बॉम्बे हाईकोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में आरोपी पति को बरी किया, कहा – क्रूरता या आत्महत्या के लिए उकसावे का कोई सबूत नहीं

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐसे व्यक्ति की 25 साल पुरानी सजा को रद्द कर दिया है, जिसे अपनी पत्नी की आत्महत्या के लिए उकसाने और उसे प्रताड़ित करने के आरोप में दोषी ठहराया गया था। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।

न्यायमूर्ति एम. एम. सथाये की एकल पीठ ने मंगलवार को पुणे सत्र न्यायालय के 1998 के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें रामप्रकाश गोविंद मनोहर को भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसावा) और 498-ए (क्रूरता) के तहत तीन साल की सजा सुनाई गई थी।

मामला मई 1997 का है, जब मनोहर ने रेखा से विवाह किया था। विवाह के करीब छह महीने बाद रेखा का शव पुणे के पास नदी में मिला। अभियोजन का आरोप था कि पति और ससुरालवालों ने रेखा को पैसे और सिलाई मशीन के लिए परेशान किया, जिससे उसने आत्महत्या कर ली।
हालांकि, मनोहर ने सभी आरोपों से इनकार किया।

अदालत ने साक्ष्यों की जांच के बाद कहा कि “क्रूरता का आवश्यक तत्व, अर्थात ऐसा व्यवहार जो किसी स्त्री को आत्महत्या करने के लिए विवश कर सके, न तो स्पष्ट रूप से सामने आया है और न ही सिद्ध हुआ है।”

न्यायमूर्ति सथाये ने यह भी कहा कि “सिर्फ यह कहना कि मृतका उदास रहती थी या रोया करती थी, इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए पर्याप्त नहीं है कि उसे प्रताड़ित किया गया।”

अदालत ने कहा कि न तो क्रूरता का और न ही आत्महत्या के लिए उकसावे का कोई ठोस प्रमाण है। इस आधार पर 1998 के सत्र न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए रामप्रकाश गोविंद मनोहर को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।

इस फैसले के साथ 25 साल से लंबित यह मामला समाप्त हो गया।

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