बॉम्बे हाईकोर्ट (नागपुर बेंच) ने परिवार न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें पत्नी के पक्ष में ‘दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना’ (Restitution of Conjugal Rights) की डिक्री दी गई थी और पति को भरण-पोषण (Maintenance) देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी ने वैवाहिक घर छोड़ने के 11 महीने बाद केवल पति और उसके परिवार को “दबाव” में लेने के लिए आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पत्नी ने अपनी आय से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया था।
न्यायमूर्ति एम.एस. जावलकर और न्यायमूर्ति एम.डब्ल्यू. चांदवानी की खंडपीठ ने पति द्वारा दायर अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यवतमाल परिवार न्यायालय के 30 अगस्त, 2024 के सामान्य निर्णय और आदेश को पलट दिया। जहां दांपत्य अधिकारों की बहाली की डिक्री को पूरी तरह से रद्द कर दिया गया, वहीं भरण-पोषण के मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस परिवार न्यायालय भेज दिया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता (पति) और प्रतिवादी (पत्नी) का विवाह 24 मई, 2021 को यवतमाल में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। पत्नी 16 अगस्त, 2021 को अपनी ‘मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग’ की परीक्षा की तैयारी का हवाला देते हुए वैवाहिक घर से चली गई थी।
इसके बाद, पत्नी ने परिवार न्यायालय के समक्ष तीन याचिकाएं दायर कीं:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 के तहत दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए याचिका।
- हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 के तहत भरण-पोषण के लिए याचिका।
- दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण के लिए याचिका।
इसके अतिरिक्त, घर छोड़ने के लगभग 11 महीने बाद, 12 जुलाई, 2022 को पत्नी ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498-A और धारा 34 के तहत क्रूरता का आरोप लगाते हुए एक एफआईआर (अपराध संख्या 187/2022) दर्ज कराई।
परिवार न्यायालय ने 30 अगस्त, 2024 के अपने आदेश में पत्नी की सभी याचिकाओं को स्वीकार कर लिया था। कोर्ट ने पत्नी को पति के साथ रहने का निर्देश दिया और पति को प्रत्येक भरण-पोषण याचिका में 20,000 रुपये प्रति माह का भुगतान करने का आदेश दिया। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षों की दलीलें
पति का पक्ष: पति ने तर्क दिया कि पत्नी करियर-उन्मुख (career-minded) थी और अपनी मर्जी से घर छोड़कर गई थी। उसने आरोप लगाया कि पत्नी ने यह तथ्य छिपाया कि वह “जॉय इंजीनियरिंग क्लासेस” नाम से एक निजी शिक्षण संस्थान चला रही थी, जिससे उसे अच्छी आमदनी होती थी। पति ने यह भी दावा किया कि पत्नी ने अपनी 40% शारीरिक विकलांगता की बात छिपाई थी।
पति ने आगे तर्क दिया कि पत्नी ने केवल उसे और उसके परिवार को परेशान करने के लिए कई मुकदमे दायर किए और झूठी आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। उसने घर छोड़ने के बाद पत्नी द्वारा भेजे गए व्हाट्सएप संदेशों का हवाला दिया, जिसमें पत्नी ने अपने व्यवहार के लिए खेद व्यक्त किया था, जो यह दर्शाता है कि पति की ओर से कोई क्रूरता नहीं की गई थी।
पत्नी का पक्ष: व्यक्तिगत रूप से (in person) पेश हुई पत्नी ने दलील दी कि वह अपनी परीक्षा के लिए घर से गई थी और वापस आना चाहती थी, लेकिन पति और उसके परिवार ने उसे वापस लेने से इनकार कर दिया। उसने कोचिंग क्लास चलाने या वैवाहिक दायित्वों को प्रभावित करने वाली किसी भी विकलांगता से इनकार किया।
उसने आरोप लगाया कि पति की दादी द्वारा उसे परेशान किया गया था। भरण-पोषण के संबंध में, उसने तर्क दिया कि पति एक प्रोफेसर के रूप में काम करता है और प्रति माह 1 से 1.5 लाख रुपये कमाता है, हालांकि पति ने जिरह में प्रति वर्ष 5 लाख रुपये कमाने की बात स्वीकार की थी।
कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
हाईकोर्ट ने घटनाओं के क्रम और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की बारीकी से जांच की। कोर्ट ने नोट किया कि पत्नी 16 अगस्त, 2021 को अपनी शिक्षा के लिए घर से गई थी। हालांकि, “इस आशय की कोई दलील नहीं दी गई कि परीक्षा समाप्त होने के बाद पत्नी ने सहवास (cohabitation) फिर से शुरू करने के लिए क्या कदम उठाए।”
दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना और क्रूरता पर: पीठ ने पाया कि क्रूरता का आरोप लगाने वाली एफआईआर 11 महीने के अंतराल के बाद दर्ज की गई थी। कोर्ट ने अलगाव के दौरान पत्नी द्वारा भेजे गए व्हाट्सएप संदेशों का परीक्षण करते हुए कहा:
“उक्त व्हाट्सएप संदेशों को देखने के बाद, यह प्रतीत होता है कि पत्नी ने स्थिति और अपने व्यवहार के लिए खेद व्यक्त किया था… इन सभी संदेशों से एक तथ्य स्पष्ट है कि परिवार के किसी भी सदस्य द्वारा उसे परेशान नहीं किया गया था।”
कोर्ट ने माना कि एफआईआर में लगाए गए आरोप “बाद में सोचे गए” (afterthought) प्रतीत होते हैं। कोर्ट ने जिरह में पत्नी की इस स्वीकृति पर गौर किया कि “यदि पति पत्नी के साथ रहने की इच्छा दिखाता, तो आपराधिक शिकायत दर्ज करने का कोई कारण नहीं था।”
अनिल यशवंत करंडे बनाम मंगल अनिल करंडे मामले के फैसले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि झूठी आपराधिक शिकायत दर्ज करना वैवाहिक क्रूरता का गठन करता है। पीठ ने कहा:
“इसके अलावा, उसकी यह स्वीकृति कि यदि पति ने सहवास के लिए सहमति दी होती तो वह आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं करती, स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि एफआईआर केवल पति और उसके परिवार के सदस्यों पर दबाव बनाने के लिए दर्ज की गई थी।”
कोर्ट ने माना कि परिवार न्यायालय यह समझने में विफल रहा कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के पति की सोसाइटी से अलग हुई थी।
भरण-पोषण और आय छिपाने पर: भरण-पोषण के आदेश के संबंध में, हाईकोर्ट ने पाया कि परिवार न्यायालय ने उन सबूतों का सही मूल्यांकन नहीं किया जो सुझाव देते थे कि पत्नी की स्वतंत्र आय थी। पति ने “जॉय इंजीनियरिंग क्लासेस” का एक विज्ञापन पेश किया था जिसमें एक मोबाइल नंबर था, जिसे पत्नी ने स्वीकार किया कि वह उसका है (उसके दो सिम कार्डों में से एक)।
कोर्ट ने कहा:
“विद्वान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय ने सबूत के इस टुकड़े पर कोई विचार नहीं किया और यह भी नहीं माना कि पत्नी का भारतीय स्टेट बैंक में खाता था। उसने अपनी संपत्ति और देनदारियों के हलफनामे में इसका उल्लेख नहीं किया है।”
पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि वित्तीय विवरणों को छिपाने के कारण 20,000 रुपये प्रति माह का भरण-पोषण देने का आदेश “अपर्याप्त साक्ष्य” पर आधारित था।
निर्णय
बॉम्बे हाईकोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किया:
- दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना: परिवार न्यायालय का वह निर्णय और आदेश, जिसमें पत्नी की दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Petition No. A-126/2022) की याचिका स्वीकार की गई थी, उसे रद्द और खारिज (Quashed and Set Aside) कर दिया गया।
- भरण-पोषण: याचिका संख्या C-4/2022 और याचिका संख्या E-74/2022 में भरण-पोषण देने के आदेशों को रद्द और खारिज कर दिया गया।
- रिमांड: भरण-पोषण के मामलों को नए सिरे से विचार के लिए वापस परिवार न्यायालय, यवतमाल भेज दिया गया (Remitted back)।
- ताजा हलफनामे: दोनों पक्षों को संपत्ति और देनदारियों के ताजा हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण के रूप में पहले से भुगतान की गई राशि पत्नी से वसूल नहीं की जाएगी।
केस विवरण:
- केस टाइटल: साहिल संजय राठौड़ बनाम स्वाति साहिल राठौड़
- केस नंबर: फैमिली कोर्ट अपील संख्या 57/2024, फैमिली कोर्ट अपील संख्या 58/2024, क्रिमिनल रिवीजन एप्लीकेशन (Revn) संख्या 194/2024
- कोरम: न्यायमूर्ति एम.एस. जावलकर और न्यायमूर्ति एम.डब्ल्यू. चांदवानी

