तय हो चुके मुद्दे पर दोबारा आए कोर्ट, ड्राफ्टिंग में भी लापरवाही; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिवक्ता पर लगाया ₹1 लाख का जुर्माना

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वयं को अधिवक्ता बताने वाले एक याचिकाकर्ता द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए उस पर 1 लाख रुपये का भारी हर्जाना (Cost) लगाया है। कोर्ट ने याचिका की ड्राफ्टिंग को “बेहद सतही” (Cursory) और अव्यवस्थित पाते हुए कड़ी नाराजगी जाहिर की। साथ ही, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उठाया गया मुद्दा पहले ही एक डिवीजन बेंच द्वारा तय किया जा चुका है।

यह आदेश जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने अभिषेक मालवीय बनाम कमिश्नर (व्यक्तिगत नाम से) केंद्रीय विद्यालय संगठन व 2 अन्य के मामले में दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता अभिषेक मालवीय ने व्यक्तिगत रूप से (In Person) कोर्ट के समक्ष उपस्थित होकर खुद को अधिवक्ता बताया। उन्होंने केंद्रीय विद्यालय संगठन के कमिश्नर और अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ राहत की मांग करते हुए यह रिट याचिका दायर की थी।

हालांकि, जब कोर्ट ने याचिका का अवलोकन किया, तो उसमें कई प्रक्रियात्मक और ड्राफ्टिंग संबंधी खामियां पाई गईं। कोर्ट ने नोट किया कि इन त्रुटियों के बारे में पहले ही बताया गया था, लेकिन याचिकाकर्ता ने उन्हें ठीक नहीं किया।

ड्राफ्टिंग पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी

एकल जज ने याचिका की ड्राफ्टिंग में पेशेवर मानकों के अभाव पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि भले ही याचिकाकर्ता ने खुद को अधिवक्ता घोषित किया है, लेकिन यह रिट याचिका “एक आम आदमी (Layman) की तरह बेहद सतही तरीके से” ड्राफ्ट की गई है।

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ड्राफ्टिंग की लापरवाह शैली का उदाहरण देते हुए कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया:

“इस रिट याचिका में इस्तेमाल किए गए शब्द उचित प्रारूप (Format) में नहीं हैं, जैसे कि इसमें यह लिखा गया है कि ‘प्रार्थना यहां से शुरू होती है’ (Prayer starts from here)। पक्षकारों का विवरण (Array of parties) भी उचित नहीं है और इस त्रुटि को इंगित किए जाने के बावजूद सुधारा नहीं गया।”

मुद्दा पहले ही हो चुका था तय

तकनीकी खामियों के अलावा, कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर भी गौर किया और पाया कि याचिका में उठाया गया विषय पहले ही निर्णीत हो चुका है। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान याचिका में उठाया गया मुद्दा हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा पहले ही याचिकाकर्ता के खिलाफ तय किया जा चुका है।

कोर्ट ने 16 जनवरी, 2025 को रिट-ए संख्या 341 वर्ष 2025 (न्यूट्रल साइटेशन संख्या 2025:AHC:6813-DB) में पारित आदेश का हवाला दिया। चूंकि मामले का निपटारा पहले ही हो चुका था, जस्टिस शमशेरी ने कहा:

“इसलिए, मुझे मांगी गई राहत देने का कोई कारण नजर नहीं आता।”

फैसला

याचिका की “सतही” ड्राफ्टिंग और इस तथ्य को देखते हुए कि मुद्दा पहले ही तय हो चुका था, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया।

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कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 1,00,000 रुपये (एक लाख रुपये) का हर्जाना लगाया।

याचिका खारिज होने के बाद, व्यक्तिगत रूप से उपस्थित याचिकाकर्ता ने कोर्ट को आश्वासन दिया। फैसले में दर्ज किया गया है:

“याचिकाकर्ता ने व्यक्तिगत रूप से यह अंडरटेकिंग दी है कि वह आज दिन में ही उक्त राशि इस न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष जमा कर देगा और उसकी रसीद उपलब्ध कराएगा।”

कोर्ट ने रजिस्ट्रार (कम्प्लायंस) को अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया।

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केस का विवरण:

  • केस टाइटल: अभिषेक मालवीय बनाम कमिश्नर (व्यक्तिगत नाम से) केंद्रीय विद्यालय संगठन व 2 अन्य
  • केस नंबर: रिट – ए संख्या 19508 वर्ष 2025
  • कोरम: जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी
  • न्यूट्रल साइटेशन: 2026:AHC:2503

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