बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र विशेष जन सुरक्षा कानून (एमएसपीएसए) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए शुक्रवार को याचिकाकर्ताओं के अधिकार क्षेत्र (लोकस स्टैंडाई) पर सवाल उठाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक याचिकाकर्ता संगठन अपने प्रतिनिधित्व का आधिकारिक प्रमाण पेश नहीं करते, तब तक वह मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं करेगी।
मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की पीठ ने कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे अपनी संस्थाओं की ओर से याचिका दायर करने का अधिकार साबित करने वाले दस्तावेज अदालत में जमा करें। पीठ ने याचिकाकर्ताओं से संगठनों के पंजीकरण प्रमाण पत्र, पदाधिकारियों के नाम और उनके संविधान की प्रतियां प्रस्तुत करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को होगी।
याचिकाकर्ताओं के कानूनी अधिकार पर मांगा स्पष्टीकरण
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत यह देखना चाहती है कि याचिकाकर्ता वास्तव में किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। पीठ ने साफ संकेत दिया कि जरूरी दस्तावेजों के बिना इन याचिकाओं पर आगे सुनवाई नहीं की जाएगी।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से इस नए कानून को असंवैधानिक घोषित कर रद्द करने और मूल अधिकारों के हनन के आधार पर इसके क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की है।
शांतिपूर्ण विरोध दबाने और असीमित अधिकारों का आरोप
यह कानून वामपंथी उग्रवादी संगठनों और उनसे मिलते-जुलते समूहों की गैरकानूनी गतिविधियों पर लगाम लगाने के मकसद से बनाया गया है। इसके तहत किसी गैरकानूनी संगठन की सदस्यता लेना अपराध की श्रेणी में आता है। साथ ही, किसी ऐसे संगठन के लिए चंदा जुटाने या उसके प्रबंधन में मदद करने पर गैर-सदस्यों को भी सजा का प्रावधान है। इसके अलावा, राज्य सरकार को किसी भी संदिग्ध संगठन को गैरकानूनी घोषित करने का अधिकार दिया गया है।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह कानून संविधान द्वारा प्रदत्त शांतिपूर्ण और वैध विरोध के अधिकार को दबाने का प्रयास है। याचिकाओं में कहा गया है कि सरकार को संगठनों पर प्रतिबंध लगाने और संपत्तियां कुर्क करने के लिए अस्पष्ट व बेहद व्यापक आधार पर मनमाने और अत्यधिक अधिकार सौंप दिए गए हैं।
कार्यपालिका की शक्तियों पर वरिष्ठ वकील की दलीलें
एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील नवरोज सीरवाई ने पीठ के समक्ष दलील दी कि ‘शहरी नक्सलवाद’ शब्द की आड़ में वैध लोकतांत्रिक गतिविधियों और असहमति को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि कानून के प्रावधान इतने कड़े हैं कि वे बैठकें आयोजित करने या अपने विचार व्यक्त करने वाले आम लोगों के भीतर डर पैदा कर सकते हैं।
सीरवाई ने तर्क दिया कि यदि सरकार अपनी मनमर्जी से यह मान लेती है कि बैठक करने वाले लोग वामपंथी हैं, तो उनकी संपत्तियों को जब्त किया जा सकता है। उन्होंने किसी व्यक्ति या संगठन को वामपंथी करार देने के आधार पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि भारतीय संविधान किसी भी वामपंथी या दक्षिणपंथी विचारधारा पर रोक नहीं लगाता।
दस्तावेज रिकॉर्ड पर आने के बाद हाईकोर्ट अब 22 अक्टूबर को इस मामले पर आगे सुनवाई करेगा।

