलत है। चोटों की प्रकृति और सिर अलग होने पर कोर्ट ने कहा:
“यह संभव है कि मृतक गिर गया हो और उसी ट्रेन या दूसरी तरफ से आने वाली किसी ट्रेन के नीचे आने से शरीर के टुकड़े हो गए हों। ऐसे मामले में, जब यह दिखाने के लिए कोई सबूत नहीं है कि मृतक की मृत्यु कैसे हुई और कोई चश्मदीद नहीं है, तो सामाजिक कल्याण कानून के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, रेलवे के ‘अतिक्रमण’ वाले तर्क को खारिज करना होगा।”
हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि स्टेशन मास्टर की प्रारंभिक रिपोर्ट में घटना का कारण “अज्ञात” बताया गया था और अतिक्रमण का कोई जिक्र नहीं था। साथ ही, अगर कोई व्यक्ति चलती ट्रेन की चपेट में आता, तो मोटरमैन या गार्ड अगले स्टेशन को इसकी सूचना जरूर देते, जो इस मामले में नहीं दी गई।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष को उलटते हुए कहा कि यह मृत्यु ‘अतिक्रमण’ के कारण नहीं बल्कि ‘अप्रिय घटना’ के कारण हुई है।
हाईकोर्ट के निर्देश:
- ‘अतिक्रमण’ के निष्कर्ष को रद्द कर इसे ‘अप्रिय घटना’ की श्रेणी में रखा गया।
- अपीलकर्ताओं को 4,00,000/- रुपये का मुआवजा 6% वार्षिक ब्याज (दुर्घटना की तारीख से भुगतान तक) के साथ देने का निर्देश दिया गया।
- कुल मुआवजे की अधिकतम सीमा 8,00,000/- रुपये तय की गई है।
- रेलवे को निर्देश दिया गया है कि आवेदन मिलने के 12 हफ्तों के भीतर राशि का भुगतान किया जाए।
मामले का विवरण:
- केस का शीर्षक: कोरिना वैलेंटाइन डिसूजा और अन्य बनाम भारत संघ
- केस संख्या: फर्स्ट अपील नंबर 1232 ऑफ 2014
- पीठ: जस्टिस जितेंद्र जैन
- तारीख: 18 मार्च, 2026

