POCSO मामलों में अग्रिम जमानत देने से पहले पीड़ित का पक्ष सुनना जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी की सभी विशेष अदालतों को दिए निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि POCSO एक्ट से जुड़े मामलों में पीड़ित या उसके अभिभावक को सुनवाई का उचित अवसर दिए बिना किसी आरोपी की अग्रिम जमानत अर्जी पर फैसला नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश की सभी विशेष POCSO अदालतों को निर्देश दिया है कि वे अग्रिम जमानत पर फैसला करने से पहले पीड़ित पक्ष को अपनी बात रखने का पूरा मौका दें।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि पीड़ित निजी वकील की सेवाएं लेने में असमर्थ है, तो अदालत की जिम्मेदारी होगी कि वह सरकारी खर्च पर आपराधिक मामलों का पर्याप्त अनुभव रखने वाला कानूनी सहायता वकील उपलब्ध कराए।

जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने 29 सितंबर के अपने आदेश में बुलंदशहर के एक POCSO मामले में दो आरोपियों को मिली अग्रिम जमानत रद्द करते हुए ये निर्देश दिए। हाईकोर्ट ने पाया कि विशेष POCSO अदालत ने पीड़िता को नोटिस जारी किए बिना और उसका पक्ष सुने बिना आरोपियों को अग्रिम जमानत दे दी थी।

हाईकोर्ट ने माना कि यह न केवल कानूनी प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन है, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के भी खिलाफ है।

बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए दी गई जमानत रद्द हो सकती है

सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि जब तक जमानत मिलने के बाद आरोपी उसके नियमों का उल्लंघन नहीं करता या किसी तरह का गलत आचरण नहीं करता, तब तक उसकी जमानत रद्द नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

जस्टिस सिंह ने स्पष्ट किया कि जमानत मिलने के बाद आरोपी के गलत आचरण के कारण उसे रद्द करना और शुरुआत से ही कानूनी रूप से गलत तरीके से दिए गए जमानत आदेश को रद्द करना दो अलग-अलग बातें हैं।

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी आरोपी को जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना, तथ्यों पर उचित विचार किए बिना या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करके जमानत दी गई है, तो ऐसा आदेश केवल इसी आधार पर रद्द किया जा सकता है।

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इसके लिए यह साबित करना जरूरी नहीं है कि आरोपी ने जमानत मिलने के बाद उसका गलत इस्तेमाल किया है।

हाईकोर्ट ने माना कि POCSO मामले में पीड़ित को सुनवाई का अवसर दिए बिना अग्रिम जमानत देना गंभीर कानूनी खामी है। ऐसा आदेश कानून की नजर में टिक नहीं सकता।

ट्रायल कोर्ट ने माना कि पीड़िता को नोटिस नहीं दिया गया

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विशेष POCSO अदालत से स्पष्टीकरण मांगा था कि आरोपियों को अग्रिम जमानत देने से पहले पीड़िता या शिकायतकर्ता को नोटिस दिया गया था या नहीं।

इसके जवाब में ट्रायल कोर्ट ने स्वीकार किया कि 17 जनवरी 2026 को अग्रिम जमानत का आदेश पारित करने से पहले कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया गया था।

हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने बताया कि शिकायतकर्ता को लंबित जमानत अर्जियों के बारे में टेलीफोन के जरिए जानकारी दी गई थी। इसके समर्थन में पुलिस का एक नोटिस भी पेश किया गया।

हाईकोर्ट ने पाया कि उस नोटिस पर न तो शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर थे और न ही पीड़िता के। दस्तावेज में यह भी स्पष्ट नहीं था कि फोन पर किस व्यक्ति से बात हुई थी और सूचना किस तरह दी गई थी।

कोर्ट ने कहा कि केवल इस तरह की जानकारी के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि पीड़ित पक्ष को सुनवाई का उचित अवसर दिया गया था।

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हाईकोर्ट ने यह भी माना कि पीड़िता को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं मिलने से वह आरोपों की गंभीरता, घटना से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों और अपनी सुरक्षा संबंधी आशंकाओं को अदालत के सामने नहीं रख सकी।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले का है, जहां 6 फरवरी 2023 को दो व्यक्तियों के खिलाफ एक नाबालिग से छेड़छाड़, चोट पहुंचाने, आपराधिक धमकी देने और POCSO एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

जांच के बाद पुलिस ने मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी थी। हालांकि, शिकायतकर्ता ने पुलिस की रिपोर्ट का विरोध किया।

फरवरी 2025 में विशेष POCSO अदालत ने शिकायतकर्ता की आपत्ति स्वीकार कर ली और मामले को शिकायत के आधार पर चलने वाला मुकदमा मानते हुए शिकायतकर्ता को आरोपों के समर्थन में साक्ष्य पेश करने का निर्देश दिया।

इसके बाद शिकायतकर्ता ने गवाह पेश किए। अदालत ने गवाहों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर विचार करने के बाद अक्टूबर 2025 में दोनों आरोपियों को मूल एफआईआर में लगाए गए आरोपों का सामना करने के लिए समन जारी किया।

समन जारी होने के बाद दोनों आरोपियों ने ट्रायल कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल की।

विशेष POCSO अदालत ने 17 जनवरी 2026 को दोनों आरोपियों को अग्रिम जमानत दे दी।

इस आदेश को पीड़िता के परिवार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। परिवार का कहना था कि अग्रिम जमानत देने से पहले पीड़िता या उसके अभिभावक को नोटिस तक नहीं दिया गया और उन्हें आपत्ति दर्ज कराने का मौका भी नहीं मिला।

हाईकोर्ट ने जमानत रद्द कर दोबारा सुनवाई का आदेश दिया

मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को दी गई अग्रिम जमानत रद्द कर दी।

जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने विशेष POCSO अदालत को निर्देश दिया कि वह अग्रिम जमानत अर्जियों को उनके मूल नंबर पर बहाल करे और पीड़िता या शिकायतकर्ता को विधिवत नोटिस जारी करे।

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अदालत को यह भी निर्देश दिया गया कि पीड़ित पक्ष को आपत्ति या जवाब दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाए।

इसके बाद पीड़िता और राज्य सरकार, दोनों का पक्ष सुनकर अग्रिम जमानत अर्जियों पर नए सिरे से फैसला किया जाए।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट अपना फैसला कानून और मामले के तथ्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से करेगा। उस पर पहले दिए गए जमानत आदेश या हाईकोर्ट के फैसले में की गई टिप्पणियों का कोई प्रभाव नहीं होना चाहिए।

आरोपियों को छह सप्ताह तक गिरफ्तारी से राहत

अग्रिम जमानत रद्द करने के बावजूद हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को छह सप्ताह की अंतरिम राहत दी है।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस अवधि में आरोपियों के खिलाफ कोई कठोर कार्रवाई नहीं की जाएगी।

साथ ही विशेष POCSO अदालत को निर्देश दिया गया कि वह इन छह सप्ताह के भीतर अग्रिम जमानत अर्जियों पर दोबारा सुनवाई करके फैसला करने का हर संभव प्रयास करे।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उत्तर प्रदेश की सभी विशेष POCSO अदालतों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि अग्रिम जमानत अर्जियों पर फैसला करते समय पीड़ित या उसके अभिभावक को प्रभावी सुनवाई का अवसर मिले। यदि पीड़ित निजी वकील नहीं कर सकता, तो उसे सरकारी खर्च पर अनुभवी कानूनी सहायता वकील उपलब्ध कराया जाए।

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