मुख्य मार्ग तक जाने के लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रास्ता रोके जाने के मामले में धारा 133 CrPC की अर्जी खारिज करने का आदेश रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के जस्टिस राजीव सिंह ने एक पुनरीक्षण अदालत (रिवीजनल कोर्ट) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत रास्ते में रुकावट डालने से जुड़े मामले में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 133 के तहत दाखिल अर्जी को खारिज करने का फैसला बरकरार रखा गया था। कोर्ट द्वारा नियुक्त एडवोकेट कमिश्नर के स्थलीय निरीक्षण (स्पॉट इंस्पेक्शन) और रिपोर्ट के आधार पर हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के पास मुख्य मार्ग तक पहुंचने के लिए इस विवादित रास्ते के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने इस अर्जी को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि यह राहत सक्षम अदालत में पहले से लंबित दीवानी मुकदमे (सिविल सूट) के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत इंद्र पाल तिवारी द्वारा दाखिल अर्जी से संबंधित है। इसमें लखनऊ के अपर सत्र न्यायाधीश (कोर्ट संख्या 9) द्वारा क्रिमिनल रिवीजन संख्या 93/2026 (मुकेश बनाम यूपी राज्य व अन्य) में 8 जून 2026 को पारित आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी।

आवेदक इंद्र पाल तिवारी ने निचली अदालत में CrPC की धारा 133 के तहत अर्जी दाखिल कर आरोप लगाया था कि उनके पास मुख्य सड़क तक पहुंचने का केवल यही एक रास्ता है, जिसे विपक्षी मुकेश तिवारी द्वारा बाधित किया जा रहा है। मामले में निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) के लिए सिविल सूट भी दायर किया गया था, लेकिन मजिस्ट्रेट अदालत ने CrPC की धारा 133 की अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद दाखिल की गई आपराधिक पुनरीक्षण याचिका भी अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा खारिज कर दी गई। इन आदेशों से क्षुब्ध होकर आवेदक ने BNSS की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

हाईकोर्ट के समक्ष आवेदक के वकील ने दलील दी कि मुख्य मार्ग तक जाने के लिए आवेदक के पास केवल एक ही रास्ता उपलब्ध है, जो लंबे समय से उपयोग में लाया जा रहा है और यह विपक्षी संख्या 2 के घर के ठीक सामने स्थित है। उन्होंने कहा कि विपक्षी संख्या 2 ने इस रास्ते पर रुकावट पैदा कर दी है, जिससे आवेदक को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और आने-जाने का बुनियादी अधिकार प्रभावित हुआ है।

दूसरी ओर, विपक्षी संख्या 2 के वकील ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आवेदक के पास आने-जाने (आवागमन) के लिए अन्य वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध हैं। इसलिए आवेदक उनकी निजी भूमि को रास्ते के रूप में इस्तेमाल करने का दावा नहीं कर सकता।

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एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट और स्थलीय निरीक्षण

जमीनी हकीकत का पता लगाने के लिए कोर्ट ने दोनों पक्षों की सहमति से पहले एडवोकेट कमिश्नर राकेश कुमार सिंह को मौके का निरीक्षण करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कमिश्नर को यह जांचने का काम सौंपा था कि क्या आवेदक के आवागमन के लिए कोई अन्य सार्वजनिक रास्ता उपलब्ध है या विपक्षी संख्या 2 के घर के सामने वाला रास्ता ही एकमात्र जरिया है।

निर्देशों के अनुपालन में एडवोकेट कमिश्नर ने 16 अगस्त 2026 को मौके पर जाकर स्थलीय निरीक्षण किया और एक नजरी नक्शा तैयार कर अपनी रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में दर्शाया गया कि आवेदक का मकान विपक्षी संख्या 2 के मकान से सटा हुआ है। दक्षिण दिशा में महेंद्र तिवारी और अन्य के खंडहरनुमा मकान व पेड़ हैं, जबकि उत्तर में अन्य मकान हैं और कोई खाली जगह नहीं बची है। मकानों के पश्चिम में खाली आबादी भूमि है, जिसे आवेदक, विपक्षी संख्या 2, बैजनाथ, महेंद्र तिवारी और देवेश तिवारी रास्ते के तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं।

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एडवोकेट कमिश्नर ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दर्ज किया:

“स्थलीय निरीक्षण अनुसार याची (इंद्र पाल तिवारी) के पास विपक्षी संख्या 2 (मुकेश तिवारी) के घर के सामने से होकर जाने के अलावा अन्य और कोई दूसरा रास्ता / मार्ग मौके पर नहीं है।”

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि स्थानीय ग्रामीणों ने नाम न छापने की शर्त पर पुष्टि की कि दोनों पक्ष कई वर्षों से आने-जाने के लिए इसी रास्ते का उपयोग करते आ रहे हैं। संलग्न नजरी नक्शे के अवलोकन से कोर्ट ने पाया कि विपक्षी के आवास के सामने एक सरकारी हैंडपंप स्थित है और आवेदक, निजी विपक्षी तथा अन्य पड़ोसियों के घरों के सामने साझी सहन भूमि मौजूद है।

कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

पक्षकारों की दलीलों और एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट में सामने आए अकाट्य तथ्यों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

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“पक्षों के विद्वान वकीलों की दलीलों और एडवोकेट कमिश्नर की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता के पास मुख्य मार्ग तक पहुंचने के लिए कोई अन्य रास्ता नहीं है। अतः सक्षम अदालत के समक्ष लंबित मुकदमे के निर्णय के अधीन रहते हुए आक्षेपित आदेश को रद्द कर याचिका स्वीकार की जाती है।”

इन टिप्पणियों के साथ जस्टिस राजीव सिंह ने अर्जी स्वीकार करते हुए 8 जून 2026 के पुनरीक्षण अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया और स्पष्ट किया कि यह राहत सक्षम अदालत में विचाराधीन सिविल सूट के अंतिम फैसले के अधीन रहेगी।

वकीलों की उपस्थिति

  • आवेदक की ओर से: पीयूष पाठक, प्रणव मिश्रा
  • विपक्षी की ओर से: सरकारी वकील (जी.ए.), मुकुट बिहारी त्रिपाठी, विशाल प्रदीप, राम त्रिपाठी, सुश्री ललिता

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: इंद्र पाल तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रमुख सचिव गृह, लखनऊ व अन्य 

वाद संख्या: आवेदन अंतर्गत धारा 528 बीएनएसएस संख्या 2605/2026 

पीठ: जस्टिस राजीव सिंह 

निर्णय की तिथि: 9 अक्टूबर 2026

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