पति अगर एकमात्र स्वामी है तो वह फ्लैट बेच सकता है; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी की बेदखली और 60,000 रुपये मासिक हर्जाने को सही ठहराया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पति किसी संपत्ति का एकमात्र स्वामी (Sole Owner) है, तो उसे उस संपत्ति को बेचने का पूर्ण अधिकार है, भले ही वैवाहिक विवाद लंबित हो। कोर्ट ने पत्नी द्वारा दायर दो प्रथम अपीलों को खारिज करते हुए निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें उसे नोएडा स्थित फ्लैट खाली करने और अवैध कब्जे के लिए हर्जाना (Mesne Profits) देने का निर्देश दिया गया था।

न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की पीठ ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि लाइसेंस समाप्त होने के बाद लाइसेंसधारी (Licensee) के खिलाफ अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) का वाद पोषणीय है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद नोएडा के एटीएस ग्रीन विलेज स्थित फ्लैट नंबर 1201 से जुड़ा है।

  1. मूल वाद संख्या 1199/2009: यह मुकदमा पति पुष्पेंद्र सिंह सिरोही और फ्लैट की खरीदार पूनम अग्रवाल ने पत्नी सोनू सिरोही के खिलाफ दायर किया था। इसमें पत्नी से फ्लैट खाली कराने और हर्जाने की मांग की गई थी। पति का कहना था कि 2006 में त्रिपक्षीय समझौते के जरिए वह इस फ्लैट का एकमात्र स्वामी बना था। उसने पत्नी को केवल किराया वसूलने का अधिकार (लाइसेंस) दिया था, जिसे 17 नवंबर 2009 को रद्द कर दिया गया। इसके बाद, उसने 25 मार्च 2011 को यह फ्लैट पूनम अग्रवाल को बेच दिया।
  2. मूल वाद संख्या 1187/2011: यह मुकदमा पत्नी सोनू सिरोही ने अपने पति, खरीदार और नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ दायर किया था। उसने दावा किया कि फ्लैट खरीदने में उसका ‘स्त्रीधन’ और संयुक्त फंड लगा था। उसने घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अपने अधिकारों का हवाला देते हुए बेदखली पर रोक लगाने और बिक्री विलेख (Sale Deed) को शून्य घोषित करने की मांग की थी।
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निचली अदालत (गौतम बुद्ध नगर) ने दोनों मुकदमों की एक साथ सुनवाई की और पत्नी के दावे को खारिज करते हुए उसे फ्लैट खाली करने का आदेश दिया। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की थी।

हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य तर्क

अपीलकर्ता (पत्नी) ने तर्क दिया कि:

  • विशिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act) की धारा 41(h) के तहत अनिवार्य निषेधाज्ञा का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि कब्जे के लिए वाद दायर किया जाना चाहिए था।
  • फ्लैट संयुक्त फंड से खरीदा गया था, इसलिए पति इसे अकेले नहीं बेच सकता था।
  • घरेलू हिंसा की कार्यवाही लंबित होने के दौरान किया गया संपत्ति का हस्तांतरण अवैध है।
  • 60,000 रुपये प्रति माह का हर्जाना बहुत अधिक और अनुचित है।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों का तर्क था कि पत्नी केवल एक लाइसेंसधारी थी और उसका लाइसेंस कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया था। चूंकि पति ने बैंक ऋण के माध्यम से संपत्ति खरीदी थी और वह एकमात्र मालिक था, इसलिए बिक्री वैध थी।

कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

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हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और सबूतों का विश्लेषण करते हुए निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:

1. अनिवार्य निषेधाज्ञा का वाद पोषणीय है: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (संत लाल जैन बनाम अवतार सिंह और भारत भूषण गुप्ता बनाम प्रताप नारायण वर्मा) का हवाला देते हुए कहा कि लाइसेंस समाप्त होने के बाद लाइसेंसधारी से कब्जा वापस लेने के लिए अनिवार्य निषेधाज्ञा का वाद दायर किया जा सकता है। यह धारा 41(h) द्वारा बाधित नहीं है।

2. स्वामित्व और टाइटल: कोर्ट ने निचली अदालत के निष्कर्ष को सही पाया कि पुष्पेंद्र सिंह सिरोही फ्लैट के विशेष स्वामी थे। रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों से यह साबित हुआ कि लीज डीड उनके नाम पर थी और उन्होंने एचएसबीसी बैंक से ऋण लिया था। कोर्ट ने नोट किया कि पत्नी अपने दावे (कि उसने भी पैसा लगाया है) को साबित करने के लिए जिरह (Cross-examination) के लिए उपस्थित नहीं हुई, इसलिए उसके हलफनामे पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

3. बिक्री विलेख की वैधता: कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि घरेलू हिंसा के मामले लंबित होने के कारण संपत्ति का हस्तांतरण अवैध था। कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत “साझा घर” (Shared Household) की अवधारणा एक ही घर तक सीमित है, जबकि रिकॉर्ड पर यह आया कि एक और फ्लैट (फ्लैट नंबर 1083) मौजूद था। खरीदार ने पूरी सावधानी (Due Diligence) बरतने के बाद संपत्ति खरीदी थी।

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कोर्ट ने कहा:

“चूंकि वादी संख्या 1 (पति) विवादित फ्लैट का एकमात्र स्वामी है और उसने इसे अपने स्वयं के धन से खरीदा था… इसलिए उसे वादी संख्या 2 के पक्ष में वैध बिक्री विलेख निष्पादित करने का पूर्ण अधिकार था।”

4. हर्जाना (Damages): कोर्ट ने 60,000 रुपये प्रति माह हर्जाना देने के निचली अदालत के आदेश को उचित माना। कोर्ट ने कहा कि इस फ्लैट से पहले भी इतनी ही राशि किराए के रूप में प्राप्त हो रही थी, इसलिए यह राशि अवैध कब्जे की अवधि के लिए मुआवजे के रूप में सही है।

निष्कर्ष

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अचल संपत्ति के स्वामित्व और कब्जे से संबंधित निचली अदालत के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस कारण नहीं है। कोर्ट ने दोनों अपीलों को खारिज कर दिया।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: सोनू सिरोही बनाम पुष्पेंद्र सिंह सिरोही और अन्य (First Appeal No. 317 of 2019 along with First Appeal No. 320 of 2019)
  • कोर्ट: इलाहाबाद हाईकोर्ट
  • जज: न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया

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