दिल्ली आबकारी नीति मामला: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा से केस ट्रांसफर की मांग खारिज होने के बाद केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट पहुंचे

दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े मामले में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा उस अनुरोध को अस्वीकार किए जाने को चुनौती दी है, जिसमें सीबीआई की याचिका को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ से हटाकर किसी अन्य न्यायाधीश को सौंपने की मांग की गई थी।

सूत्रों के अनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय ने यह कहते हुए स्थानांतरण की मांग ठुकरा दी कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा सीबीआई की याचिका को न्यायालय की निर्धारित रोस्टर व्यवस्था के अनुसार सुन रही हैं। ऐसे में प्रशासनिक स्तर पर मामले को किसी अन्य पीठ को सौंपने का कोई आधार नहीं बनता।

मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी न्यायाधीश के मामले से स्वयं को अलग करने का निर्णय संबंधित न्यायाधीश ही लेते हैं।

सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट द्वारा केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य आरोपियों को डिस्चार्ज किए जाने के आदेश को चुनौती दी है। यह याचिका सोमवार को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।

आम आदमी पार्टी ने बताया कि मुख्य न्यायाधीश द्वारा स्थानांतरण की मांग खारिज किए जाने के बाद केजरीवाल और सिसोदिया ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

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इससे पहले 11 मार्च को केजरीवाल, सिसोदिया और इस मामले में डिस्चार्ज किए गए अन्य आरोपियों ने मुख्य न्यायाधीश को एक प्रतिनिधित्व भेजकर अनुरोध किया था कि सीबीआई की याचिका को किसी “निष्पक्ष” न्यायाधीश के समक्ष सुनवाई के लिए भेजा जाए।

अपने आवेदन में केजरीवाल ने कहा था कि उन्हें यह “गंभीर, वास्तविक और उचित आशंका” है कि मौजूदा पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई पूरी तरह निष्पक्ष और तटस्थ नहीं हो पाएगी।

गौरतलब है कि 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल, सिसोदिया सहित 21 अन्य आरोपियों को इस मामले में डिस्चार्ज कर दिया था।

ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में सीबीआई की जांच पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा था कि एजेंसी का मामला न्यायिक परीक्षण में टिकने योग्य नहीं है और पूरी तरह अविश्वसनीय प्रतीत होता है।

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इसके बाद 9 मार्च को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने की सिफारिश पर रोक लगा दी थी।

साथ ही अदालत ने सीबीआई की याचिका पर सभी 23 आरोपियों को नोटिस जारी करते हुए कहा था कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में दर्ज कुछ निष्कर्ष प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण प्रतीत होते हैं और इन पर विचार किए जाने की आवश्यकता है।

केजरीवाल ने अपने प्रतिनिधित्व में यह भी कहा कि सीबीआई की रिवीजन याचिका पर पहली ही सुनवाई में अदालत ने बिना दूसरी पक्ष को सुने ट्रायल कोर्ट के आदेश को “त्रुटिपूर्ण” बताया।

उन्होंने यह भी आपत्ति जताई कि ट्रायल कोर्ट द्वारा सीबीआई अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के निर्देशों पर रोक लगाते समय अदालत ने किसी विशिष्ट त्रुटि या विकृति का उल्लेख नहीं किया।

इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि जस्टिस शर्मा पहले भी इसी सीबीआई एफआईआर से जुड़े कई मामलों की सुनवाई कर चुकी हैं, जिनमें:

  • केजरीवाल की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली याचिका
  • मनीष सिसोदिया और आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह की जमानत याचिकाएं
  • तेलंगाना जागृति की अध्यक्ष के. कविता की याचिका
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शामिल हैं, और इन मामलों में किसी भी आरोपी को राहत नहीं मिली।

प्रतिनिधित्व में यह भी कहा गया कि इन मामलों में दिए गए तीन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट बाद में रद्द कर चुका है, जबकि एक मामले को बड़ी पीठ के पास विचार के लिए भेजा गया है।

केजरीवाल ने अपने आवेदन में यह भी कहा कि उनके खिलाफ दर्ज मामला राजनीतिक रूप से प्रेरित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मामले को दूसरी पीठ को सौंपने की मांग किसी व्यक्तिगत पूर्वाग्रह के आधार पर नहीं बल्कि एक निष्पक्ष और सूचित याचिकाकर्ता की दृष्टि से उत्पन्न उचित आशंका के आधार पर की गई है।

मुख्य न्यायाधीश द्वारा यह मांग खारिज किए जाने के बाद अब केजरीवाल और सिसोदिया ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

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