मजिस्ट्रेट द्वारा सुपुर्दगी के बिना ड्रग्स एक्ट के मामलों में सेशन्स कोर्ट सीधे संज्ञान नहीं ले सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द की कार्यवाही

बॉम्बे हाईकोर्ट ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत एक आपराधिक मामले को रद्द करते हुए यह स्पष्ट किया है कि सेशन्स कोर्ट मूल क्षेत्राधिकार (Original Jurisdiction) के रूप में तब तक सीधे संज्ञान नहीं ले सकता, जब तक कि मामला मजिस्ट्रेट द्वारा उसे सुपुर्द (Commit) न किया गया हो। जस्टिस एन.जे. जामदार ने स्पष्ट किया कि हालांकि ड्रग्स एक्ट में सेशन्स कोर्ट द्वारा ट्रायल का प्रावधान है, लेकिन इसमें सीधे संज्ञान लेने का कोई स्पष्ट अधिकार नहीं दिया गया है, इसलिए CrPC की धारा 193 के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा केस कमिट करने की प्रक्रिया अनिवार्य है।

मामले की पृष्ठभूमि

पिटीशनर नंबर 1, हिमाचल प्रदेश के बद्दी में स्थित एक फार्मास्युटिकल निर्माता फर्म है, और पिटीशनर नंबर 2 से 5 इसके पार्टनर हैं। 29 नवंबर 2016 को एक ड्रग्स इंस्पेक्टर ने सिलवासा के विनोबा भावे सिविल अस्पताल के सेंट्रल मेडिकल स्टोर का निरीक्षण किया और ‘FEXINOL-12’ (फेक्सोफेनाडाइन हाइड्रोक्लोराइड टैबलेट आईपी) का नमूना लिया।

इस नमूने को 30 नवंबर 2016 को गवर्नमेंट एनालिस्ट, सेंट्रल ड्रग्स टेस्टिंग लेबोरेटरी (CDTL), मुंबई भेजा गया। हालांकि, विश्लेषण रिपोर्ट, जिसमें नमूने को “मानक गुणवत्ता का नहीं” (Not of standard quality) बताया गया था, 6 जुलाई 2017 को प्राप्त हुई—यानी सात महीने से अधिक की देरी के बाद। नवंबर 2019 में मंजूरी प्राप्त करने के बाद, प्रतिवादी (यूनियन ऑफ इंडिया) ने 28 सितंबर 2021 को सिलवासा के स्पेशल जज के समक्ष शिकायत दर्ज की और उसी दिन प्रक्रिया (Process) जारी कर दी गई।

पक्षों के तर्क

पिटीशनर्स की ओर से एडवोकेट नितिन भसीन ने तर्क दिया कि जांच रिपोर्ट में अत्यधिक देरी ड्रग्स रूल्स, 1945 के नियम 45 का उल्लंघन है, जो 60 दिनों की समय सीमा निर्धारित करता है। उन्होंने यह भी कहा कि इंस्पेक्टर ने एक्ट की धारा 23(4)(iii) का पालन नहीं किया क्योंकि नमूने का एक हिस्सा निर्माता को नहीं भेजा गया था, जिससे धारा 25 के तहत जांच को चुनौती देने का उनका “अमूल्य अधिकार” छिन गया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने धारा 193 CrPC का हवाला देते हुए स्पेशल जज द्वारा सीधे संज्ञान लेने को भी चुनौती दी।

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प्रतिवादी (यूनियन ऑफ इंडिया) ने तर्क दिया कि जांच के लिए आवश्यक “रेफरेंस स्टैंडर्ड और इम्प्योरिटी स्टैंडर्ड” आसानी से उपलब्ध नहीं थे, जिसके कारण समय लगा। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पिटीशनर्स ने पुनः परीक्षण का अधिकार खो दिया है क्योंकि उन्होंने धारा 18A के तहत नोटिस प्राप्त करने के 28 दिनों के भीतर सबूत पेश करने की अपनी मंशा सूचित नहीं की थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने सात महीने की देरी पर गौर करते हुए स्पष्ट किया कि नियम 45 के तहत 60 दिनों के भीतर रिपोर्ट देना अनिवार्य है। जस्टिस जामदार ने टिप्पणी की:

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“ड्रग्स रूल्स, 1945 के नियम 45 के प्रावधान अनिवार्य (Peremptory) प्रकृति के हैं… नमूने के विश्लेषण में देरी विश्लेषण की शुचिता को समाप्त कर देती है। यही कारण है कि परीक्षण के लिए एक समय सीमा निर्धारित की गई है।”

प्रक्रियात्मक मुद्दे पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि ड्रग्स एक्ट की धारा 32(2) के तहत ट्रायल सेशन्स कोर्ट द्वारा किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो सेशन्स कोर्ट को मजिस्ट्रेट के सुपुर्दगी आदेश के बिना संज्ञान लेने के लिए अधिकृत करता हो। हाईकोर्ट ने कहा:

“जाहिर है… ड्रग्स एक्ट 1940 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो सेशन्स कोर्ट को सीधे संज्ञान लेने का अधिकार देता हो… कोड की धारा 4 से निकलने वाला आवश्यक परिणाम यह है कि धारा 193 के तहत सेशन्स कोर्ट द्वारा सीधे संज्ञान लेने पर लगी रोक के प्रावधान स्पष्ट रूप से लागू होते हैं।”

पुनः परीक्षण के अधिकार के संबंध में हाईकोर्ट ने पाया कि दवा की शेल्फ लाइफ अगस्त 2018 में समाप्त हो गई थी। चूंकि शिकायत सितंबर 2021 में दर्ज की गई थी, इसलिए पिटीशनर्स के पास पुनः परीक्षण कराने का कोई विकल्प नहीं बचा था।

सुप्रीम कोर्ट के Laborate Pharmaceuticals India Ltd. मामले का हवाला देते हुए जस्टिस जामदार ने कहा:

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“चूंकि एक्ट के तहत पुन: विश्लेषण का आरोपी का मूल्यवान अधिकार उल्लंघन होता प्रतीत होता है और दवा की संभावित शेल्फ लाइफ को देखते हुए हमारा विचार है कि आज की तारीख में यह अभियोजन, यदि जारी रखने की अनुमति दी जाती है, तो यह एक ‘लंगड़ा अभियोजन’ (Lame Prosecution) होगा।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि सेशन्स कोर्ट द्वारा बिना अधिकार के सीधे संज्ञान लेना, परीक्षण में देरी और दवा की समाप्ति के लंबे समय बाद मामला दर्ज करना पिटीशनर्स के कानूनी अधिकारों का हनन है। ऐसी स्थिति में कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया:

  1. रिट पिटीशन को मंजूर किया जाता है।
  2. ड्रग्स एक्ट, 1940 की धारा 27(d) के तहत पिटीशनर्स के खिलाफ प्रक्रिया जारी करने के 28 सितंबर 2021 के आदेश को रद्द किया जाता है।
  3. स्पेशल केस नंबर 32 ऑफ 2021 की पूरी कार्यवाही को निरस्त किया जाता है।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: मेसर्स सी.बी. हेल्थकेयर और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया
  • केस नंबर: रिट पिटीशन संख्या 2777 ऑफ 2024
  • जज: जस्टिस एन.जे. जामदार
  • दिनांक: 24 मार्च 2026

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