पति के ‘टेन्योर होल्डर’ होने पर पत्नी को अलग ‘टेन्योर होल्डर’ नहीं माना जा सकता; यूपी सीलिंग एक्ट के तहत जमीन को क्लब किया जाना वैध: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उत्तर प्रदेश अधिरोपण भूमि जोत सीमा आरोपण अधिनियम, 1960 (U.P. Ceiling Act) के तहत पति की भूमि के साथ पत्नी की अलग भूमि को जोड़ने (clubbing) को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘परिवार’ और ‘टेन्योर होल्डर’ (Tenure-holder) की संशोधित परिभाषा के तहत पत्नी की भूमि को उसके पति की जोत के साथ जोड़ना कानूनी रूप से अनिवार्य है। कोर्ट ने यह भी कहा कि 1973 और 1976 के संशोधनों से पहले पारित आदेश ‘रेस ज्यूडिकाटा’ (Res Judicata) के रूप में लागू नहीं होते।

जस्टिस जसप्रीत सिंह ने 6 फरवरी, 2026 को यह फैसला सुनाते हुए निर्धारित प्राधिकारी (Prescribed Authority) और अपीलीय प्राधिकारी द्वारा क्रमशः 1986 और 1993 में पारित आदेशों की पुष्टि की। इस फैसले के साथ ही पिछले चार दशकों से चल रहे कानूनी विवाद का अंत हो गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला यूपी सीलिंग एक्ट, 1960 के तहत शुरू हुई कार्यवाही से जुड़ा है। मूल याचिकाकर्ता, हिमांशु धर सिंह को पहली बार 1962 में नोटिस जारी किया गया था, जिसे 24 जुलाई, 1964 को निर्धारित प्राधिकारी ने डिस्चार्ज कर दिया था। उस समय राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती नहीं दी थी।

हालांकि, अधिनियम में हुए संशोधनों के बाद, 15 जून, 1976 को धारा 10(2) के तहत नया नोटिस जारी किया गया। याचिकाकर्ता ने इसे यह कहते हुए चुनौती दी कि उसकी पत्नी और वयस्क संतानों के नाम पर दर्ज भूमि को उसकी अपनी भूमि के साथ जोड़ना कानूनी रूप से गलत है। 1978 में निर्धारित प्राधिकारी ने वयस्क संतानों की भूमि को तो अलग कर दिया, लेकिन पत्नी की भूमि को याचिकाकर्ता की जोत के साथ जोड़ा रखा।

यह विवाद चार चरणों की लंबी कानूनी लड़ाई से गुजरा:

  • दूसरा चरण: 1979 में अपीलीय प्राधिकारी ने सिंचित/असिंचित भूमि के निर्धारण और याचिकाकर्ता को भूमि प्रतिधारण (choice) का विकल्प देने के लिए मामला वापस भेजा।
  • तीसरा चरण: 1983 में अपीलीय प्राधिकारी ने फिर से निर्देश दिए कि कुछ विशिष्ट भूखंडों को असिंचित माना जाए और याचिकाकर्ता को अपनी पसंद की भूमि रखने का अवसर दिया जाए।
  • चौथा चरण: 27 जून, 1986 को निर्धारित प्राधिकारी ने 7.3 हेक्टेयर भूमि को बरकरार रखने की अनुमति दी और शेष को ‘सरप्लस’ (अधिशेष) घोषित कर दिया। प्राधिकारी ने याचिकाकर्ता द्वारा दी गई अस्पष्ट ‘चॉइस’ को खारिज कर दिया क्योंकि वह अन्य विनिमय कार्यवाहियों (exchange proceedings) पर आधारित थी।
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याचिकाकर्ता ने 1993 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिका लंबित रहने के दौरान मूल याचिकाकर्ता की मृत्यु हो गई और उनके कानूनी उत्तराधिकारी को पक्षकार बनाया गया।

पक्षकारों के तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक राज सिंह ने दलील दी कि 1964 में नोटिस का डिस्चार्ज होना अंतिम रूप ले चुका था, इसलिए 1976 में फिर से कार्यवाही शुरू करना वर्जित था। उन्होंने 1973 के संशोधन अधिनियम की धारा 19(2) का हवाला देते हुए कहा कि चूंकि निर्धारण पहले ही हो चुका था, इसलिए कार्यवाही पुराने अधिनियम के अनुसार ही समाप्त होनी चाहिए थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि संशोधनों को पूर्वव्यापी (retrospective) नहीं बल्कि भविष्यगामी (prospective) रूप से पढ़ा जाना चाहिए।

राज्य की ओर से स्थायी अधिवक्ता हेमंत कुमार पांडेय ने विरोध करते हुए कहा कि 1973 और 1976 के संशोधनों ने अधिनियम के मूल ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है। उन्होंने कहा कि 1976 में जोड़ी गई धारा 38-B स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि संशोधन से पहले का कोई भी फैसला नए सिरे से होने वाली कार्यवाही में ‘रेस ज्यूडिकाटा’ के रूप में बाधा नहीं बनेगा। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को कई अवसर दिए जाने के बावजूद उन्होंने भूमि प्रतिधारण के लिए कोई स्पष्ट विकल्प नहीं दिया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

अधिकार क्षेत्र और संक्रमणकालीन प्रावधानों पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि निर्धारण पहले ही अंतिम हो चुका था। जस्टिस सिंह ने नोट किया:

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“यह मामला ऐसा नहीं है जहां संक्रमणकालीन प्रावधानों के कारण लंबित कार्यवाही समाप्त हो गई हो… वास्तव में, यह 1976 के संशोधन अधिनियम के लागू होने के बाद धारा 10(2) के तहत जारी नोटिस के अनुसरण में किया गया नया निर्धारण है।”

कोर्ट ने धारा 38-B का हवाला देते हुए कहा कि पुराने फैसले संशोधित अधिनियम के तहत नए परीक्षण को नहीं रोकते। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अरविंद कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले को भी अलग बताया, क्योंकि वर्तमान मामला 1976 के संशोधन द्वारा अनिवार्य किए गए नए निर्धारण से जुड़ा था।

पत्नी की भूमि को जोड़ने पर हाईकोर्ट ने धारा 3(7) के तहत ‘परिवार’ और धारा 3(17) के तहत ‘टेन्योर होल्डर’ की परिभाषाओं का विश्लेषण किया। अधिनियम के अनुसार, परिवार में पति-पत्नी और नाबालिग बच्चे शामिल हैं। महत्वपूर्ण रूप से, ‘टेन्योर होल्डर’ की परिभाषा से उस महिला को बाहर रखा गया है जिसका पति स्वयं एक टेन्योर होल्डर है।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“यह देखा जा सकता है कि यह निर्धारित करना होगा कि टेन्योर होल्डर कौन होगा। सीलिंग एक्ट के उद्देश्यों के लिए पति या पत्नी में से केवल एक को ही टेन्योर होल्डर माना जा सकता है। अधिनियम के तहत सरप्लस लैंड का निर्धारण करते समय दोनों को अलग-अलग टेन्योर होल्डर मानकर उनकी भूमि को अलग नहीं रखा जा सकता।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि पति (मूल याचिकाकर्ता) को टेन्योर होल्डर माना गया था, इसलिए उसकी पत्नी को अलग टेन्योर होल्डर नहीं माना जा सकता था और उनकी भूमि को जोड़ा जाना वैध था। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दर्शन प्रसाद बनाम सिविल जज-द्वितीय, गोरखपुर के फैसले का भी उल्लेख किया।

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भूमि प्रतिधारण के विकल्प पर हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को धारा 12-A के तहत अपनी पसंद की भूमि रखने के दो अवसर दिए गए थे, लेकिन उन्होंने स्पष्ट विकल्प नहीं दिया। याचिकाकर्ता ने अपनी पसंद को बेटियों द्वारा शुरू की गई विनिमय कार्यवाहियों से जोड़ दिया था। जस्टिस सिंह ने कहा:

“चूंकि 1950 के अधिनियम की धारा 161 के तहत विनिमय कार्यवाहियों का सीलिंग अधिकारियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता था, इसलिए इसे चॉइस की वैध अभिव्यक्ति नहीं माना जा सकता।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने रिट याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया और 1986 व 1993 के आदेशों की पुष्टि की। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि संबंधित अधिकारियों के आदेशों में कोई क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि या अवैधता नहीं थी।

कोर्ट ने अंत में कहा:

“यह हाईकोर्ट बिना किसी हिचकिचाहट के इस रिट याचिका को मेरिट रहित मानता है और इसे खारिज किया जाता है।”

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: हिमांशु धर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस नंबर: रिट-सी संख्या 3000084/1993
  • कोरम: जस्टिस जसप्रीत सिंह
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री विवेक राज सिंह (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री शांतनु शर्मा
  • प्रतिवादी के वकील: श्री हेमंत कुमार पांडेय (स्थायी अधिवक्ता)

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