उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दायर 11 विशेष अपीलों को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने देरी के लिए प्रशासनिक सुस्ती और “लालफीताशाही” के तर्कों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इस फैसले के बाद लोक निर्माण विभाग (PWD) के बड़ी संख्या में जूनियर इंजीनियरों को पुरानी पेंशन योजना (OPS) सहित अन्य सेवा लाभ मिलने का रास्ता साफ हो गया है।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने इन अपीलों पर सुनवाई की। अदालत ने पाया कि सरकार 93 से 195 दिनों की देरी का कोई “पर्याप्त कारण” नहीं बता सकी। देरी की माफी अर्जी (Condonation of Delay) खारिज होने के साथ ही एकल पीठ का वह पिछला आदेश प्रभावी हो गया है, जिसमें PWD के जूनियर इंजीनियरों के नियमितीकरण की तिथि 2006 के बजाय 2001 तय की गई थी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने देरी के पीछे विभागीय औपचारिकताओं, फाइलों की आवाजाही, सार्वजनिक छुट्टियों और विधानसभा सत्र जैसे कारणों का हवाला दिया था। हालांकि, खंडपीठ इन दलीलों से सहमत नहीं हुई। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार के पास एक व्यवस्थित प्रशासनिक तंत्र है, इसलिए वह नियमित प्रक्रियात्मक देरी की आड़ नहीं ले सकती।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “केवल फाइलों की आवाजाही पर्याप्त कारण नहीं हो सकती।” जजों ने यह भी रेखांकित किया कि सरकार अपनी आंतरिक फाइलों की सुस्त रफ्तार का बहाना बनाकर कानूनी समय-सीमा (Limitation Period) का उल्लंघन नहीं कर सकती।
कोर्ट ने जवाबदेही पर जोर देते हुए कहा कि ऐसी देरी को माफ करना सरकारी विभागों में लापरवाही और उदासीनता को बढ़ावा देने जैसा होगा। इससे न्याय प्रणाली की निश्चितता प्रभावित होती है और अन्य वादियों पर भी इसका बुरा असर पड़ता है।
यह कानूनी विवाद एकल न्यायाधीश के 9 सितंबर, 2025 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें सरकार को निर्देश दिया गया था कि 1984 से 1989 के बीच दैनिक वेतन भोगी के रूप में नियुक्त जूनियर इंजीनियरों को 2001 से नियमित माना जाए। सरकार उन्हें 2006 से नियमित मान रही थी।
नियमितीकरण की तिथि पांच साल पीछे (2001) होने से ये इंजीनियर पुरानी पेंशन योजना (OPS) के दायरे में आ गए हैं। राज्य सरकार ने वित्तीय बोझ और अन्य सेवा लाभों के मद्देनजर इस आदेश को विशेष अपीलों के जरिए चुनौती दी थी।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि देरी माफी के आवेदनों पर विचार करते समय अदालत को मामले के गुण-दोष (Merits) को नहीं, बल्कि केवल देरी के कारणों की सत्यता को देखना होता है।
हाईकोर्ट के प्रमुख बिंदु:
- संसाधनों की उपलब्धता को देखते हुए सरकार को जवाबदेही के उच्च मानक का पालन करना चाहिए।
- प्रक्रियात्मक देरी को कानून की नजर में अपने आप “पर्याप्त कारण” नहीं माना जा सकता।
- न्याय प्रणाली की गरिमा बनाए रखने के लिए समय-सीमा का पालन करना अनिवार्य है।
देरी माफी की अर्जियां नामंजूर होने के कारण सरकार की सभी 11 विशेष अपीलें स्वतः ही खारिज हो गईं।

