इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ट्रांसपोर्ट कंपनी द्वारा एक निजी इकाई (प्राइवेट कंपनी) से बकाया वसूली के लिए दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता पर 5,000 रुपये का दंडात्मक हर्जाना (Exemplary Cost) भी लगाया है। कोर्ट ने निजी कंपनियों के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत ऐसी याचिकाएं दायर करने पर कड़ी नाराजगी जताई और इसे कोर्ट के कीमती समय की बर्बादी बताया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला यूनियन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन द्वारा दायर रिट-सी संख्या 280 वर्ष 2026 के माध्यम से हाईकोर्ट के समक्ष आया था। याचिकाकर्ता, जो एक ट्रांसपोर्ट कंपनी है, ने प्रतिवादी संख्या 2 से कुछ बकाए का दावा करते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
कोर्ट के आदेश में यह नोट किया गया कि प्रतिवादी संख्या 2 एक निजी कंपनी है, जो याचिका के शीर्षक में भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। इसके बावजूद, भारत संघ (Union of India) को प्रतिवादी संख्या 1 के रूप में पक्षकार बनाया गया था, जबकि विवाद में उनकी कोई भूमिका नहीं थी।
दलीलें और कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील श्री अरुणेंद्र कुमार शुक्ला और श्री राम कृष्ण दुबे ने इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मांगी गई राहत पूरी तरह से एक निजी कंपनी के खिलाफ थी।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा: “इस बात पर भी कोई विवाद नहीं है कि प्रतिवादी संख्या 1 (भारत संघ) का याचिकाकर्ता या प्रतिवादी संख्या 2 के दावे से कोई लेना-देना नहीं है।”
जब कोर्ट ने याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर अपनी नाराजगी व्यक्त की, तो याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी।
कोर्ट का विश्लेषण
खंडपीठ ने इस प्रकार की याचिका दायर करने को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग निजी संस्थाओं से वसूली के दावों के लिए नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यह कोई पहला मामला नहीं है, बल्कि ऐसी तुच्छ मुकदमों की एक श्रृंखला का हिस्सा है जो न्यायिक दक्षता में बाधा डालती है।
अपने आदेश में, पीठ ने कहा:
“यह कोर्ट महसूस करती है कि इस कोर्ट के समक्ष ऐसी याचिकाएं दायर करने से रोकने के लिए दंडात्मक हर्जाना लगाया जाना चाहिए। यह पहला मामला नहीं है, इस कोर्ट ने ऐसे कई मामले देखे हैं, जहां संविधान का अनुच्छेद 226 लागू नहीं होता है, फिर भी वे दायर किए जाते हैं और इस कोर्ट का कीमती समय बर्बाद करते हैं, जिससे कोर्ट उन मामलों पर विचार करने से वंचित रह जाती है जिन पर वास्तव में अनुच्छेद 226 के तहत विचार करने की आवश्यकता है।”
निर्णय
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने रिट क्षेत्राधिकार के भविष्य में दुरुपयोग को रोकने के लिए याचिकाकर्ता पर हर्जाना लगाते हुए याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने आदेश दिया: “परिस्थितियों को देखते हुए, यह मामला याचिकाकर्ता पर 5,000 रुपये का हर्जाना लगाकर खारिज किया जाता है, जिसे हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति (High Court Legal Services Committee) के खाते में जमा किया जाएगा।”
केस का विवरण:
- वाद शीर्षक: यूनियन ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन बनाम भारत संघ और अन्य
- वाद संख्या: WRIT-C No. 280 of 2026
- कोरम : न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन
- याचिकाकर्ता के वकील: अरुणेंद्र कुमार शुक्ला, राम कृष्ण दुबे
- प्रतिवादियों के वकील: ए.एस.जी.आई., प्रांजल मेहरोत्रा

