इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक व्यक्ति को ₹50,000 का मुआवजा देने का निर्देश दिया है, जिसकी जमानत पर रिहाई पुलिस द्वारा उसके आपराधिक इतिहास की गलत जानकारी देने के कारण 15 दिन की देरी से हुई। अदालत ने टिप्पणी की कि जांच अधिकारी (आईओ) की लापरवाही के कारण आरोपी को आवश्यकता से अधिक समय तक हिरासत में रहना पड़ा।
जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने फुरकान नामक व्यक्ति की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। फुरकान को पिछले साल नवंबर में कार चोरी के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। हालांकि अदालत ने 10 मार्च को उसे जमानत दे दी थी, लेकिन सुनवाई के दौरान आरोपी के आपराधिक पूर्ववृत्त (criminal antecedents) की रिपोर्टिंग में एक बड़ी चूक सामने आई।
फुरकान के वकील ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि आवेदक को 23 फरवरी को ही जमानत पर रिहा किया जा सकता था। हालांकि, उसकी जेल की अवधि इसलिए बढ़ गई क्योंकि पुलिस ने गलत तरीके से दावा किया कि उसके खिलाफ 12 आपराधिक मामले दर्ज हैं। बाद में आवेदक ने साबित किया कि उसका वास्तविक आपराधिक रिकॉर्ड केवल पांच मामलों का था, जिसे पहले ही स्पष्ट किया जा चुका था।
अदालत ने संज्ञान लिया कि यह गलत जानकारी जांच अधिकारी (आईओ) द्वारा दी गई थी। कोर्ट ने माना कि यह गलती लापरवाही के कारण हुई थी, न कि किसी दुर्भावना के चलते।
जस्टिस देशवाल ने 10 मार्च के अपने आदेश में कहा, “इसलिए, राज्य द्वारा आवेदक को आज से एक महीने की अवधि के भीतर 50,000 रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। रिकॉर्ड के अवलोकन से यह भी स्पष्ट है कि आईओ की ओर से कोई दुर्भावना नहीं थी, बल्कि उनकी लापरवाही के कारण यह गलती हुई, जो उन पर काम के बोझ के कारण हो सकती है।”
सुनवाई के दौरान, अदालत ने इस विसंगति को स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (तकनीकी सेवाएं), लखनऊ को तलब किया था। वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए एडीजी नवीन अरोड़ा ने आईओ की गलती स्वीकार की। उन्होंने अदालत को सूचित किया कि ‘क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम’ (CCTNS) के माध्यम से किसी भी आरोपी के आपराधिक इतिहास का पता लगाना “बहुत आसान” है, जिससे संकेत मिलता है कि इस गलती से बचा जा सकता था।
एडीजी ने एक प्रशासनिक बाधा का भी खुलासा किया: उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट में संयुक्त निदेशक (अभियोजन) को केस डायरी प्राप्त करने के लिए ‘इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम’ (ICJS) की सुविधा दी गई थी, लेकिन इसका उपयोग नहीं किया जा रहा था। संबंधित अधिकारी ने कथित तौर पर अपने कार्यालय में कर्मचारियों की भारी कमी का हवाला देते हुए इस प्रणाली का उपयोग करने से इनकार कर दिया था।
प्रक्रियात्मक देरी को गंभीरता से लेते हुए, हाईकोर्ट ने निदेशक (अभियोजन) को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि संयुक्त निदेशक के कार्यालय में पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध कराए जाएं। इस उपाय का उद्देश्य यह है कि कार्यालय आईसीजेएस (ICJS) सुविधा का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सके, जिससे भविष्य में निर्देश प्राप्त करने में देरी न हो और यह सुनिश्चित हो सके कि गलत जानकारी किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधा न बने।

