भूमि अधिग्रहण अधिसूचना के बाद का सेल डीड मुआवजे के लिए मान्य, हाईकोर्ट ने NHAI की अपीलें खारिज कीं

बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद बेंच) ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) द्वारा दायर मध्यस्थता अपीलों (Arbitration Appeals) के एक समूह को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति अरुण आर. पेडनेकर की एकल पीठ ने भूस्वामियों को दिए गए बढ़े हुए मुआवजे को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि धारा 3A की अधिसूचना जारी होने के तुरंत बाद निष्पादित सेल डीड (बिक्री विलेख) को बाजार मूल्य निर्धारण का आधार बनाने पर कोई कानूनी रोक नहीं है, बशर्ते वह लेनदेन वास्तविक और समकालीन हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद जलगांव से गुजरात सीमा तक नेशनल हाईवे नंबर 6 के चौड़ीकरण के लिए NHAI द्वारा की गई भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही से शुरू हुआ था। इस संबंध में 11 नवंबर 2011 को नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 की धारा 3A के तहत अधिसूचना जारी की गई थी। सक्षम प्राधिकारी (CALA) ने शुरू में ₹340 प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा और 10% ईज़मेंटरी राइट्स (सुखाधिकार) के लिए तय किया था।

दावेदारों ने इस राशि से असंतुष्ट होकर धारा 3G(5) के तहत मध्यस्थता (Arbitration) की प्रक्रिया शुरू की। आर्बिट्रेटर ने मुआवजे को बढ़ाकर ₹2,800 प्रति वर्ग मीटर कर दिया। इस निर्णय का मुख्य आधार 13 फरवरी 2012 का एक सेल डीड था, जो अधिसूचना के सार्वजनिक नोटिस के लगभग तीन सप्ताह बाद का था। NHAI ने इस अवार्ड को जिला जज के समक्ष चुनौती दी, लेकिन वहां से राहत न मिलने पर हाईकोर्ट में अपील दायर की।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता (NHAI) की ओर से: एडवोकेट श्री डी. एस. मनोरकर ने दलील दी कि आर्बिट्रेटर का निर्णय “पेटेंट इलीगलिटी” (प्रत्यक्ष अवैधता) से ग्रस्त है क्योंकि:

  1. अधिसूचना के बाद के सेल डीड पर भरोसा: NHAI का तर्क था कि धारा 3G(7)(a) के अनुसार बाजार मूल्य अधिसूचना की तारीख (11/11/2011) के आधार पर तय होना चाहिए।
  2. असमान संपत्तियों की तुलना: आरोप लगाया गया कि आर्बिट्रेटर ने कोथली गांव की कृषि भूमि की तुलना मुक्ताईनगर के व्यावसायिक भूखंडों से की और “साइज फैक्टर” (प्लॉट के आकार) को नजरअंदाज किया।
  3. ब्याज की वैधता: NHAI के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आर. एल. जैन बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण मामले के तहत ब्याज केवल भौतिक कब्जा लेने की तारीख से देय होना चाहिए।
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प्रतिवादी (दावेदारों) की ओर से: एडवोकेट श्री ए. पी. भंडारी ने दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि:

  1. कानूनी मिसाल: चिमनलाल हरगोविंददास बनाम स्पेशल लैंड एक्विजिशन ऑफिसर मामले के अनुसार, यदि अधिसूचना के बाद का लेनदेन वास्तविक और समय के करीब है, तो उसे आधार माना जा सकता है।
  2. समानता का सिद्धांत: NHAI ने पहले ही इसी 2012 के सेल डीड के आधार पर पड़ोसी जमीनों के लिए समान अवार्ड्स को स्वीकार कर लिया है।
  3. विच्छेद (Severance): दावेदारों ने हलफनामे के माध्यम से अधिग्रहण के कारण हुए नुकसान को साबित किया था, जिसे NHAI ने चुनौती नहीं दी थी।
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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से 13 फरवरी 2012 के सेल डीड की वैधता पर विचार किया। सुप्रीम कोर्ट के चिमनलाल हरगोविंददास फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अधिसूचना के बाद के सेल इंस्टेंस पर विचार किया जा सकता है यदि वे वास्तविक हों और अधिग्रहण के कारण कीमतों में कृत्रिम उछाल न आया हो।

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“आर्बिट्रेटर द्वारा जिस सेल डीड पर भरोसा किया गया है, वह अधिसूचना के महज तीन सप्ताह बाद निष्पादित किया गया था। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जो यह संकेत दे कि उसमें बताई गई बिक्री कीमत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई थी, और न ही उस लेनदेन की वास्तविकता को चुनौती दी गई है।”

संपत्तियों की तुलना पर कोर्ट ने पाया कि यदि अधिसूचना से पहले के अन्य सेल डीड्स में वार्षिक वृद्धि (escalation) को जोड़ा जाए, तो भी प्राप्त मूल्य आर्बिट्रेटर द्वारा निर्धारित राशि के करीब ही पहुंचता है।

विच्छेद (Severance) और सुखाधिकार के मुद्दे पर कोर्ट ने कृष्णा बालचंद्र हदफदकर बनाम स्पेशल लैंड एक्विजिशन ऑफिसर मामले का संदर्भ दिया। कोर्ट ने कहा कि हाईवे चौड़ीकरण के लिए जमीन का आंशिक हिस्सा लेने से शेष जमीन की उपयोगिता और आर्थिक मूल्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा

न्यायमूर्ति पेडनेकर ने आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 34 और 37 के तहत कोर्ट के हस्तक्षेप के सीमित दायरे पर जोर दिया। पी.एस.ए. सिकल टर्मिनल्स प्रा. लि. बनाम बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज और MMTC लिमिटेड बनाम वेदांता लिमिटेड का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:

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“अवार्ड के गुण-दोष के आधार पर हस्तक्षेप करना स्वीकार्य नहीं होगा… किसी अवार्ड को तभी रद्द किया जा सकता है जब उसमें प्रत्यक्ष अवैधता (patent illegality) हो जो मामले की जड़ तक जाती हो। हालांकि, कानून के महज गलत अनुप्रयोग को हस्तक्षेप का आधार नहीं बनाया जा सकता।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आर्बिट्रेटर का मूल्यांकन प्रासंगिक सामग्री पर आधारित था और इसमें कोई अवैधता नहीं थी। कोर्ट ने NHAI की अपीलों को खारिज कर दिया और दावेदारों को जमा की गई राशि निकालने की अनुमति दे दी, बशर्ते वे यह वचन दें कि यदि भविष्य में कोई विपरीत आदेश आता है, तो वे राशि वापस जमा करेंगे।

मामले का विवरण

  • केस का शीर्षक: नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया बनाम संगीता सुनील पाटिल और अन्य (व संबंधित मामले)
  • केस नंबर: आर्बिट्रेशन अपील नंबर 103 ऑफ 2025
  • बेंच: न्यायमूर्ति अरुण आर. पेडनेकर
  • तारीख: 01 अप्रैल, 2026

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