बिना ठोस प्रमाण के केवल दुर्भावना के आरोपों पर इनकम टैक्स समन रद्द नहीं किया जा सकता: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इनकम टैक्स अधिनियम, 1961 की धारा 131 (1A) के तहत जारी वैधानिक समन को केवल दुर्भावना (Mala Fide) या शक्ति के दुरुपयोग के निराधार आरोपों के आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि दुर्भावना सिद्ध करने का बोझ “अत्यधिक भारी” होता है और इसे अपूर्ण तथ्यों से निकाले गए संदिग्ध निष्कर्षों के आधार पर स्थापित नहीं किया जा सकता।

जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस बालाजी मेदामल्ली की खंडपीठ ने एक करदाता द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें इनकम टैक्स विभाग (जांच विंग) द्वारा जारी समन को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि यह कार्रवाई एक वरिष्ठ इनकम टैक्स अधिकारी के रिश्तेदारों के साथ चल रहे संपत्ति विवाद के कारण बदले की भावना से की गई है। हालांकि, हाईकोर्ट को ‘तथ्यात्मक दुर्भावना’ (Malice in Fact) या ‘कानूनी दुर्भावना’ (Malice in Law) का कोई साक्ष्य नहीं मिला और यह पाया गया कि विभाग ने एक विशिष्ट टैक्स चोरी याचिका (TEP) के आधार पर कार्रवाई की थी।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, कोडुरु पिचेश्वर राव को 14 नवंबर, 2025 को इनकम टैक्स अधिकारी (जांच), विजयवाड़ा द्वारा अधिनियम की धारा 131 (1A) के तहत समन जारी किया गया था। इस समन के माध्यम से 1 अप्रैल, 2019 से अब तक के खातों की किताबें, बैंक स्टेटमेंट और संपत्तियों का विवरण मांगा गया था।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह समन दुर्भावनापूर्ण है। उन्होंने विजयवाड़ा में एक संपत्ति से संबंधित लंबित दीवानी मुकदमे (O.S.No.608 of 2025) का हवाला दिया, जिसमें उन्हें अंतरिम निषेधाज्ञा (Injunction) प्राप्त थी। उनका आरोप था कि उस मुकदमे के प्रतिवादी इनकम टैक्स के मुख्य आयुक्त (प्रतिवादी संख्या 3) के करीबी रिश्तेदार हैं और विभाग का उपयोग उन पर समझौते के लिए दबाव बनाने हेतु किया जा रहा है।

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पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के तर्क: याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री के.एस. मूर्ति ने तर्क दिया कि इनकम टैक्स के डिप्टी कमिश्नर (प्रतिवादी संख्या 4) ने याचिकाकर्ता के ऑडिटर से संपर्क कर दीवानी विवाद न सुलझाने पर “गंभीर परिणाम” भुगतने की धमकी दी थी। उन्होंने दलील दी कि यह जांच शक्ति का रंगीन प्रयोग (Colorable exercise of power) है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने क्षेत्राधिकार पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इनकम टैक्स अधिकारी धारा 131 (1A) के तहत “अधिकृत अधिकारी” नहीं है।

प्रतिवादियों के तर्क: राजस्व विभाग की ओर से असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल श्री चल्ला धनंजय ने रिकॉर्ड पेश करते हुए बताया कि जांच 12 नवंबर, 2025 को प्राप्त एक गुमनाम टैक्स चोरी याचिका (TEP) के आधार पर शुरू हुई थी। उन्होंने तर्क दिया कि विभाग ने मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पालन किया और इनकम टैक्स बिजनेस एप्लीकेशन (ITBA) मॉड्यूल के माध्यम से विशिष्ट पहचान संख्या (UIN) आवंटित की। प्रतिवादियों ने दीवानी मुकदमे की जानकारी होने से इनकार किया और कहा कि समन केवल घोषित आय और संपत्तियों के सत्यापन के लिए जारी किए गए थे।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने घटनाक्रम और आरोपों की प्रकृति का बारीकी से परीक्षण किया। कोर्ट ने नोट किया कि दीवानी मुकदमे में निषेधाज्ञा अप्रैल 2025 में दी गई थी, जबकि टैक्स की कार्रवाई TEP मिलने के बाद नवंबर 2025 में शुरू हुई।

दुर्भावना सिद्ध करने के दायित्व पर: यूनियन ऑफ इंडिया बनाम अशोक कुमार (2005) मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा:

“जो कोई भी किसी कार्य या आदेश को अमान्य या शून्य घोषित कराना चाहता है, उसे दुर्भावना, या प्राधिकारी द्वारा अपनी शक्तियों के दुरुपयोग का आरोप सिद्ध करना होगा… दुर्भावना के आरोप अक्सर साबित करने की तुलना में लगाना आसान होते हैं, और ऐसे आरोपों की गंभीरता उच्च स्तर की विश्वसनीयता के प्रमाण की मांग करती है।”

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के दावे मुख्य रूप से उनके चार्टर्ड अकाउंटेंट के एक हलफनामे पर आधारित थे, जो समन जारी होने के बाद तैयार किया गया था और विभाग के समक्ष कभी प्रस्तुत नहीं किया गया था।

कानूनी दुर्भावना और वैधानिक कर्तव्य: हाईकोर्ट ने जोर दिया कि किसी दीवानी डिक्री या मुकदमे का अस्तित्व वैधानिक अधिकारियों को उनके कर्तव्यों के पालन से नहीं रोकता है। HMT लिमिटेड बनाम मुदप्पा (2007) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा:

“सक्षम न्यायालय द्वारा डिक्री पारित करना एक बात है और प्राधिकारी द्वारा वैधानिक शक्ति का प्रयोग करना पूरी तरह से अलग बात है… कानून की अदालत द्वारा डिक्री के बाद प्रारंभिक अधिसूचना जारी करना अपने आप में उसे कमजोर या शक्ति का दुर्भावनापूर्ण प्रयोग नहीं बनाता है।”

क्षेत्राधिकार पर: हाईकोर्ट ने इनकम टैक्स अधिकारी के अधिकार को चुनौती देने वाले तर्क को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि धारा 131 (1A) को धारा 132 (1) के साथ पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि सक्षम उच्च अधिकारियों द्वारा अधिकृत होने पर इनकम टैक्स अधिकारी इसमें शामिल हैं। इसके अलावा, यह आधार रिट याचिका में भी नहीं उठाया गया था।

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हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता न तो ‘तथ्यात्मक दुर्भावना’ और न ही ‘कानूनी दुर्भावना’ स्थापित कर पाया। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि यदि ऐसे “निराधार तर्कों” को स्वीकार किया गया, तो कोई भी करदाता केवल एक दीवानी विवाद का हवाला देकर वैध टैक्स जांच को रोक सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा:

“इनकम टैक्स अधिनियम के तहत उत्तरदायी किसी भी व्यक्ति को दुर्भावना के ऐसे निराधार आरोपों के आधार पर लागू किए जा रहे वैधानिक प्रावधानों से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

इसके साथ ही रिट याचिका को खारिज कर दिया गया और सभी लंबित याचिकाओं को बंद कर दिया गया।

मामले का विवरण

  • केस टाइटल: कोडुरु पिचेश्वर राव बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य
  • रिट याचिका संख्या: 841 / 2026
  • बेंच: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस बालाजी मेदामल्ली
  • दिनांक: 18 मार्च, 2026

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