इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत कार्यरत रजिस्ट्रार या सब-रजिस्ट्रार का कार्यालय ‘कोर्ट’ (न्यायालय) की श्रेणी में नहीं आता है। हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 5 के प्रावधान, जो अपील में हुई देरी को माफ करने का अधिकार देते हैं, इन अधिकारियों के समक्ष होने वाली कार्यवाही पर लागू नहीं होते हैं।
यह आदेश जस्टिस इरशाद अली ने रिट-सी संख्या 1000572/2015 (मोहम्मद याकूब और अन्य बनाम जिला रजिस्ट्रार/ए.डी.एम. बहराइच व अन्य) की सुनवाई करते हुए दिया। हाईकोर्ट ने जिला रजिस्ट्रार द्वारा 15 दिसंबर 2014 को पारित उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके माध्यम से समय-सीमा बीत जाने के बाद दाखिल की गई अपील को स्वीकार करते हुए सेल डीड (बिक्री विलेख) के पंजीकरण का निर्देश दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद बहराइच जिले के ग्राम मेहरबान नगर स्थित प्लॉट नंबर 41 और 42 से संबंधित है, जो ‘वेदांत संस्था’ के नाम दर्ज थे। संस्था के अध्यक्ष होने का दावा करने वाले प्रवीण कुमार शर्मा ने प्लॉट नंबर 41 के संबंध में विपक्षी संख्या-2 के पक्ष में एक सेल डीड निष्पादित की थी।
जब इस दस्तावेज़ को 4 जनवरी 2011 को सब-रजिस्ट्रार नानपारा के समक्ष पंजीकरण के लिए प्रस्तुत किया गया, तो निष्पादक (executant) को बयान दर्ज करने के लिए बुलाया गया। बार-बार नोटिस के बावजूद प्रवीण कुमार शर्मा उपस्थित नहीं हुए, जिसके कारण सब-रजिस्ट्रार ने 3 फरवरी 2011 को पंजीकरण से इनकार कर दिया।
इसके बाद, विपक्षी संख्या-2 ने जिला रजिस्ट्रार के समक्ष अपील दायर की। चूंकि अपील समय-सीमा के बाद दाखिल की गई थी, इसलिए इसके साथ लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के तहत देरी माफी का आवेदन भी दिया गया। जिला रजिस्ट्रार ने 15 दिसंबर 2014 को देरी पर आपत्ति के बावजूद अपील स्वीकार कर ली और सब-रजिस्ट्रार को सेल डीड पंजीकृत करने का आदेश दिया। याचिकाकर्ताओं ने इस क्षेत्राधिकार विहीन आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एम.ए. खान ने तर्क दिया कि अपीलीय प्राधिकारी (रजिस्ट्रार) का आदेश पूरी तरह से क्षेत्राधिकार के बाहर था। उन्होंने दलील दी कि लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 केवल न्यायालयों पर लागू होती है, न कि लोक सेवकों या प्रशासनिक अधिकारियों पर। साथ ही, जिला रजिस्ट्रार ने देरी माफी के आवेदन पर अलग से कोई आदेश पारित किए बिना ही सीधे अपील पर फैसला सुना दिया।
दूसरी ओर, उत्तरदाताओं के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि अपीलीय आदेश के अनुपालन में सेल डीड पहले ही पंजीकृत हो चुकी है, इसलिए याचिकाकर्ताओं को इसकी रद्दीकरण के लिए सिविल कोर्ट जाना चाहिए। यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ताओं ने अपीलीय स्तर पर धारा 5 की वैधानिकता को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाई थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने मुख्य रूप से इस प्रश्न पर विचार किया कि क्या रजिस्ट्रार या सब-रजिस्ट्रार को लिमिटेशन एक्ट के उद्देश्य के लिए ‘कोर्ट’ माना जा सकता है। कोर्ट ने रघुवीर नारायण रस्तोगी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [2005(2) AWC 1814 (LB)] के मामले का हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने पाया कि रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 5 से 15 के तहत इन अधिकारियों की नियुक्ति सरकार द्वारा की जाती है और वे प्रशासनिक कार्य करते हैं। एक्ट की धारा 84 के तहत पंजीकरण अधिकारियों को ‘लोक सेवक’ (Public Servant) माना गया है, न कि ‘जज’ या ‘न्यायिक अधिकारी’।
जस्टिस इरशाद अली ने अपने निर्णय में उल्लेख किया:
“रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 84 के अनुसार, प्रत्येक पंजीकरण अधिकारी को लोक सेवक माना जाएगा, लेकिन जज या न्यायिक अधिकारी नहीं… न्यायिक अधिकारी या जज का पद धारण करने वाले व्यक्ति से केवल लोगों को न्याय प्रदान करने की अपेक्षा की जाती है। ऐसे अधिकारी के पास वे जिम्मेदारियां नहीं होती हैं जो सामान्य सरकारी कर्मचारियों द्वारा निभाई जाती हैं।”
लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के सीमित दायरे पर जोर देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 स्पष्ट रूप से निर्धारित अवधि के विस्तार की शक्ति केवल कोर्ट को प्रदान करती है, अन्य अधिकारियों को नहीं।”
हाईकोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि पंजीकरण के बाद मामला सिविल कोर्ट का है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पंजीकरण का आधार ही क्षेत्राधिकार विहीन आदेश है, तो वह टिक नहीं सकता।
हाईकोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि सब-रजिस्ट्रार या अपीलीय प्राधिकारी लोक सेवक के रूप में कार्य करते हैं, लेकिन वे न्यायालय के पीठासीन अधिकारी की शक्तियों का प्रयोग नहीं करते।
जजमेंट के अनुसार:
“रजिस्ट्रार, अपर रजिस्ट्रार या सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय को ‘कोर्ट’ नहीं माना जा सकता है। तदनुसार, रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत होने वाली कार्यवाही में लिमिटेशन एक्ट की धारा 5 के प्रावधान लागू नहीं होंगे।”
क्षेत्राधिकार के अभाव के आधार पर हाईकोर्ट ने जिला रजिस्ट्रार के 15 दिसंबर 2014 के आदेश और उसके बाद की गई सभी कार्रवाइयों को रद्द कर दिया।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: मोहम्मद याकूब और अन्य बनाम जिला रजिस्ट्रार/ए.डी.एम. बहराइच और 2 अन्य
- केस संख्या: रिट-सी संख्या – 1000572/2015
- पीठ: जस्टिस इरशाद अली
- निर्णय की तिथि: 10 मार्च, 2026

