रिवीजन में सीपीसी के ऑर्डर VI रूल 17 का प्रोवाइजो यांत्रिक रूप से लागू नहीं, लेकिन स्वीकृतियां वापस लेना नामंजूर: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण (रिवीजन) कार्यवाहियों में आधारों को संशोधित करने के दायरे को स्पष्ट किया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि यद्यपि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर VI रूल 17 के प्रोवाइजो (परंतुक) में निहित “उचित तत्परता” (due diligence) की शर्त को रिवीजन में यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता, फिर भी किसी पक्षकार को पुनरीक्षण के स्तर पर नए तथ्यात्मक दावे पेश करने या पहले से दी गई बाध्यकारी स्वीकृतियों को वापस लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर एक याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने कहा कि रिवीजन कोर्ट का अधिकार क्षेत्र सीमित होता है, जिसका उद्देश्य केवल मौजूदा रिकॉर्ड के आधार पर अधीनस्थ न्यायालय के आदेश की वैधता और क्षेत्राधिकार की शुद्धता की जांच करना है। चूंकि रिवीजन में कोई नया साक्ष्य दर्ज नहीं किया जाता, इसलिए इसे बचाव के मूल स्वरूप को बदलने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मूल रूप से एक लघुवाद वाद (SCC Suit No. 190 of 2013) से जुड़ा है, जिसे प्रतिवादी-मकान मालिक (श्रीमती शशिकला पांडे) ने याची-किरायेदार (श्रीमती मुन्नी देवी) के खिलाफ बेदखली और बकाया किराए की वसूली के लिए दायर किया था। लघुवाद न्यायालय ने 29 फरवरी 2024 को इस वाद को डिक्री कर दिया था।

याची ने इसे सिविल रिवीजन संख्या 130/2024 के माध्यम से चुनौती दी। मुकदमेबाजी के कई दौर और हाईकोर्ट द्वारा दो बार रिमांड किए जाने के बाद, याची ने रिवीजन के आधारों में संशोधन के लिए सीपीसी के ऑर्डर VI रूल 17 और धारा 151 के तहत एक प्रार्थना पत्र (Paper No. 29-G) दाखिल किया। याची ने चार नए आधार (A, B, C, और D) जोड़ने की मांग की, जिनमें शामिल थे:

  • मकान मालिक-किरायेदार के संबंध और स्वामित्व से इनकार करना।
  • नोटिस की वैधता को चुनौती देना।
  • यह दावा करना कि विवादित ढांचे का निर्माण स्वयं प्रतिवादी ने किया था।
  • शीर्षक (title) का प्रश्न होने के कारण प्रांतीय लघुवाद न्यायालय अधिनियम की धारा 23 को लागू करना।
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रिवीजन कोर्ट ने 16 जुलाई 2025 को इस आवेदन को खारिज कर दिया था, जिसका मुख्य आधार याची द्वारा “उचित तत्परता” (due diligence) दिखाने में विफलता थी।

पक्षकारों के तर्क

याची के वकील ने तर्क दिया कि रिवीजन कोर्ट ने ऑर्डर VI रूल 17 सीपीसी के प्रोवाइजो को गलत तरीके से लागू किया, क्योंकि यह शर्त ट्रायल (विचारण) के लिए होती है, न कि पुनरीक्षण कार्यवाहियों के लिए।

वहीं, प्रतिवादी-मकान मालिक के वकील ने दलील दी कि प्रस्तावित संशोधन पूरी तरह से विलंबित हैं और याची द्वारा अपने लिखित कथन (WS) में दी गई स्पष्ट स्वीकृतियों के विपरीत हैं। यह तर्क दिया गया कि याची केवल बाध्यकारी स्वीकृतियों को वापस लेने और पूरी तरह से नए व असंगत तथ्य पेश करने का प्रयास कर रही है, जिससे प्रतिवादी को गंभीर नुकसान होगा।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने ट्रायल और रिवीजन कार्यवाहियों के बीच के संरचनात्मक अंतर पर विस्तार से चर्चा की। कोर्ट ने नोट किया कि ऑर्डर VI रूल 17 ‘प्लीडिंग्स’ (वाद पत्र और लिखित कथन) में संशोधन की अनुमति देता है, और इसका प्रोवाइजो ट्रायल शुरू होने के बाद संशोधन पर तब तक रोक लगाता है जब तक कि उचित तत्परता न दिखाई जाए।

रिवीजन में प्रोवाइजो की लागू होने पर: हाईकोर्ट ने कहा कि “पुनरीक्षण कार्यवाहियों में उस अर्थ में ट्रायल शामिल नहीं होता” जैसा कि साक्ष्य दर्ज करने या तथ्यों के नए सिरे से निर्धारण में होता है। कोर्ट के अनुसार:

“ऑर्डर VI रूल 17 सीपीसी के परंतुक (proviso) का शाब्दिक अनुप्रयोग, जो ट्रायल शुरू होने पर आधारित है, पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार की योजना में फिट नहीं बैठता है।”

कानूनी बनाम तथ्यात्मक आधार: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों से उत्पन्न होने वाले शुद्ध कानूनी प्रश्नों को किसी भी स्तर पर उठाने की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन नए तथ्यों के लिए ऐसा नहीं किया जा सकता:

“एक ‘आधार’ जो पूरी तरह से कानूनी है और मौजूदा रिकॉर्ड से उत्पन्न होता है, और एक ‘प्ली’ (तर्क) जो जांच या साक्ष्य की आवश्यकता वाले नए तथ्यात्मक दावे पेश करता है, के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखा जाना चाहिए।”

स्वीकृतियों की महत्ता: कोर्ट ने यह सिद्धांत दोहराया कि प्लीडिंग्स में दी गई स्वीकृतियां “सारवान साक्ष्य” (substantive evidence) होती हैं। कोर्ट ने कहा:

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“बाद के चरण में ऐसी स्वीकृतियों को वापस लेने या उन्हें कमजोर करने की अनुमति देना… न केवल कार्यवाही के आधार को अस्थिर कर देगा बल्कि विरोधी पक्ष को प्राप्त लाभ से वंचित कर उसे गंभीर क्षति भी पहुँचाएगा।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने पाया कि याची द्वारा प्रस्तावित संशोधन केवल कानूनी आधार नहीं थे, बल्कि किरायेदारी की पिछली स्वीकृतियों के विपरीत नए तथ्यात्मक दावे पेश करके “बचाव के चरित्र को मौलिक रूप से बदलने” का प्रयास थे।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि रिवीजन कोर्ट द्वारा “उचित तत्परता” के प्रोवाइजो पर निर्भरता “कानूनी रूप से पूरी तरह सटीक नहीं थी,” फिर भी संशोधन को खारिज करने का अंतिम निर्णय सही था।

“याची द्वारा मांगा गया संशोधन वास्तव में नए तथ्यात्मक दावे पेश करने, स्वीकृतियों को वापस लेने और बंद हो चुके मुद्दों को फिर से खोलने का प्रयास है, जो कानून में अस्वीकार्य है।”

नतीजतन, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, हालांकि याची को यह छूट दी गई कि वह लंबित रिवीजन में मौजूदा रिकॉर्ड से संबंधित सभी कानूनी आधार उठा सकती है।

मामले का विवरण:

  • केस शीर्षक: श्रीमती मुन्नी देवी बनाम श्रीमती शशिकला पांडे
  • केस संख्या: मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 नंबर 1505 ऑफ 2026
  • बेंच: न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव
  • दिनांक: 20 मार्च, 2026

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