एक अहम कानूनी प्रश्न को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि कोई भी आम नागरिक जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 (RoP Act) की धारा 125-ए के तहत दंडनीय अपराध के लिए दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 200 के अधीन निजी आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसी शिकायतों पर CrPC की धारा 195(1) की बंदिशें लागू नहीं होती हैं, जिसके तहत किसी लोक सेवक (पब्लिक सर्वेंट) की लिखित शिकायत के बिना अदालतें कुछ अपराधों पर संज्ञान नहीं ले सकतीं। हालांकि, कर्नाटक हाईकोर्ट के कानूनी रुख को खारिज करने के बावजूद, शीर्ष अदालत ने तथ्यों के आधार पर चुने हुए जनप्रतिनिधि के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के अंतिम निर्णय को बरकरार रखा, क्योंकि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप प्रभावी ढंग से गलत साबित हो चुके थे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 21 अगस्त 2023 को अपीलकर्ता श्री राजकुमार मडकी द्वारा बेंगलुरु स्थित 42वें अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में दर्ज कराई गई एक निजी शिकायत (सीसी संख्या 29813/2023 में पीसीआर संख्या 9254/2023) से शुरू हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि वर्ष 2023 में बीदर विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित विधायक डॉ. शैलेंद्र बेलदाले ने अपने नामांकन पत्र के साथ दाखिल हलफनामे में आवासीय पते को लेकर गलत जानकारी दी थी, जो जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-ए के तहत दंडनीय अपराध है।
विधायक डॉ. बेलदाले ने इस शिकायत के खिलाफ कर्नाटक हाईकोर्ट में रिट याचिका (संख्या 7458/2024) दायर की। 7 मार्च 2025 को हाईकोर्ट ने कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा था कि “अधिनियम की धारा 125-ए को भी CrPC की धारा 195(1) की कठोर शर्तों पर खरा उतरना होगा” और इसलिए “विशेष रूप से धारा 125-ए के अपराध की शिकायत केवल चुनाव आयोग द्वारा ही की जानी चाहिए”। हाईकोर्ट ने यह तर्क भी दिया था कि “मतदाता को केवल चुनाव याचिका दायर करने का अधिकार दिया गया है, न कि इस प्रकार के अपराध की कोई निजी आपराधिक शिकायत दर्ज कराने का, जो कि यदि चुनाव आयोग चाहे तो करना उसका कर्तव्य है”। हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ श्री मडकी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जहां 20 जुलाई 2026 को विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर लीव मंजूर की गई थी।
अदालत में पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री मीनाक्षी अरोड़ा ने, वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कामत के सहयोग से, हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को चुनौती दी।
दूसरी ओर, प्रतिवादी की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता श्री आनंद संजय एम. नूली ने, अधिवक्ता सुश्री अखिला वली के सहयोग से, तर्क दिया कि यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स एवं अन्य (2002) 5 SCC 294 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद वर्ष 2002 के अधिनियम संख्या 72 द्वारा जनप्रतिनिधित्व कानून में धारा 33-ए और धारा 125-ए को शामिल किया गया था, ताकि मतदाताओं को प्रत्याशियों की पृष्ठभूमि की पूरी जानकारी मिल सके। उन्होंने बताया कि चुनाव संचालन नियम, 1961 का नियम 4A यह अनिवार्य करता है कि उम्मीदवार जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 33(1) के तहत नामांकन पत्र सौंपते समय निर्वाचन अधिकारी (रिटर्निंग ऑफिसर) को फॉर्म 26 में हलफनामा भी दे।
वरिष्ठ अधिवक्ता नूली ने दलील दी कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-ए एक गैर-संज्ञेय (non-cognizable) और जमानती अपराध है। इसी तरह भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 177 (लोक सेवक को जानबूझकर झूठी जानकारी देना) भी गैर-संज्ञेय और जमानती है। चूंकि हलफनामा निर्वाचन अधिकारी (जो एक लोक सेवक हैं) को सौंपा जाता है, इसलिए यह मामला IPC की धारा 177 के दायरे में आता है। लिहाजा, CrPC की धारा 195(1)—जो IPC की धाराओं 172 से 188 तक के मामलों में संबंधित लोक सेवक की लिखित शिकायत के बिना अदालत द्वारा संज्ञान लेने पर रोक लगाती है—की शर्तें जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-ए पर भी लागू होनी चाहिए, ताकि निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ द्वेषपूर्ण या झूठी निजी शिकायतों को रोका जा सके।
उन्होंने रघुनाथ देशपांडे बनाम कर्नाटक राज्य (2015 SCC OnLine Kar 9709) के फैसले का हवाला देते हुए उसे अलग बताया, क्योंकि उस मामले में जनप्रतिनिधित्व कानून के साथ IPC की धाराएं भी शामिल थीं। इसके अलावा, उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के 16 जून 2020 के एक प्रेस नोट का भी उल्लेख किया, जिसमें आयोग ने कहा था कि वह हलफनामे में गंभीर विसंगतियों वाले मामलों का खुद संज्ञान लेकर जांच एजेंसियों को संदर्भित करेगा।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण कानूनी सवाल तय किया: “क्या जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-ए को CrPC की धारा 195(1) की कठोर शर्तों पर खरा उतरना होगा? दूसरे शब्दों में, क्या कोई भी निजी व्यक्ति जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-ए के तहत दंडनीय अपराध के लिए किसी निर्वाचित प्रत्याशी के खिलाफ CrPC की धारा 200 के तहत शिकायत दर्ज करा सकता है?”
पीठ ने CrPC की धारा 195(1)(a) का बारीकी से अध्ययन किया और पाया कि यह धारा स्पष्ट रूप से IPC की धारा 172 से 188 तक के अपराधों पर ही लोक सेवक की शिकायत की शर्त लगाती है। अदालत ने रेखांकित किया कि CrPC की धारा 195(1) में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-ए का कहीं कोई उल्लेख नहीं है।
कानून में जबरन प्रतिबंध जोड़ने की दलील को अस्वीकार करते हुए पीठ ने बताया कि जनप्रतिनिधित्व कानून में धारा 125-ए को 24 अगस्त 2002 को जोड़ा गया था, जबकि इसके बाद अप्रैल 2006 में CrPC की धारा 195 में संशोधन किया गया था। अदालत ने टिप्पणी की: “यह माना जाता है कि विधायिका चार वर्ष पूर्व जनप्रतिनिधित्व कानून में धारा 125-ए को जोड़े जाने के प्रति पूरी तरह सचेत थी। यह स्वाभाविक रूप से स्पष्ट है कि CrPC की धारा 195 में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-ए को शामिल न करना विधायिका का एक सुविचारित निर्णय था। अतः इस बाद वाले प्रावधान के तहत कोई भी अदालत किसी निजी व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत पर जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-ए के कथित अपराध का संज्ञान लेने से वर्जित नहीं होगी।”
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि धारा 125-ए में स्पष्ट लिखा है कि यह प्रावधान “तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी” (non-obstante clause) लागू होगा। इससे यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि CrPC की धारा 195 का दायरा झूठा हलफनामा दाखिल करने के विरुद्ध निजी नागरिक द्वारा की जाने वाली शिकायत को बाधित नहीं कर सकता। दुर्भावनापूर्ण मुकदमों की आशंकाओं को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि देश के कानून सक्षम मजिस्ट्रेटों को ऐसे पर्याप्त अधिकार देते हैं कि वे मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार उचित आदेश पारित कर सकें।
चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया: “यद्यपि चुनाव आयोग अपने क्षेत्र में सर्वोच्च है और उसने कानूनी प्रावधानों की अपनी समझ के आधार पर दिशा-निर्देश या प्रेस नोट जारी किए हैं, फिर भी कानूनों की व्याख्या करना मूल रूप से अदालतों का कार्य है और ऐसे दिशा-निर्देश या प्रेस नोट हमारे लिए बाध्यकारी नहीं हैं।”
अदालत का निर्णय
केस के गुण-दोष पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि प्रत्याशी द्वारा दिए गए आवासीय पते पर अपीलकर्ता द्वारा लगाए गए झूठे विवरण के आरोप प्रथम दृष्टया प्रतिवादी द्वारा प्रभावी रूप से खारिज किए जा चुके हैं। अदालत ने कहा कि “दोषसिद्धि की संभावना बेहद क्षीण है” और कार्यवाही को जारी रखने से अदालत का कीमती समय ही नष्ट होगा। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित कार्यवाही को समाप्त करने के हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, यद्यपि इसके कानूनी आधार हाईकोर्ट के कारणों से पूर्णतः भिन्न थे।
कानूनी स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट करते हुए पीठ ने निष्कर्ष दिया: “निष्कर्ष के तौर पर, हम यह निर्णय देते हैं कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 125-ए के तहत किए गए अपराध का आरोप लगाने वाली एक निजी शिकायत को CrPC की धारा 195 की कठोर शर्तों पर खरा उतरने की आवश्यकता नहीं है, जैसा कि हाईकोर्ट द्वारा माना गया था।”
शीर्ष अदालत ने इन टिप्पणियों के साथ अपील का निपटारा कर दिया और दोनों पक्षों को अपना-अपना खर्च स्वयं वहन करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: श्री राजकुमार मडकी बनाम डॉ. शैलेंद्र बेलदाले
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 3387/2026
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 16 अक्टूबर 2026

