पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक सेना अधिकारी की पत्नी को ‘लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन’ देने के सशस्त्र बल ट्राइब्यूनल (AFT) के फैसले को बरकरार रखा है। मेजर सुशील कुमार सैनी की मृत्यु 1991 में ऑपरेशन रक्षक के तहत अंतरराष्ट्रीय सीमा पर ड्यूटी के दौरान बंकर में हुई थी।
मेजर सुशील कुमार सैनी पंजाब में भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर ऑपरेशन रक्षक के तहत तैनात थे। 12 और 13 मई, 1991 की रात को उन्होंने अपने क्षेत्र के सीमा चौकियों का निरीक्षण किया था। रात 2 बजे उन्हें सूचना मिली कि 25 बांग्लादेशी पाकिस्तान की ओर अवैध रूप से पार करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने संबंधित अधिकारी सूबेदार वी वी के राव को स्थिति संभालने का निर्देश दिया और रिपोर्ट ली। इसके बाद उन्होंने बंकर में विश्राम किया।
सुबह जब सहायक ने उन्हें बंकर में बेहोशी की हालत में पाया, तो उन्हें अमृतसर के मिलिट्री अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित किया। मृत्यु का कारण तीव्र मायोकार्डियल इन्फार्क्शन (हार्ट अटैक) बताया गया।
उनकी पत्नी अनुराधा सैनी को शुरुआत में साधारण पारिवारिक पेंशन दी गई। सेना ने यह कहते हुए ‘लिबरलाइज्ड पेंशन’ देने से इनकार कर दिया कि अधिकारी की मृत्यु न तो सेवा से जुड़ी थी और न ही उससे उत्पन्न हुई।
अनुराधा सैनी ने AFT चंडीगढ़ में याचिका दायर की, जहां मार्च 2023 में ट्राइब्यूनल ने माना कि अधिकारी की मृत्यु सैन्य सेवा के दौरान और सरकार द्वारा अधिसूचित ऑपरेशन रक्षक के तहत ड्यूटी पर हुई थी। इस आधार पर AFT ने लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन देने का आदेश दिया।
केंद्र सरकार ने इस फैसले को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी। सरकार ने तर्क दिया कि मेजर की मृत्यु बंकर में सोते समय हुई, इसलिए इसे ऑपरेशनल क्षेत्र में ड्यूटी पर हुई मृत्यु नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति हरसिमरन सिंह सेठी और न्यायमूर्ति विकास सूरी की खंडपीठ ने केंद्र की अपील खारिज कर दी और AFT के निर्णय को सही ठहराया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष दिया गया था कि अधिकारी की मृत्यु सैन्य सेवा के दौरान और वैध ड्यूटी करते समय हुई।
कोर्ट ने कहा:
“एक बार यह तथ्य स्वीकार कर लिया गया कि अधिकारी की मृत्यु ऑपरेशन रक्षक के तहत ड्यूटी के दौरान हुई, तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह सेवा से असंबद्ध थी।”
कोर्ट ने यह भी माना कि अधिकारी पहले से हाइपरटेंशन से पीड़ित थे और ड्यूटी का तनाव उनकी मृत्यु का कारण हो सकता है। अदालत ने मामले को कैटेगरी E(1) के अंतर्गत माना, जो सरकार द्वारा विशेष रूप से अधिसूचित सैन्य अभियानों के दौरान हुई मौतों पर लागू होती है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर ड्यूटी के दौरान हुई मृत्यु को ‘लिबरलाइज्ड फैमिली पेंशन’ से वंचित नहीं किया जा सकता, भले ही वह गोलीबारी जैसी घटना न हो। यह फैसला ऐसे मामलों में मार्गदर्शन करेगा, जहां सैन्य अधिकारी की मृत्यु ड्यूटी के तनाव के बीच प्राकृतिक कारणों से होती है, लेकिन वह ऑपरेशनल एरिया में और बोना फाइड मिलिट्री ड्यूटी के दौरान हुई हो।

