इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने ब्लैक मनी (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति) और कर अधिरोपण अधिनियम, 2015 के तहत एक आवेदक के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही और समनिंग आदेश (Summoning Order) पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा कि विदेशी संपत्ति के अर्जन (Acquisition) की तारीख और उसके खुलासे (Reporting) की अनिवार्यता से जुड़े मुद्दे पर “तथ्यों और कानून दोनों पर विचार करने की आवश्यकता है।”
मामले की पृष्ठभूमि (Background)
याची राकेश श्रीवास्तव ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (कस्टम), लखनऊ की अदालत में लंबित आपराधिक शिकायत संख्या 65915 ऑफ 2025 और 20 जून 2025 के संज्ञान आदेश को चुनौती दी थी। यह शिकायत ब्लैक मनी एक्ट, 2015 की धारा 50 के तहत दर्ज की गई थी।
अभियोजन पक्ष का मामला 5 मार्च 2024 को क्वांटम ग्रुप और आवेदक के आवास पर हुई तलाशी अभियान (Search Operation) पर आधारित था। तलाशी के दौरान, “पैरामाउंट टॉवर होटल एंड रेजिडेंस दुबई” में अचल संपत्ति में निवेश से संबंधित 29 जून 2021 का एक एग्रीमेंट जब्त किया गया था।
विभाग का आरोप था कि आवेदक ने आयकर अधिनियम की धारा 132(4) के तहत अपने बयान में स्वीकार किया कि उक्त संपत्ति (PTR/35/3503) उन्होंने और उनके भाई ने खरीदी थी, जिसकी सेल डीड 1 मार्च 2023 को निष्पादित (Execute) हुई थी। आरोप लगाया गया कि आवेदक ने निर्धारण वर्ष (Assessment Year) 2023-24 के अपने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) के ‘शेड्यूल एफए’ (विदेशी संपत्ति) में इस संपत्ति का खुलासा नहीं किया।
पक्षों की दलीलें (Arguments)
आवेदक का पक्ष: आवेदक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पूर्णेंदु चक्रवर्ती के साथ अधिवक्ता शिवांशु गोस्वामी एवं प्रेरणा जलान ने तर्क दिया कि संपत्ति के अर्जन के समय को देखते हुए एक्ट की धारा 50 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है।
- रिपोर्टिंग की अवधि: अधिवक्ता ने दलील दी कि निर्धारण वर्ष 2023-24 (वित्तीय वर्ष 2022-23) के लिए, शेड्यूल एफए के तहत उन संपत्तियों की जानकारी देनी होती है जो 31 दिसंबर 2022 तक उनके पास थीं। चूंकि संपत्ति की रजिस्ट्री 1 मार्च 2023 को हुई थी, इसलिए 31 दिसंबर 2022 की कट-ऑफ तारीख तक यह संपत्ति उनके स्वामित्व में नहीं थी। अतः, निर्धारण वर्ष 2023-24 के रिटर्न में इसका खुलासा करना अनिवार्य नहीं था।
- एग्रीमेंट की कानूनी स्थिति: सुप्रीम कोर्ट के इंडियन ओवरसीज बैंक बनाम एम.ए.एस. सुब्रमण्यम मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि केवल बिक्री का समझौता (Agreement for Sale) संपत्ति में कोई हित (Interest) पैदा नहीं करता है। स्वामित्व केवल पंजीकृत सेल डीड से ही मिलता है। इसलिए, 2021 का एग्रीमेंट स्वामित्व का सबूत नहीं माना जा सकता।
- नॉन-स्पीकिंग ऑर्डर: यह भी दलील दी गई कि निचली अदालत द्वारा जारी किया गया 20 जून 2025 का समनिंग आदेश “अस्पष्ट” (Cryptic) और बिना कारण बताए पारित किया गया “नॉन-स्पीकिंग” आदेश है।
प्रतिवादी (भारत संघ) का पक्ष: भारत संघ की ओर से अधिवक्ता श्री कुशाग्र दीक्षित और श्री नीरव चित्रवंशी ने याचिका का विरोध किया।
- स्वतंत्र अभियोजन: उन्होंने तर्क दिया कि एक्ट के अध्याय V (अपराध और अभियोजन) के प्रावधान अन्य कानूनों के अतिरिक्त हैं, न कि उनके अल्पीकरण में। धारा 48 और 50 के तहत कार्यवाही स्वतंत्र रूप से की जा सकती है।
- जानबूझकर विफलता: उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत के बाहर स्थित संपत्ति की जानकारी देने में जानबूझकर की गई विफलता (Willful Failure) दंडनीय अपराध है, जिसमें कठोर कारावास का प्रावधान है।
कोर्ट का निर्णय (Decision)
न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया, विशेष रूप से समनिंग आदेश के नॉन-स्पीकिंग होने और रिपोर्टिंग अवधि से जुड़े तथ्यात्मक विवाद पर।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:
“पक्षों की विरोधी दलीलों, उनके कानूनी और तथ्यात्मक तर्कों और इस तर्क को देखने के बाद कि आक्षेपित समनिंग आदेश बिना किसी कारण या संतुष्टि को दर्ज किए पारित किया गया एक नॉन-स्पीकिंग आदेश है, मेरी राय है कि इस मामले में तथ्यों और कानून दोनों पर विचार करने की आवश्यकता है।”
परिणाम: हाईकोर्ट ने आवेदक को अंतरिम राहत प्रदान की। कोर्ट ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक, विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (कस्टम), लखनऊ की अदालत में लंबित शिकायत और 20 जून 2025 के संज्ञान व समनिंग आदेश की कार्यवाही पर, जहाँ तक आवेदक का संबंध है, रोक रहेगी।
कोर्ट ने शिकायतकर्ता के वकील को दो सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है और मामले को दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में सूचीबद्ध किया है।
मामले का विवरण (Case Details)
- केस का नाम: राकेश श्रीवास्तव बनाम भारत संघ व अन्य
- केस नंबर: Application U/S 528 BNSS No. 1936 of 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति बृज राज सिंह

