बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक हिंदू दंपति पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव डालने के आरोप में चार लोगों के खिलाफ दर्ज FIR और चार्जशीट रद्द कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति पर धर्म परिवर्तन के लिए जोर डालने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि उसने किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत किया है।
हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के जस्टिस एम. डब्ल्यू. चंदवानी ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों से अधिक से अधिक यही सामने आता है कि वे अपने धर्म का प्रचार कर रहे थे। इससे यह साबित नहीं होता कि उनका उद्देश्य किसी दूसरे धर्म या उसकी मान्यताओं का अपमान करना था।
कोर्ट ने 6 अक्टूबर के अपने आदेश में अमरावती निवासी जोसेफ खुदावंत, उनके बेटे विक्टर खुदावंत, बहू एल्विना खुदावंत और सामाजिक कार्यकर्ता अनंत मानकर के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी।
धर्म परिवर्तन के बदले आर्थिक मदद देने का आरोप
मामले की शुरुआत एक शिकायत से हुई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि चारों व्यक्ति शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी पर हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बना रहे थे।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपियों ने दंपति को धर्म परिवर्तन करने पर हर महीने आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव रखा था। इसके अलावा उन्होंने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने और परिवार के लिए मकान बनवाने का भी आश्वासन दिया था।
इन आरोपों के आधार पर जनवरी में अमरावती पुलिस ने चारों के खिलाफ FIR दर्ज की थी। उन पर किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से आहत करने तथा उसके धर्म या धार्मिक मान्यताओं का अपमान करने का आरोप लगाया गया था।
पुलिस ने मामले में चार्जशीट भी दाखिल कर दी थी। इसके बाद चारों आरोपियों ने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए FIR और चार्जशीट रद्द करने की मांग की।
अपने धर्म का प्रचार करना दूसरे धर्म का अपमान नहीं
हाईकोर्ट में आरोपियों ने दलील दी कि उन्होंने किसी धर्म का अपमान नहीं किया और न ही उनका इरादा किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का था।
मामले पर विचार करते हुए जस्टिस चंदवानी ने पाया कि आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों में धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से आहत करने का आवश्यक तत्व मौजूद नहीं था।
कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को अपना धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करना या उस पर जोर डालना और किसी धर्म का जानबूझकर अपमान करना अलग-अलग बातें हैं।
हाईकोर्ट के अनुसार, अभियोजन पक्ष के आरोपों को पूरी तरह सही मान लेने पर भी अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव डाला था। लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उन्होंने किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत किया।
कोर्ट ने माना कि आरोपी अपने धर्म का प्रचार कर रहे थे और केवल इस आधार पर उनके खिलाफ धार्मिक भावनाएं आहत करने का अपराध नहीं बनता।
घटना के समय महाराष्ट्र में धर्म परिवर्तन संबंधी कानून नहीं था
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र में धर्म परिवर्तन से जुड़े कानून की स्थिति पर भी विचार किया।
कोर्ट ने पाया कि कथित घटना वर्ष 2025 की थी। उस समय महाराष्ट्र में ऐसा कोई कानून लागू नहीं था, जो प्रलोभन देकर एक धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन करने पर रोक लगाता हो।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि महाराष्ट्र में धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा और गैरकानूनी धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने संबंधी कानून बाद में बनाया गया, जो 28 अगस्त 2026 से प्रभावी हुआ।
इस प्रकार कथित घटना के समय लागू कानूनी स्थिति को भी कोर्ट ने अपने फैसले में ध्यान में रखा।
चारों आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही समाप्त
हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायत में लगाए गए आरोप किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से आहत करने का अपराध स्थापित नहीं करते।
इसी आधार पर कोर्ट ने चारों आरोपियों की याचिकाएं स्वीकार करते हुए अमरावती में दर्ज FIR और उसके आधार पर दाखिल चार्जशीट रद्द कर दी।
इस फैसले से जोसेफ खुदावंत, विक्टर खुदावंत, एल्विना खुदावंत और अनंत मानकर के खिलाफ संबंधित मामले में चल रही आपराधिक कार्यवाही समाप्त हो गई।

