कानूनी आधार के बिना लंबे समय से चली आ रही राजस्व प्रविष्टियां रद्द की जा सकती हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लंबे समय से चली आ रही राजस्व प्रविष्टियों (revenue entries) को हटाए जाने के खिलाफ दायर एक रिट याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई प्रविष्टि बिना किसी तथ्यात्मक या कानूनी आधार के अचानक और गुप्त तरीके से दर्ज की गई है, तो उसे बरकरार नहीं रखा जा सकता, चाहे वह कितनी ही पुरानी क्यों न हो।

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी ने 1 अप्रैल, 2026 को बच्चा लाल और 5 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 20 अन्य (WRITB संख्या 3987/2025) के मामले में यह निर्णय सुनाया। हाईकोर्ट ने तीन चकबंदी अधिकारियों के सुसंगत निष्कर्षों को सही ठहराते हुए कहा कि याचिकाकर्ता सह-खातेदारी (co-tenancy) साबित करने में विफल रहे हैं।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद यू.पी. जोत चकबंदी अधिनियम, 1953 की धारा 9A (2) के तहत दर्ज आपत्तियों से उत्पन्न हुआ था। चकबंदी अधिकारी, पिंडरा, वाराणसी ने 1 मई, 2010 को प्रतिवादियों की आपत्तियों को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं के पूर्वजों के नाम राजस्व रिकॉर्ड से हटाने का आदेश दिया था।

याचिकाकर्ताओं का दावा था कि 1291-फसली में गंगा पुत्र शिव दयाल महल ज्वाला प्रसाद और महल जसोदा बीबी के भूखंडों पर एकमात्र खातेदार के रूप में दर्ज थे। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उनके पूर्वज शिव बरन और सुमेर का नाम 1309-फसली की खतौनी में आया और उसके बाद 1334, 1356 और 1378-फसली से होते हुए 1388-फसली तक चलता रहा। उनका तर्क था कि चूंकि प्रतिवादियों ने दशकों तक इन नामों को हटाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया, इसलिए इन प्रविष्टियों को सही माना जाना चाहिए।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता: याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश पांडे और वाई.वी. बाजपेई ने दलील दी कि उनके मुवक्किलों का नाम 1309-फसली से 1388-फसली तक एक बहुत लंबी अवधि के लिए दर्ज रहा है। उन्होंने कहा कि चकबंदी अधिकारी ने सामान्य पूर्वज को दर्शाने वाले ‘कुर्सीनामा’ (वंश वृक्ष) को गलत तरीके से खारिज कर दिया। साथ ही, यह भी तर्क दिया गया कि सुमेर का नाम पहली बार 1334-फसली में नहीं बल्कि 1309-फसली में दर्ज हुआ था।

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प्रतिवादी: प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता प्रदीप कुमार राय ने तर्क दिया कि केवल चकबंदी शुरू होने के समय आपत्ति दर्ज करने का मतलब यह नहीं है कि पिछली प्रविष्टियां वैध हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि यदि प्रविष्टि का कोई कानूनी या तथ्यात्मक आधार नहीं है, तो वह शून्य है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के धर्मराज और अन्य बनाम छीतन और अन्य (2006) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सह-खातेदारी साबित करने के लिए राजस्व प्रविष्टियों से अधिक ठोस साक्ष्य की आवश्यकता होती है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने चकबंदी अधिकारी (CO), बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी (SOC) और उप संचालक चकबंदी (DDC) के आदेशों की समीक्षा की। अदालत ने पाया कि भले ही कुर्सीनामा को स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन यह प्रविष्टियों को वैध बनाने के लिए पर्याप्त नहीं था। याचिकाकर्ता यह समझाने में विफल रहे कि 1291-फसली में केवल गंगा का नाम दर्ज होने के बाद अचानक उनके पूर्वजों का नाम बिना किसी पारिवारिक बंटवारे या कानूनी प्रक्रिया के कैसे दर्ज हो गया।

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हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“कुर्सीनामा से यह स्पष्ट है कि जब 1291-फसली में केवल गंगा का नाम दर्ज था, तब राम दयाल या नन्हकू या उनके उत्तराधिकारियों का कोई उल्लेख नहीं था। इसलिए, बिना किसी आधार के 1309-फसली में सुमेर और बाद में याचिकाकर्ता पक्ष के रामदेव और प्रताप के नाम दर्ज किए गए। ऐसी प्रविष्टियां जो अचानक और गुप्त तरीके से की गई हों, उन्हें बरकरार नहीं रखा जा सकता और उन्हें निरस्त किया जा सकता है।”

प्रविष्टियों की प्रकृति पर हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि 1309-फसली के रिकॉर्ड में याचिकाकर्ताओं के पूर्वजों को एक निश्चित अवधि के लिए ‘शिकमी’ (उप-काश्तकार) के रूप में दिखाया गया था। हाईकोर्ट ने कहा:

“1309-फसली में याचिकाकर्ताओं की प्रविष्टि की प्रकृति ‘निश्चित अवधि के लिए शिकमी काश्तकार’ की थी, इसलिए उन्हें सह-खातेदार नहीं माना जा सकता।”

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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विश्व विजय भारती बनाम फखरुल हसन (1976) मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड की शुद्धता का अनुमान केवल वास्तविक प्रविष्टियों पर लागू होता है, न कि धोखाधड़ी या गुप्त रूप से की गई प्रविष्टियों पर। कोर्ट ने कृष्णानंद बनाम डी.डी.सी. (2015) का भी हवाला दिया कि हाईकोर्ट को तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि अधिकारियों के निष्कर्ष पूरी तरह से विकृत (perverse) न हों।

निर्णय

हाईकोर्ट ने पाया कि चकबंदी अधिकारियों के सुसंगत निष्कर्षों में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता लंबे समय से चली आ रही इन प्रविष्टियों के लिए कोई कानूनी आधार दिखाने में विफल रहे हैं और ‘पुनः बंदोबस्त’ (re-settlement) का तर्क भी अस्पष्ट था।

हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा, “परिणामस्वरूप, वर्तमान रिट याचिका खारिज की जाती है।”

केस विवरण:

  • केस का नाम: बच्चा लाल और 5 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 20 अन्य
  • केस संख्या: WRITB संख्या 3987/2025
  • बेंच: न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी
  • निर्णय की तिथि: 01 अप्रैल, 2026

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