मद्रास हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 326 के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उसकी तीन साल की कैद की सजा में संशोधन किया है। जस्टिस शमीम अहमद की पीठ ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (क्रिमिनल रिवीजन केस) को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दोषी को जेल भेजने के बजाय प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 4 के तहत अच्छे आचरण की परिवीक्षा (प्रोबेशन) पर रिहा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने सुधारात्मक न्यायशास्त्र पर जोर देते हुए यह माना कि 12 साल तक कानूनी कार्यवाही का सामना करने वाले और बाद में किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल न रहने वाले पहली बार के अपराधी को इस कानून का लाभ दिया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता वी. जयबालन के खिलाफ यह मामला 13 जनवरी 2014 को हुई एक घटना से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता मुस्तफा अली रेलवे में सहकर्मी थे। दिसंबर 2013 के दौरान मुस्तफा अली ने शिकायत दर्ज कराई थी कि जयबालन ठीक से काम नहीं कर रहा है। 13 जनवरी 2014 को सुबह करीब 11:30 बजे जब मुस्तफा अली एसआर शॉप के पास बैठकर खाना खा रहे थे, तभी जयबालन वहां पहुंचा, उनके साथ गाली-गलौज की और लोहे की रॉड से उनके सिर पर हमला कर दिया। इस हमले में मुस्तफा अली के सिर पर दो गंभीर चोटें आईं और उन्हें इलाज के लिए रेलवे अस्पताल में भर्ती कराया गया।
अस्पताल से सूचना मिलने के बाद के-7 आई.सी.एफ. पुलिस स्टेशन के सब-इंस्पेक्टर ने घायल का बयान दर्ज कर अपराध संख्या 34/2014 के तहत आईपीसी की धारा 294(बी), 324 और 506(ii) में प्राथमिकी दर्ज की। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने धारा 294(बी), 326, 341 और 506(ii) के तहत चार्जशीट दाखिल की।
एग्मोर, चेन्नई के पांचवें मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत (सीसी संख्या 2708/2015) में चले मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने पांच गवाहों (पीडब्लू.1 से पीडब्लू.5) से पूछताछ की और दस्तावेज (प्रदर्श पी1 से पी10) व भौतिक साक्ष्य एम.ओ.1 पेश किए। दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 313 के तहत दर्ज बयान में आरोपी ने सभी आरोपों से इनकार किया और खुद को झूठा फंसाए जाने की बात कही। बचाव पक्ष की ओर से कोई गवाह या साक्ष्य पेश नहीं किया गया।
1 अगस्त 2019 को ट्रायल कोर्ट ने जयबालन को आईपीसी की धारा 326 के तहत दोषी ठहराते हुए तीन साल के कारावास और 500 रुपये के जुर्माने (जुर्माना न देने पर एक महीने के साधारण कारावास) की सजा सुनाई, जबकि धारा 341, 294(बी) और 506(ii) के आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद 21वें एडिशनल सेशंस जज, सिटी सिविल कोर्ट, चेन्नई ने 28 फरवरी 2022 को अपील खारिज करते हुए दोषसिद्धि और सजा की पुष्टि कर दी। इसके खिलाफ जयबालन ने हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दायर की।
हाईकोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील एच. मरुथिराज ने अदालत में स्पष्ट किया कि वह मामले के गुण-दोष (मेरिट्स) पर बहस नहीं करना चाहते। उन्होंने दलील दी कि यह घटना 12 साल पहले हुई थी और याचिकाकर्ता पहली बार का अपराधी है, जिसका न तो कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड है और न ही इन वर्षों में उसके खिलाफ कोई नया मामला दर्ज हुआ है। उन्होंने कहा कि मुकदमे में हुए लंबे विलंब ने याचिकाकर्ता के त्वरित सुनवाई के अधिकार को प्रभावित किया है। सुप्रीम कोर्ट के मोहम्मद हाशिम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने अनुरोध किया कि कोर्ट अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल कर याचिकाकर्ता को प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 4 का लाभ प्रदान करे।
वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार के अधिवक्ता एम. दिनेश ने कहा कि निचली अदालतों के फैसलों में कोई प्रक्रियात्मक त्रुटि या अवैधता नहीं है और रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर सजा पूरी तरह उचित थी। हालांकि, उन्होंने यह भी सहमति जताई कि 1958 के कानून की धारा 4 के तहत तय शर्तों के अधीन याचिकाकर्ता को प्रोबेशन का लाभ दिया जा सकता है।
कोर्ट का विश्लेषण और पूर्व निर्णयों के संदर्भ
प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट की धारा 4 के दायरे का विश्लेषण करते हुए जस्टिस शमीम अहमद ने रेखांकित किया कि यह कानून मृत्युदंड या उम्रकैद की सजा से मुक्त अपराधों में अदालत को यह अधिकार देता है कि वह अपराध की प्रकृति, मामले की परिस्थितियों और अपराधी के चरित्र को ध्यान में रखकर उसे प्रोबेशन पर रिहा कर सके। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 4 अपराधियों की श्रेणियों में कोई भेद नहीं करती।
कोर्ट ने रतन लाल बनाम पंजाब राज्य (एआईआर 1965 एससी 444) के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
“यह अधिनियम दंडशास्त्र के क्षेत्र में आधुनिक उदारवादी सुधारवादी सोच की दिशा में एक मील का पत्थर है। यह इस सिद्धांत की मान्यता का परिणाम है कि आपराधिक कानून का उद्देश्य अपराधी को सजा देने से अधिक उसमें सुधार लाना है। मोटे तौर पर यह कानून 21 वर्ष से कम और उससे अधिक आयु के अपराधियों के बीच, तथा मृत्युदंड या उम्रकैद से दंडनीय अपराध करने वालों और कम सजा वाले अपराध करने वालों के बीच अंतर करता है। जहां 21 वर्ष से अधिक आयु के अपराधियों के मामले में अदालत को अधिनियम के प्रावधानों के तहत चेतावनी देकर या अच्छे आचरण की परिवीक्षा पर रिहा करने का पूर्ण विवेकाधिकार दिया गया है, वहीं 21 वर्ष से कम उम्र के अपराधियों के संबंध में अदालत पर यह बंदिश लगाई गई है कि वह उन्हें तब तक जेल की सजा न दे जब तक कि मामले की परिस्थितियों, अपराध की प्रकृति और अपराधी के चरित्र को देखते हुए उन्हें धारा 3 और 4 के तहत राहत देना अवांछनीय न लगे।”
अदालतों के संवेदनशील दृष्टिकोण पर जोर देने के लिए कोर्ट ने वेद प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य (एआईआर 1981 एससी 643) के फैसले को उद्धृत किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी:
“हमें इस बात पर बल देना चाहिए कि किसी अभियुक्त को सजा देना विवेक का एक बेहद संवेदनशील अभ्यास है, न कि किसी पूर्वाग्रह या अनुमान पर आधारित कोई नियमित या यांत्रिक प्रक्रिया। ट्रायल कोर्ट को ऐसे मामले में उचित सजा तय करने के लिए आवश्यक सामग्री एकत्र करनी चाहिए थी। सामाजिक पृष्ठभूमि और अपराध करने वाले व्यक्ति से जुड़े व्यक्तिगत पहलू बहुत प्रासंगिक होते हैं, हालांकि व्यवहार में आपराधिक अदालतें अपराधी के सामाजिक परिवेश या व्यक्तिगत परिस्थितियों पर शायद ही ध्यान देती हैं… वास्तव में बार के सदस्य भी इन कानूनी प्रावधानों पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते हैं, जिनका संबंध अपराधी के साथ इस तरह पेश आने से है कि वह एक गैर-अपराधी बन जाए। हम इस बात पर बल इसलिए दे रहे हैं क्योंकि सजा में सुधार से जुड़े ऐसे कानूनों को ‘गौण कानून’ मानकर कम महत्व दिया जाता रहा है। यह पूरी तरह से गलत नजरिया है और यदि बार सहयोग न भी करे, तो भी बेंच को प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट जैसे अधिनियमों में निहित सजा के मानवीय मिशन को पूरा करना चाहिए।”
इसके अलावा इलाहाबाद हाईकोर्ट के सुभाष चंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2015) के फैसले का जिक्र किया गया, जिसमें न्यायिक अधिकारियों द्वारा इस कानून की अनदेखी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया था:
“ऐसा प्रतीत होता है कि इस कल्याणकारी कानून को भुला दिया गया है और यहां तक कि न्यायाधीश भी कानून के इस प्रावधान को व्यावहारिक रूप से भूल चुके हैं। अतः इस मामले के निस्तारण से पूर्व इस न्यायालय को लगता है कि यदि ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालतों के लिए सतर्कता का संदेश न लिखा जाए, तो यह अपने कर्तव्यों के निर्वहन में विफलता होगी। इस न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया जाता है कि वे इस फैसले की प्रति उत्तर प्रदेश के सभी जिला न्यायाधीशों को भेजें, जो बदले में इसे अपने अधीन कार्यरत सभी न्यायिक अधिकारियों में वितरित कराएंगे और इसका कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करेंगे…”
हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य बनाम जगमोहन सिंह कुलदीप सिंह आनंद (2004) 7 एससीसी 659 का भी उल्लेख किया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने कहा था:
“अभियुक्त की ओर से की गई प्रार्थना उचित प्रतीत होती है। यह घटना दस वर्ष से भी अधिक पुरानी है। विवाद पड़ोसियों के बीच नाली के मामूली विवाद को लेकर था। घटना गुस्से के आवेश में हुई थी। सभी पक्ष शिक्षित हैं और दूर के रिश्तेदार भी हैं। यह मामला ऐसा नहीं है कि अभियुक्त को जेल की सजा भुगतने का निर्देश दिया जाए। हमारी राय में यह एक उपयुक्त मामला है जिसमें अभियुक्त को अच्छे आचरण के लिए एक वर्ष का बांड भरने का निर्देश देकर प्रोबेशन पर रिहा किया जाना चाहिए।”
अपील या रिवीजन के स्तर पर विवेकाधिकार के उपयोग पर सीताराम पासवान बनाम बिहार राज्य (एआईआर 2005 एससी 3534) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“विवेकाधिकार का प्रयोग करने के लिए अदालत को मामले की परिस्थितियों, अपराध की प्रकृति और अपराधी के चरित्र पर विचार करना होता है। अपराध की प्रकृति को देखते हुए अदालत को अपराध की गंभीरता और पीड़ित पर उसके प्रभाव का वास्तविक मूल्यांकन करना चाहिए… यह शक्ति अदालतों द्वारा व्यक्ति को दोषी ठहराते समय प्रयोग की जा सकती है, और यदि अदालत को लगता है कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए अभियुक्त को यह लाभ दिया जाना चाहिए, तो इस शक्ति का प्रयोग अपीलीय या पुनरीक्षण (रिवीजन) स्तर पर भी किया जा सकता है…”
इसके अलावा कोर्ट ने मोहम्मद हाशिम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (एआईआर 2017 एससी 660) के जरिए यह भी स्पष्ट किया कि गंभीर मामलों में अपवाद भी तय किए गए हैं, जैसे श्रीमती देवकी बनाम हरियाणा राज्य (नाबालिग लड़की का अपहरण और यौन उत्पीड़न) तथा महाराष्ट्र राज्य बनाम नटवर लाल दामोदर दास सोनी (सोने की तस्करी), जहां सुप्रीम कोर्ट ने प्रोबेशन का लाभ देने से इनकार कर दिया था। इसके विपरीत, जगत पाल सिंह बनाम हरियाणा राज्य (आईपीसी की धारा 323, 452, 506) और इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा वीरेंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (खाद्य अपमिश्रण निवारण कानून) के मामलों में दी गई प्रोबेशन की राहत का भी उदाहरण दिया गया।
हाईकोर्ट का निर्णय
उपरोक्त सभी कानूनी सिद्धांतों और नजीरों को वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि घटना वर्ष 2014 में हुई थी और याचिकाकर्ता पिछले 12 वर्षों से इस कानूनी प्रक्रिया को झेल रहा है। इसके अलावा उसका कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं रहा है और न ही बाद के वर्षों में कोई आपराधिक गतिविधि सामने आई है।
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने क्रिमिनल रिवीजन केस को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:
- ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई और अपीलीय अदालत द्वारा पुष्ट की गई आईपीसी की धारा 326 के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।
- कारावास की सजा में संशोधन करते हुए याचिकाकर्ता को जेल भेजने के बजाय प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 4 का लाभ दिया गया। याचिकाकर्ता को आदेश की तारीख से तीन महीने के भीतर संबंधित जिला प्रोबेशन अधिकारी के समक्ष 20,000 रुपये के दो मुचलके और एक व्यक्तिगत बांड दाखिल करने तथा छह महीने की अवधि के लिए शांति बनाए रखने, अच्छा आचरण प्रदर्शित करने और कोई अपराध न करने का हलफनामा देने का निर्देश दिया गया।
- यह स्पष्ट किया गया कि यदि याचिकाकर्ता द्वारा किसी भी शर्त का उल्लंघन किया जाता है, तो उसे तुरंत हिरासत में ले लिया जाएगा और निचली अदालतों द्वारा दी गई वास्तविक कारावास की सजा भुगतनी होगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: वी. जयबालन बनाम राज्य, द्वारा पुलिस इंस्पेक्टर, के.7.आई.सी.एफ. पुलिस स्टेशन
वाद संख्या: क्रिमिनल आरसी संख्या 585/2022
पीठ: जस्टिस शमीम अहमद
निर्णय की तिथि: 06-10-2026

