सरकारी वकीलों के सम्मान और गरिमा को रेखांकित करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने आजमगढ़ के एसएसपी के पूर्व पीआरओ को शाम 5 बजे तक न्यायिक हिरासत (कोर्ट कस्टडी) में रखने का आदेश दिया। अदालत ने यह सख्त कदम एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट (एजीए) के साथ फोन पर हुए दुर्व्यवहार को लेकर उठाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायिक आदेशों से अवगत करा रहे राज्य के विधि अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार अदालत की अवमानना के दायरे में आता है। इसके साथ ही कोर्ट ने डीजीपी उत्तर प्रदेश को पूरे प्रदेश में इस संबंध में परिपत्र (सर्कुलर) जारी करने का निर्देश दिया। इसी कार्यवाही के दौरान अदालत ने एक युवती की आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो फर्जी फेसबुक आईडी बनाकर वायरल करने के आरोपी की जमानत याचिका भी खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि और पुलिस आचरण की न्यायिक समीक्षा
यह मामला आजमगढ़ जिले के महाराजगंज थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 64(1) तथा आईटी एक्ट की धारा 66ई और 67ए के तहत दर्ज केस क्राइम संख्या 373/2024 से संबंधित है, जिसमें आरोपी ने विचारण के दौरान रिहाई के लिए हाईकोर्ट में जमानत अर्जी दाखिल की थी।
सुनवाई के दौरान 29.09.2026 के पूर्व आदेश के अनुपालन को लेकर सवाल उठे। इस पर आजमगढ़ के एसएसपी डॉ. अनिल कुमार-द्वितीय अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश हुए और जांच अधिकारी (आईओ) इंस्पेक्टर विनय कुमार मिश्रा के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) के निष्पादन के संबंध में एक अनुपालन हलफनामा प्रस्तुत किया। हलफनामे में बताया गया कि एजीए अनुराग पांडेय के 07.09.2026 के पत्र के बाद इसे तुरंत 08.09.2026 को रिट सेल भेजा गया, जो उसी दिन शाम 18:43 बजे महाराजगंज थाने पहुंचा और जीडी में दर्ज हुआ। हालांकि, सब-इंस्पेक्टर सुभाष सिंह ने इस पत्र को अपने पास रोके रखा और 16.09.2026 के अदालती आदेश की जानकारी मिलने के बाद 18.09.2026 को थाना प्रभारी को भेजा। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया कि थाना प्रभारी ने भी आदेश के पालन में लापरवाही बरती, जिसके चलते दोनों पुलिसकर्मियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
एसएसपी ने आईओ के खिलाफ एनबीडब्ल्यू की व्यक्तिगत रूप से तामील न कराने पर अदालत से क्षमा मांगी। उनका मानना था कि केवल आईओ की उपस्थिति सुनिश्चित कर देना ही आदेश के अनुपालन के लिए पर्याप्त है। इस पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए अदालत ने टिप्पणी की:
“यद्यपि, यह सही कानूनी स्थिति नहीं है। सही कानूनी स्थिति यह है कि जब भी किसी पुलिस अधिकारी को हाईकोर्ट द्वारा जारी एनबीडब्ल्यू निष्पादित करने के लिए मिलता है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से उस व्यक्ति की गिरफ्तारी सुनिश्चित करनी चाहिए और उसे हाईकोर्ट के समक्ष पेश करना चाहिए, क्योंकि हाईकोर्ट द्वारा जारी एनबीडब्ल्यू में जिला अदालत जमानत दे सकती है।”
कोर्ट ने एसएसपी के बेदाग सेवा रिकॉर्ड और उनके उस मानवीय कदम की सराहना की, जिसमें उन्होंने एक मुठभेड़ में मारे गए अपराधी (जिसने अपनी पत्नी और एक बच्चे की हत्या कर दी थी) की दो नाबालिग बेटियों को गोद लिया था। इस मानवीय आचरण और पूर्व रिकॉर्ड को देखते हुए अदालत ने एसएसपी के खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी और भविष्य में वारंट तामील कराने में अधिक सतर्क रहने की अपेक्षा की।
सरकारी वकील से बदसलूकी पर कस्टडी का आदेश
एसएसपी के पूर्व पीआरओ राजेश कुमार सिंह के आचरण पर विचार करते हुए अदालत ने पाया कि जब एजीए अनुराग पांडेय ने आदेश के अनुपालन के लिए फोन किया था, तब पीआरओ ने उनसे बदसलूकी की थी। अदालत ने संज्ञान लिया कि एसएसपी ने मामले की जानकारी मिलते ही पीआरओ को पद से हटा दिया था और कारण बताओ नोटिस जारी किया था, जो सराहनीय कदम था।
सरकारी वकीलों की भूमिका पर बल देते हुए अदालत ने कहा:
“इस न्यायालय का मानना है कि विद्वान एजीए अदालत के अधिकारी होते हैं। जब भी वे किसी अधिकारी को इस न्यायालय के आदेश के अनुपालन की जानकारी देते हैं, तो वे अदालत के आदेश के अनुपालन में ही अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे होते हैं। राज्य के शीर्षस्थ अधिकारी सहित किसी भी अधिकारी द्वारा उनके साथ दुर्व्यवहार करना अवमानना की श्रेणी में आएगा।”
अदालत ने आगे निर्देश दिया:
“इसलिए यह न्यायालय उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज करने के बजाय निर्देश देता है कि उन्हें हिरासत में लिया जाए और वह शाम 5 बजे तक अदालत की हिरासत में रहेंगे, जिसके बाद उन्हें रिहा कर दिया जाएगा।”
हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), उत्तर प्रदेश, लखनऊ को निर्देश दिया कि वे सभी पुलिस अधिकारियों को सर्कुलर जारी करें कि हाईकोर्ट के किसी भी राज्य विधि अधिकारी द्वारा न्यायिक आदेश की सूचना दिए जाने पर उनके साथ किया गया कोई भी दुर्व्यवहार अदालत की अवमानना माना जाएगा और उससे कानून के अनुसार सख्ती से निपटा जाएगा।
जमानत अर्जी पर दोनों पक्षों की दलीलें
जमानत के मुख्य आधार पर आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) शादी का रिश्ता तय होने और बाद में टूटने से उपजी रंजिश का परिणाम है। बचाव पक्ष का कहना था कि आवेदक पर सगाई के दौरान आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरें बनाने तथा 2 लाख रुपये की मांग करने का झूठा आरोप लगाया गया है। जिस “राकेश यादव” नाम की फेसबुक आईडी से तस्वीरें अपलोड करने का आरोप है, वह आवेदक की नहीं है। वकील ने दलील दी कि आवेदक का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, वह 01.03.2025 से जेल में है और रिहा होने पर वह गवाहों को प्रभावित नहीं करेगा तथा जांच व मुकदमे में पूरा सहयोग करेगा।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश विद्वान एजीए ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने पेनड्राइव और साइबर सेल की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि आरोपी ने 08.09.2024 को खुद ‘राकेश यादव’ के नाम से फर्जी फेसबुक आईडी बनाई थी और उसी से पीड़िता की आपत्तिजनक तस्वीरें व वीडियो अपलोड किए थे।
अदालत का निष्कर्ष और निर्णय
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और साइबर सेल की रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“पक्षकारों के विद्वान वकीलों की दलीलों पर विचार करने और साइबर सेल की रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए यह स्पष्ट है कि आवेदक ने 08.09.2024 को राकेश यादव नाम से फर्जी फेसबुक आईडी बनाने के बाद पीड़िता के आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरें फेसबुक पर अपलोड की थीं। इसलिए यह न्यायालय इस स्तर पर आवेदक को जमानत पर रिहा करने का इच्छुक नहीं है।”
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने जमानत अर्जी खारिज कर दी। अदालत ने रजिस्ट्रार (कंप्लायंस) को आदेश की प्रति डीजीपी, उत्तर प्रदेश को आवश्यक अनुपालन हेतु भेजने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सचिन यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल मिस. बेल एप्लीकेशन संख्या 33570 / 2025
पीठ: जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल
निर्णय की तिथि: 12 अक्टूबर 2026

