प्रजनन स्वायत्तता (reproductive autonomy) को बरकरार रखने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में, दिल्ली हाईकोर्ट ने भारतीय सेना के एक जवान की पत्नी को इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दी है। उक्त सैनिक वर्तमान में ‘पpersistent vegetative state’ (चेतना शून्य अवस्था) में है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इलाज की शुरुआत में दी गई पति की सहमति इस चरण में भी पर्याप्त मानी जाएगी, जिससे एक पत्नी को उसके मातृत्व के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या एक दंपति द्वारा स्वेच्छा से शुरू की गई IVF प्रक्रिया को किसी एक साथी की बाद की अक्षमता के कारण रोका जा सकता है। सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) अधिनियम के तहत लिखित सहमति की आवश्यकता होती है, लेकिन जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने कहा कि पति की पूर्व सक्रिय भागीदारी और सहमति पर्याप्त थी। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि कानून के मूल उद्देश्य को पूरा करने के लिए पत्नी की सहमति को ही पति की ओर से वैध सहमति माना जाएगा।
याचिकाकर्ता और उनके पति, जो सेना में कार्यरत हैं, ने संतान प्राप्ति के लिए जून 2023 में IVF उपचार का विकल्प चुना था। हालांकि, जुलाई 2025 में एक दुखद घटना में गश्त के दौरान ऊंचाई से गिरने के कारण पति को गंभीर मस्तिष्क चोट (traumatic brain injury) आई।
चिकित्सा जांच में पाया गया कि सैनिक अब ऐसी स्थिति में है जहां निकट भविष्य में सुधार की कोई संभावना नहीं है। पति की नई लिखित सहमति न होने का हवाला देते हुए सेना अस्पताल ने IVF उपचार रोक दिया था। इसके बाद पत्नी ने अपने मातृत्व, गरिमा और प्रजनन स्वायत्तता के संवैधानिक अधिकारों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि दंपति ने मूल रूप से उपचार के लिए खुद को स्वेच्छा से प्रस्तुत किया था और रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह दर्शाए कि पति ने कभी अपनी सहमति वापस ली थी। जस्टिस कौरव ने टिप्पणी की कि वेजिटेटिव स्टेट में पड़े व्यक्ति से नई लिखित सहमति की मांग करना “शारीरिक रूप से असंभव” कार्य है और ऐसा करना उनके शुरुआती निर्णय के उद्देश्य को ही समाप्त कर देगा।
अदालत ने कहा, “प्रजनन स्वायत्तता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। ART अधिनियम की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो इस अधिकार को आगे बढ़ाए, न कि इसे कम करे।”
मेडिकल बोर्ड की उस राय पर, जिसमें कहा गया था कि व्यवहार्य शुक्राणु प्राप्त करने की संभावना “नगण्य” है, कोर्ट ने एक दार्शनिक और मानवीय रुख अपनाया। श्रीमद्भागवत पुराण के श्लोक—”एक जीवित प्राणी दैव की देखरेख में शरीर प्राप्त करता है”—का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:
“यह नियति ही है जो तय करती है कि माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा या नहीं। इस अदालत को याचिकाकर्ता के भाग्य में बाधा नहीं डालनी चाहिए और पति से वह मांग नहीं करनी चाहिए जो शारीरिक रूप से असंभव और अव्यावहारिक है।”
दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के पति द्वारा IVF उपचार में शामिल होने की पिछली कार्रवाई और उनकी सहमति को ART अधिनियम की धारा 22 के उद्देश्यों के लिए पर्याप्त अनुपालन माना जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि अधिकारी केवल इस आधार पर याचिकाकर्ता को अयोग्य नहीं ठहरा सकते कि पति की वर्तमान लिखित सहमति अनुपस्थित है।
इस आदेश के साथ ही याचिकाकर्ता अब अपने पति की आनुवंशिक सामग्री (genetic material) के निष्कर्षण और संरक्षण के साथ आगे बढ़ सकती है।

