इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन जजों की पूर्ण पीठ (Full Bench) ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के तहत मुकदमा वापस लेने (Withdrawal of Suit) के कानून पर स्थिति स्पष्ट कर दी है। कोर्ट ने निर्धारित किया है कि केवल मुकदमा वापस लेने का आवेदन दाखिल कर देने से ही वाद (Suit) अपने आप खारिज नहीं हो जाता। इसके लिए न्यायालय का सकारात्मक आदेश आवश्यक है। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक कोर्ट वापसी की अर्जी पर अंतिम आदेश पारित नहीं कर देती, तब तक वादी के पास उस वापसी की अर्जी को भी वापस लेने का अधिकार सुरक्षित रहता है।
यह महत्वपूर्ण निर्णय न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह, न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति अजय भनोट की पूर्ण पीठ ने एक एकल पीठ (Single Judge) द्वारा भेजे गए संदर्भ (Reference) का उत्तर देते हुए सुनाया। पीठ ने ‘रईसा सुल्ताना बेगम’ और ‘मीरा राय’ के मामलों में दिए गए पूर्व के फैसलों की वैधता पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के निर्णयों के प्रकाश में विचार किया।
क्या था कानूनी सवाल?
यह मामला तब पूर्ण पीठ के सामने आया जब एकल पीठ ने दो निर्णयों के बीच विरोधाभास पाया। एकल पीठ ने दो मुख्य सवाल पूछे थे:
- क्या रईसा सुल्ताना बेगम (AIR 1996 All 318) मामले में दिया गया यह निर्णय अब भी मान्य है कि ऑर्डर XXIII नियम 1 CPC के तहत आवेदन देते ही मुकदमा ‘स्वतः’ (Ipso Facto) वापस हो जाता है, बिना कोर्ट के किसी आदेश के?
- क्या मीरा राय (2017) मामले में दिया गया निर्णय, जो कहता है कि केवल अर्जी देने से मुकदमा वापस नहीं होता, सुप्रीम कोर्ट के अनुराग मित्तल बनाम शैली मिश्रा मित्तल के फैसले के आलोक में सही कानून है?
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत 1999 में हुई जब मुन्नान देवी ने 1998 में निष्पादित एक बैनामे (Sale Deed) को रद्द करने के लिए मुकदमा दायर किया। मुकदमे के लंबित रहने के दौरान, मुन्नान देवी ने 2011 में विवादित संपत्ति जीरा देवी और घनश्याम पटेल (याचिकाकर्ता) को बेच दी। 2013 में मुन्नान देवी की मृत्यु के बाद उनकी बेटी फूलपत्ती देवी को वादी के रूप में प्रतिस्थापित किया गया।
2018 में, फूलपत्ती देवी ने मुकदमे को बिना शर्त वापस लेने के लिए एक आवेदन दायर किया। इसके तुरंत बाद, संपत्ति के खरीदारों (जीरा देवी और घनश्याम पटेल) ने ऑर्डर XXII नियम 10 CPC के तहत मुकदमा जारी रखने की अनुमति मांगते हुए आवेदन किया। ट्रायल कोर्ट ने वापसी का आवेदन खारिज कर दिया और खरीदारों को मुकदमा जारी रखने की अनुमति दी। हालांकि, वाराणसी के अपर जिला जज ने अपील में इस आदेश को पलट दिया और मुकदमा वापसी की अनुमति दे दी। इसके खिलाफ खरीदारों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं (खरीदारों) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अतुल दयाल ने सुप्रीम कोर्ट के राजेंद्र प्रसाद गुप्ता बनाम प्रकाश चंद्र मिश्रा (AIR 2011 SC 1137) के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रतिबंध नहीं है जो वादी को अपना “वापसी का आवेदन वापस लेने” से रोकता हो। उन्होंने कहा कि अनुराग मित्तल वाला फैसला हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) के तहत था, इसलिए वह इस मामले में लागू नहीं होता।
इसके विपरीत, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि मुकदमा वापस लेना वादी का एकतरफा अधिकार है और जैसे ही आवेदन दिया जाता है, वापसी की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। इसके लिए कोर्ट के किसी औपचारिक आदेश की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने अपनी दलील के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के अनुराग मित्तल फैसले का सहारा लिया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
पूर्ण पीठ ने संबंधित कानूनों और नजीरों का विस्तार से विश्लेषण किया:
रईसा सुल्ताना बेगम बनाम राजेंद्र प्रसाद गुप्ता: हाईकोर्ट ने पाया कि रईसा सुल्ताना बेगम मामले में डिवीजन बेंच ने माना था कि कोर्ट को सूचना देते ही वापसी पूरी हो जाती है। हालांकि, पूर्ण पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने राजेंद्र प्रसाद गुप्ता मामले में स्पष्ट रूप से कहा है कि “प्रक्रियात्मक नियम न्याय की दासी हैं” और CPC की धारा 151 कोर्ट को अंतर्निहित शक्तियां देती है। सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि “वापसी के आवेदन को वापस लेने” के लिए आवेदन दायर करने पर कोई स्पष्ट रोक नहीं है।
अतः, हाईकोर्ट ने कहा कि राजेंद्र प्रसाद गुप्ता के फैसले को देखते हुए रईसा सुल्ताना बेगम का फैसला अब मान्य नहीं (Bad Law) है।
अनुराग मित्तल मामले पर स्पष्टीकरण: प्रतिवादियों द्वारा अनुराग मित्तल (2018) मामले का हवाला दिए जाने पर पीठ ने स्पष्ट किया कि वह फैसला एक अलग कानूनी क्षेत्र में लागू होता है। अनुराग मित्तल का फैसला हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 15 की व्याख्या और दूसरे विवाह की वैधता से संबंधित है, न कि सामान्य दीवानी मुकदमों की वापसी से।
कोर्ट की भूमिका: पीठ ने जोर देकर कहा कि अगर यह मान लिया जाए कि आवेदन देते ही मुकदमा अपने आप वापस हो जाता है, तो कोर्ट की भूमिका केवल एक “डाकिए” या “मूकदर्शक” की रह जाएगी।
“कोर्ट एक मूकदर्शक नहीं बन सकता जो पूरी तरह से वादी के आचरण पर निर्भर हो (धोखाधड़ी के मामलों को छोड़कर), और जिसका न्याय की जरूरतों पर कोई ध्यान न हो। प्रक्रियात्मक कानून का मूल कानून (Substantive Law) पर हावी होना न्याय के उद्देश्यों के अनुरूप नहीं हो सकता।”
निष्कर्ष
पूर्ण पीठ ने संदर्भ का उत्तर इस प्रकार दिया:
- पहला सवाल: रईसा सुल्ताना बेगम का फैसला अब अच्छा कानून (Good Law) नहीं है क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट के राजेंद्र प्रसाद गुप्ता मामले के फैसले के विपरीत है।
- दूसरा सवाल: मीरा राय मामले में दिया गया निर्णय सही कानून है, क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट के राजेंद्र प्रसाद गुप्ता मामले के अनुरूप है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुकदमा वापस लेने के लिए केवल आवेदन देना काफी नहीं है, उस पर कोर्ट का आदेश होना अनिवार्य है। जब तक कोर्ट आदेश पारित नहीं करती, वादी के पास अपने वापसी के आवेदन को वापस लेने का विकल्प खुला रहता है। मामले को अब नियमित पीठ के समक्ष आगे की कार्यवाही के लिए भेजा गया है।
केस विवरण:
वाद शीर्षक: जीरा देवी और अन्य बनाम अपर जिला जज कोर्ट नंबर 12, वाराणसी और 2 अन्य
केस संख्या: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 संख्या 4747 वर्ष 2019
पीठ: न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह, न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति अजय भनोट निर्णय दिनांक: 19.01.2026

