इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सहानुभूतिपूर्ण और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण फैसले में एक विधवा की मदद की, जिसे उसके दिवंगत पति के इलाज से जुड़े मेडिकल बिलों की प्रतिपूर्ति सिर्फ तकनीकी देरी के कारण नकार दी गई थी। यह मामला, WRIT – A No. – 122 of 2025, न्यायमूर्ति अजीत कुमार द्वारा 17 मार्च 2025 को निपटाया गया।
मामला क्या था?
याचिकाकर्ता, श्रीमती मैमूना बेगम, ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने लोक निर्माण विभाग, रायबरेली के कार्यपालक अभियंता द्वारा उनके मेडिकल रिइम्बर्समेंट के दावे को खारिज किए जाने को चुनौती दी। दावा इसलिए खारिज किया गया क्योंकि बिल विभागीय नियमों के अनुसार निर्धारित 90 दिनों की अवधि के बाद जमा किए गए थे।
उनके वकील, अधिवक्ता कलेंद्र प्रसाद और धर्मेंद्र कुमार ने दलील दी कि देरी जानबूझकर नहीं हुई थी, बल्कि पति की मृत्यु के बाद हुए मानसिक आघात और शोक की स्थिति के कारण हुई। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार को इस मामले को मानवीय दृष्टिकोण से देखना चाहिए था न कि केवल तकनीकी नियमों के आधार पर।

वहीं राज्य सरकार और अन्य पाँच प्रतिवादियों ने, मुख्य स्थायी अधिवक्ता के माध्यम से, नियमों के तहत 90 दिनों की सख्त समय सीमा का हवाला देते हुए अपने फैसले को उचित ठहराया।
कानूनी प्रश्न:
- क्या मेडिकल रिइम्बर्समेंट के लिए 90 दिन की समयसीमा अनिवार्य है या केवल दिशानिर्देशात्मक (directory) है, विशेषकर जब कर्मचारी की मृत्यु हो चुकी हो?
- क्या शोक और मानसिक स्थिति के कारण हुई देरी को ऐसे कल्याणकारी मामलों में क्षम्य माना जा सकता है?
कोर्ट का फैसला और टिप्पणियाँ:
न्यायमूर्ति अजीत कुमार ने कहा:
“यदि कोई कर्मचारी इलाज के दौरान मृत्यु को प्राप्त हो गया हो, तो उसकी पत्नी या वारिसों को तकनीकी कारणों से परेशान नहीं किया जाना चाहिए।”
उन्होंने यह भी कहा कि नियम प्रशासनिक अनुशासन के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन जब किसी का दावा वास्तविक हो और कोई धोखाधड़ी की मंशा न हो, तो नियमों को मानवीय संवेदना और न्याय के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“ऐसा नियम जो मेडिकल बिलों की प्रतिपूर्ति के लिए समय-सीमा निर्धारित करता है, जीवित कर्मचारी के मामले में सख्ती से लागू किया जा सकता है, लेकिन जहाँ कर्मचारी का इलाज के दौरान निधन हो गया हो, वहाँ वारिसों के दावों में यह नियम बाधा नहीं बनना चाहिए।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा कोई प्रावधान प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह सिद्ध हो कि 90 दिन के बाद दावा अनिवार्य रूप से खारिज किया जाना चाहिए।
न्यायालय ने इन नियमों को दिशानिर्देशात्मक करार दिया और कहा कि विधवाओं या वैध उत्तराधिकारियों के कल्याण से जुड़े मामलों में समयसीमा के नियम को कठोरता से लागू नहीं किया जाना चाहिए, खासकर जब कोई दुर्भावना न हो।
आदेश:
अदालत ने श्रीमती मैमूना बेगम को निर्देश दिया कि वे अपने मेडिकल बिल चार सप्ताह के भीतर कार्यपालक अभियंता, पीडब्ल्यूडी, रायबरेली को पुनः प्रस्तुत करें। अधिकारी को उसके दो सप्ताह के भीतर बिना किसी देरी का मुद्दा उठाए नियमों के अनुसार निर्णय लेकर भुगतान की प्रक्रिया करनी होगी।
इस प्रकार, याचिका न्याय की ओर एक मजबूत संदेश के साथ प्रक्रिया संबंधी तकनीकीताओं पर न्याय की प्रधानता को स्थापित करते हुए निस्तारित की गई।